क्या भूत प्रेत और जिन्न सच में होते हैं ? - तर्कशील भारत

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Wednesday, July 17, 2019

क्या भूत प्रेत और जिन्न सच में होते हैं ?


अमन गर्ग जी कहते हैं कि "उनका एक मित्र जब 7वी कक्षा में था तब उसके ऊपर किसी बंजारे का भूत आ गया था वह अजीब हरकतें करने लगा जब वह बोलता तो ऐसा लगता था कि वो नही कोई और बोल रहा है उसे एक बाबा के पास ले गये वहां कुछ समय उसने झाड़ फूंक किया और मेरा दोस्त ठीक हो गया इसके पीछे क्या कारण है ?"

आप गूगल पर "Types Of Mantle Disorder" टाइप कीजिये आपको पता चल जाएगा कि मानसिक बीमारियां कई प्रकार की होती हैं पिछड़े इलाकों में कुछ लोगों के ऊपर जो बुरी आत्माओं का असर हम देखते हैं उसके पीछे अलग अलग मानसिक बीमारियां जिम्मेदार होती हैं इस तरह की भूतिया बीमारियों में "मेनिया" और "मल्टी पर्सनेलटी डिसऑर्डर" के केसेस सबसे ज्यादा होते हैं यह किसी भी आयु वर्ग के लोगों को हो सकता है ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं में इस बीमारी के लक्षण ज्यादा पाये जाते हैं घरेलू कलह आसपास का अंधविश्वास युक्त माहौल और घोर अशिक्षा इस बीमारी की मुख्य वजह होती है और इन मानसिक बीमारियों के प्रति लोगों में जागरूकता न होने की वजह से लोग इन बीमारियों को भूत प्रेत जिन्न डायन वगैरह से जोड़ देते है. 

दुनिया मे अलग अलग लोगों को होने वाले लगभग सभी प्रकार के मानसिक रोगों की पहचान की जा चुकी है जिनमे कुछ सबसे कॉमन हैं

Clinical Depression
जिसे हिंदी में अवसाद कहते हैं
यह मनोरोग सामाजिक कारणों से उतपन्न होने वाली परेशानियों की वजह से हो सकता है. इस अवस्था में दिमाग के काम करने के तरीके में बदलाव आ जाता है. 

Anxiety Disorder
एक ऐसी मानसिक बीमारी होती है जिसमें बहुत ज़्यादा चिंता, बेचैनी या डर की वजह से आदमी को अपने रोज़मर्रा के काम करने में कठिनाई होती है.

Bipolar Disorder
इस बीमारी में मरिज का मिज़ाज हर समय बदलता रहता है कभी वह बहुत उदास दिखाई देता है तो कभी अचानक जोर जोर से हंसने लगता है.

Schizophrenia
इस मानसिक बीमारी में इंसान के सोचने समझने की ताकत कमजोर हो जाती है कई सामान्य सी चीजों को देख कर वह निर्णय नही कर पाता कि वह क्या है ?

इन बीमारियों के लक्षण ऐसे होते हैं जिन्हें आदमी समझ ही नही पाता क्योंकि हम बचपन से जिस सामाजिक परिवेश में पले होते हैं वहां इस तरह की व्याधियों को भूत प्रेत और जिन्न से जोड़ कर ही देखा जाता है रही सही कसर टीवी और फ़िल्म पूरा कर देते हैं जो हमें इन बीमारियों के प्रति जागरूक करने की बजाय हमारे अवचेतन में यह बात अच्छी तरह बिठा देते हैं की किसी के शरीर पर किसी और कि आत्मा फिट हो सकती है जिसे तंत्र मंत्र द्वारा शरीर से उतारा भी जा सकता है.

जिस तरह से शारीरिक बीमारियां कई प्रकार की होती है ठीक वैसे ही मानसिक बीमारियां भी कई तरह की होती हैं दोनों के प्रकार अलग होते हैं दोनों के कारण अलग होते हैं इसलिए दोनों के इलाज के तरीके भी अलग होते हैं और दोनों प्रकार की बीमारियों के डॉक्टर्स भी अलग अलग होते हैं कुछ असली तो कुछ झोला छाप.

