भीड़ और समूह (कविता) - तर्कशील भारत

Header Ads Widget

Friday, August 2, 2019

भीड़ और समूह (कविता)


हम जिस दुनिया मे रहते है
वह दो भागों में बंटी हुई है
एक ओर है 
सभ्य इंसानों का समूह और 
दूसरी ओर है 
बर्बर इंसानों की भीड़

भीड़ में सभ्यता नही होती
क्योंकि वह केवल भीड़ होती है
यह भीड़ निरुद्देश्य भी नही होती
हर भीड़ का मकसद होता है
और वह है 
अराजकता और सर्वनाश

यही भीड़
अगर सभ्य हो
तो वह भीड़ नही होती
उसे समूह कहते है
हर समूह का भी मकसद होता है
और वह है
सृजन और विकास

ये दुनिया दो ही हिस्सों में बंटी है
एक तरह भीड़ है तो दूसरी ओर समूह

समूह जिस सभ्यता को
वर्षों की मेहनत से बनाता है
भीड़ उसे क्षण भर में तबाह कर देती है

समूह को 
आगे बढ़ने की चाहत होती है तो
भीड़ को 
पीछे चलने की जिद होती है
समूह को 
आप उसकी उपलब्धियों से
पहचान सकते हैं
तो
दंगा फसाद और अराजकता
भीड़ की पहचान होती है

समूह
मंगल की धरती को 
रहने लायक बना सकता है
तो भीड़ इस रहने लायक धरती को
मंगल की तरह वीरान कर सकती है.

ये दुनिया दो ही हिस्सों में बंटी है
एक तरह भीड़ है तो दूसरी ओर समूह

भीड़ और समूह दोनों का
लंबा इतिहास रहा है 

वो एक भीड़ ही तो थी 
जिसने ब्रूनो को जिंदा जलाया था

और वह एक समूह ही था
जिसने हजारों साल पहले
धरती के सीने पर
पिरामिडों को गाड़ दिया था

वो भी एक भीड़ ही थी
जो चिता में 
जिंदा जलती औरतो को देख कर
ढोल मंजीरा बजाते हुए जश्न मनाया करती थी

और वह एक समूह ही था 
जो बेटियों को अंतरिक्ष मे भेजकर 
खुशी से झूम उठा था

दुनिया का इतिहास 
भीड़ के कुकर्मों से 
और समूहों की उपलब्धियों से
भरा हुआ है.

ये दुनिया दो ही हिस्सों में बंटी है
एक तरह भीड़ है तो दूसरी ओर समूह

जब भी भीड़ ने विनाश किया है
समूह ने भीड़ की इस विनाशलीला में 
उजड़ चुकी धरती को 
अपने श्रम से सींचा है

भीड़ की तबाही को
समूहों ने हमेशा ही 
पुनर्निर्माण में बदला है
भीड़ की नफरत को
समूहों ने
मुहब्बत में तब्दील किया है.

सत्य प्रेम और परिवर्तन के 
मजबूत इरादों पर
काम करने वाला हर समूह
मानवता के मकसद को पूर्ण करता है
और उसे पता होता है की
उसे कोई इस्तेमाल नही कर सकता.

धर्म मजहब और सत्ता के 
मजबूत डंडों के इशारों पर
हाँकी जाने वाली हर भीड़
अपने आकाओं के इरादों को
पूर्ण करती है लेकिन 
उसे पता भी नही होता 
की उसका इस्तेमाल हो रहा है

ये दुनिया दो ही हिस्सों में बंटी है
एक तरह भीड़ है तो दूसरी ओर समूह

अफगानिस्तान और सीरिया की
उस भीड़ को याद कीजिये
जिसका मकसद बस एक ही था
सर्वनाश

बामियान की
उस भीड़ को याद कीजिये
जिसने हजारों साल पुराने इतिहास को
एक क्षण में तबाह कर दिया था

समूह वर्षों की मेहनत से 
जिन तहजीबों को तैयार करता है
भीड़ क्षण भर में 
उन सभ्यताओं का
नामोनिशान मिटा देती है

जिन गांवों को बसाने में 
समूहों को
हजारों साल लगते हैं
भीड़
बस एक रात में उन बस्तियों का
वजूद मिटा देती है

जिन रिश्तों को बनाने में
समूहों को
युग लग जाते हैं
उन्हें क्षण भर में तोड़ने के लिए 
भीड़ का
एक जहरीला उदघोष ही काफी होता है

ये दुनिया दो ही हिस्सों में बंटी है
एक तरह भीड़ है तो दूसरी ओर समूह

भीड़ का टारगेट सेट होता है
ठीक वैसे ही जैसे कोई मिसाइल
जिसे हर हाल में अपने लक्ष्य को 
तबाह करना है

समूहों का मकसद भी
तय होता है
ठीक वैसे ही जैसे चींटी
जिसे अपने लक्ष्य को 
हर हाल में
उत्कृष्ट बनाना है

भीड़ की मारक क्षमता 
उसकी तादात और 
उसका गुस्सा तय करता है
जिससे विनाश की पृष्ठभूमि तैयार होती है

और समूहों का हर कदम
उसकी मानवीय सोच से तय होता है
जिससे प्रगति की बुनियादें तैयार होती हैं

व्यवस्था से नाखुश होने पर
समूह क्रांति करती है
तो शोषकों के इशारों पर
भीड़ दंगे करती है

भीड़ का चेहरा नही होता
लेकिन समूहों की खूबसूरत पहचान होती है

भीड़ में जुनून नही होता
होता है तो बस एक
भयावह गुस्सा
जिसकी जद में वह
सबकुछ 
तबाही करती चली जाती है

समूह के पास जुनून के साथ
एक सुंदर सपना भी होता है
जिसे पूरा करने के लिए वह
दिन रात एक कर देता है

