इक्कीसवीं सदी का भारत - तर्कशील भारत

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Monday, August 19, 2019

इक्कीसवीं सदी का भारत


गुरबत के घुप्प अंधेरे बियाबान में
रास्ता भटक गया हूँ
पाखण्डों की जंजीरों में बंधा मैं
अंधी आस्थाओं के मकड़जाल में कैद हूँ
इतिहास के बोझ को सिर पर उठाए
पुरातन कुंठाओं की रद्दियाँ सहेजे
अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ा जा रहा हूँ
मैं इक्कसवीं सदी का भारत हूँ
मैं इक्कसवीं सदी का भारत हूँ

मेरे पैरों में
संस्कृति की मजबूत बेड़ियां हैं
जिन्हें मैं न जाने कब से
ढोता जा रहा हूँ
मेरे हाथों में
परंपराओं की हथकड़ियां हैं
जिन्हें तोड़ना अब मेरे बस में नही
धर्म के भारी भरकम लबादे को ओढ़े
न जाने कब से
यूँही भटक रहा हूँ
मैं इक्कीसवीं सदी का भारत हूँ
मैं इक्कीसवी सदी का भारत हूँ

मैं भी चाहता हूँ
विकास की रेस में
सबसे तेज और सबसे आगे पहुँचूँ
औरों की तरह
प्रगति की सड़कों पर सरपट दौडूं
मैं भी औरों की तरह
सुख शांति और समृद्धि के
नए कीर्तिमान बनाऊं
लेकिन
सियासत की जंजीरों में बंधा मैं
न जाने कब से छटपटा रहा हूँ
मैं इक्कीसवीं सदी का भारत हूँ
मैं इक्कीसवीं सदी का भारत हूँ
-शकील प्रेम

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