जैसे झोला छाप डॉक्टर कई शारीरिक बीमारियों को ठीक कर देते हैं वैसे ही ये बाबा गुनी ओझा लोग झोला छाप "मनोचिकित्सक" होते हैं जो इस प्रकार के वहम का इलाज वहम से करते हैं.
हालांकि "भूत" उतारने में इनकी सफलता का औसत 20 फीसदी से ज्यादा नही होता इन झोला छाप सैक्रेटिक्स के 80 फीसदी मरीज इनके काम से ठीक नही हो पाते और किसी दूसरे बाबा के पास चले जाते हैं जिन 20 प्रतिशत लोगों का "भूत" इन नकली मनोचिकित्सकों की चौखट पर उतार दिया जाता है वे ठीक होने के बाद इन बाबाओं का जबरदस्त प्रचार करते हैं जिससे उनके यहां मरीजों की भीड़ बनी रहती है.

आपके मित्र भी उस बाबा के उन 20 फीसदी ग्राहकों में से थे जो उस फर्जी साइकेट्रिक के फर्जी इलाज से ठीक हो गये इसमें चमत्कार वाली कोई बात ही नही उस बाबा के उन 80 फीसदी मरीजों से कभी जाके मिलिए जिनका "भूत" वह नही उतार पाया. तब आपको सारी असलियत का पता चल जाएगा.

TB शारीरिक बीमारी है तो मिर्गी मानसिक बीमारी है कुछ दशक पहले तक दोनों का इलाज नही था तब तपेदिक से सैकड़ों लोग मर जाते थे उसी दौर में मिर्गी को भूत बाधा समझा जाता था लेकिन आज दोनों का अलग अलग इलाज होता है और इन दोनों बीमारियों के मरीज ठीक भी हो जाते हैं.

आज के समय शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की जटिल बीमारियों का इलाज सम्भव है और आज हम जानते हैं कि किसी औरत पर आया हुआ भूत या जिन्न उसकी दिमागी बीमारी होती है जिसे हम अज्ञानता की वजह से भूत प्रेत का साया मान लेते हैं.

पुराने जमाने मे जब हॉस्पिटल और डॉक्टर्स नही होते थे उस समय लोगों की बीमारियों को वैध ठीक करते थे तब जनसंख्या कम और बीमारियां ज्यादा हुआ करती थीं और मामूली से बुखार के कारण भी थोक के भाव मे लोग मरा करते थे आगे चलकर हर बीमारी के कारणों पर शोध हुए उनकी दवाएं बनी महामारियों के टीके खोजे गए इस तरह आज मेडिकल साइंस ने हर उस बीमारी का इलाज ढूंढ लिया है जो कभी जानलेवा हुआ करती थी.

अलग अलग टेस्ट में शारीरिक बीमारियो के कारणों का पता चल जाता है जिससे जटिल से जटिल शारीरिक बीमारियों का इलाज भी आज मुमकिन है लेकिन जो बीमारियां दिमाग से जुड़ी होती हैं वो बेहद जटिल होती हैं इसलिए इनका इलाज भी मुश्किल होता है इनके लक्षणों को देखकर ही बीमारी को समझा जाता है फिर उस बीमारी की जद तक पहुंचा जाता है यह काम साइकेट्रिक या मनोचिकित्सक का होता है लेकिन इन व्याधियों के बारे में जागरूकता की घोर कमी की वजह से लोग ऐसे मरीजों को साइकेट्रिक के पास ले जाने के बजाय किसी बाबा के पास ले जाते हैं क्योंकि साइकेट्रिक की तुलना में बाबा या ओझा सस्ता पड़ता है और ओझा या बाबा किसी मनोचिकित्सक की तुलना में ज्यादा प्रचलन में भी होता है ग्रामीण क्षेत्रों के ज्यादातर लोग तो साइकेट्रिक या मनोचिकित्सक जैसे शब्द से भी परिचित नही होते.

पहले शारीरिक बीमारियों के इलाज के लिए वैध हुआ करते थे और मानसिक बीमारियों के लिए ओझा हुआ करते थे.