ये दुनिया दो ही हिस्सों में बंटी है
एक तरह भीड़ है तो दूसरी ओर समूह

भीड़ के पास 
अपना कोई नजरिया नही होता 
उधार के मिशन को 
पूरा करने वाली हर भीड़ 
किसी और की दी हुई दृष्टि और दृष्टिकोण 
के सहारे ही 
अपने प्रोजेक्ट को पूरा करती है

चाहे वह मंदिर मस्जिद की भीड़ हो 
या तबाही वाली भीड़
सब 
अदृश्य प्रोपगेंडे के तहत
किसी और के बनाये एजेंडे पर
काम करते हैं

दूसरी ओर
हर समूह का अपना नजरिया होता है
वह खुद की दृष्टि से दुनिया को देखता है
और उसका दृष्टिकोण भी 
उधार का नही होता
समूहों का हर मिशन
मानवता की उन्नति के लिए ही होता है
क्योंकि उसके पास एजेंडा होता है
प्रोपगेंडा नही.

ये दुनिया दो ही हिस्सों में बंटी है
एक तरह भीड़ है तो दूसरी ओर समूह

दुनिया को रहने लायक समूहों ने बनाया है
सभ्यताएं और उन सभ्यताओं के ऊंचे आदर्श
सब समूहों की देन है 

व्यवस्थाएं और 
उन व्यवस्थाओं में शामिल संवेदनाएं 
उल्लास और आत्मसम्मान की पराकाष्ठाएं 
सब समूहों की देन है

इसके उलट

घृणा हिंसा लूट 
और दंगों की पृष्ठभूमि पर 
तांडव करती हुई हर खूंखार भीड़
दुनिया को बर्बादी की ओर ले जाती है.

इसलिये जहां भीड़ होगी 
वहां तबाही जरूर होगी

और जहां समूह होगा
वहां उन्नति जरूर होगी

ये दुनिया दो ही हिस्सों में बंटी है
एक तरह भीड़ है तो दूसरी ओर समूह

समता बंधुता और न्याय 
सत्य प्रेम और परिवर्तन 
करुणा मैत्री और सहयोग 
ज्ञान प्रज्ञा और जागरूकता 
शोध परीक्षण और अनुसंधान 
समूहों ने इन सभी शब्दों को 
आपस मे मिला कर 
जिस एक शब्द का निर्माण किया है 
वह है "मानवता" 
और भीड़ 
इसी मानवता की सबसे बड़ी दुश्मन होती है.

आप और हम भी 
किसी न किसी भीड़ का
या किसी न किसी समूह का 
हिस्सा जरूर होते हैं.

हमारे चारों ओर
कई तरह की अदृश्य भीड़ 
हमेशा तैयार होती है

अलग अलग जातियों की भीड़
विभिन्न धर्मों की भीड़
भगवान के भक्तों की भीड़
अल्लाह के बंदों की भीड़
एक अदद निवाले के जुगाड़ में भटकती
जरूरतमंदों की भीड़
तो शिकार की ताक में 
घात लगाए बैठे भूखे
भेड़ियों की भीड़
या चरवाहे के इशारे पर 
हाँकी जाने वाली भेड़ों की भीड़

ये दुनिया दो ही हिस्सों में बंटी है
एक तरह भीड़ है तो दूसरी ओर समूह

हर भीड़ को समूह में बदला जा सकता है
लेकिन समूह कभी भीड़ में नही बदल सकता

हां 
अगर किसी समूह से 
उसके ज्ञान विज्ञान 
शिक्षा और संवेदनाओं को 
अलग कर दिया जाए 
तो वह एक भीड़ ही साबित होगी

और किसी भीड़ में
मानवता का समावेश हो जाये
तो वह भीड़ समूह में बदल सकता है.

समूह शक्ति देता है तो
भीड़ भय देती है
समूह जीने की खूबसूरत चाहत देता है
तो भीड़ 
जीने की वजह भी छीन लेती है

यही अंतर है भीड़ और समूह में...

ये दुनिया दो ही हिस्सों में बंटी है
एक तरह भीड़ है तो दूसरी ओर समूह

आओ हम सब मिलकर 
एक ऐसे समूह का निर्माण करें
जहां नफरत की दीवार न हो
घृणा का व्यापार न हो
सहयोग हो तिरस्कार न हो
करुणा हो अहंकार न हो

जहाँ बहती हों प्यार की धाराएं
जहां हृदय में जिंदा हो संवेदनाएं
जहां चलती हों मुहब्बत की हवाएं
जहां हो खुशहाली की फजाएँ

जहाँ धर्म की मीनारें न हों
जाती की तलवारें न हों

जहाँ भगवान का भय न हो 
खुदा का कोई खौफ न हो

मजहब की बदबूदार सोहबत न हो
सड़ी हुई आसमानी किताबों की जरूरत न हो

आओ हम सब मिलकर
एक ऐसा समूह बन जाएं

जहां नफरतों की जगह न हो
लड़ने की कोई वजह न हो

आओ हम सब मिलकर
ऊंच नीच की जंजीरों को तोड़ दें
भेदभाव की लकीरों को मिटा दें
साम्प्रदायिकता की संकुचित बेड़ियों को 
खत्म कर दें
और घृणा की गहरी खाई को मुहब्बत से भर दें

राष्ट्र की सीमाओं से परे जाकर
दुनिया को अपना घर बनाएं
विज्ञान को अपनी संस्कृति और
इंसानियत को अपना धर्म बनाएं

जहाँ न कोई अपराध न कोई विकृति होगी
मानवता ही हम सबकी संस्कृति होगी

आओ समूह बन जाएं
आओ समूह बन जाएं

No comments:

Post a Comment

Pages