आज के दौर में दोनों बीमारियों के इलाज के लिए आधुनिक तरीके उपलब्ध हैं इसके बावजूद समाज मे दोनों तरह की बीमारियों के लिए झोला छाप डॉक्टरों और झोला छाप साइकेट्रिक्स यानी ओझा और बाबाओं की जरूरत भी बनी हुई है क्योंकि देश की बहुसंख्यक आबादी अच्छे इलाज की पहुंच से दूर है सरकारी हस्पतालों की भीड़ का हिस्सा बनने से हर गरीब आदमी बचना चाहता है इसलिए वह शारीरिक या मानसिक बीमारियों के उपचार के लिए सबसे पहले आसान रास्ते की तलाश करता है इसी वजह से दोनों प्रकार के झोला छाप गिरोह समाज मे सक्रिय हैं और लोगों को जमकर लूट भी रहे हैं.

ये नकली मनोचिकित्सक जिन्हें हम बाबा या ओझा कहते है अपने मरीज के इलाज के लिए तंत्र मंत्र का डरावना सा वातावरण तैयार करते हैं ताकि लोगों को उनके इल्म पर भरोसा कायम हो सके जो जितना बड़ा बाबा होता है उसका तामझाम भी उतना ही विचित्र होता है अपने ग्राहकों को झांसे में डालने के लिए ये लोग तरह तरह के चमत्कार दिखाते हैं जिन्हें देखकर मरीज और उसके परिजनों को पक्का यकीन हो जाता है की बाबा बड़ा पहुंचा हुआ है हालांकि जिन चमत्कारों के सहारे यह लोग अपनी दुकानदारी चलाते हैं वह बहुत ही आसानी से कोई भी आदमी कर सकता है बशर्ते उसे रसायन विज्ञान की थोड़ी बहुत समझ हो.

शारीरिक बीमारियों के लिए जब झोला छाप डॉक्टर्स का सस्ता इलाज नाकाम हो जाता है तब खेत बेचकर असली डॉक्टरों के चक्कर लगाए जाते हैं और मानसिक बीमारियों के लिए अनेकों बाबाओं ओझाओं की ओझौति से मरीज ठीक हुआ तो ठीक वर्ना आखिर में पागलखाना तो है ही क्योंकि इन अलग अलग बाबाओं के चक्कर में कई मरीज उस स्थिति तक पहुंचा दिए जाते हैं जहां से उनके लिए पागलखाना ही आखिरी विकल्प रह जाता है.

कुछ लोग कहते हैं कि जब किसी के ऊपर भूत या जिन्न चढ़ता है तो उसकी आवाज बदल जाती है वह अजीब हरकते करने लगता है ऐसा क्यों होता है ?

आपने ऐसे कई लोगों को देखा होगा जो बहुत कम बोलते हैं लेकिन जब वे शराब के नशे में होते हैं तो वे बिल्कुल अलग किस्म के प्राणी हो जाते हैं तब वे अजीब हरकतें करते हैं और विचित्र बातें करते हैं तब हम कहते हैं कि शराब का असर है जब नशा उतरेगा तो फिर से पहले जैसा हो जाएगा.

अल्कोहल हमारे चेतन मस्तिष्क पर हमारे कंट्रोल को कमजोर कर देता है जिससे हमारा अवचेतन हमारे चेतन दिमाग पर हावी हो जाता है जब तक नशे का असर रहता है तब तक हमारा व्यक्तित्व एकदम अलग दिखाई देता है और शराब का असर खत्म होते ही चेतन मस्तिष्क फिर से काम करना शुरू कर देता है और हम सामान्य हो जाते हैं.

भूत बाधा के समय भी यही होता है यहां हमारे दिमाग के बैलेंस को बिगाड़ने में शराब नही बल्कि कई प्रकार की टेंसन घरेलू समस्याएं और घोर डिप्रेशन की अवस्था जिम्मेदार होती है इस स्थिति में मरीज के कॉन्सेसन्स पर Subconscious Mind हावी हो जाता है जिसे हम जानकारी के अभाव भूत बाधा समझ लेते हैं.

जब इंसान के चेतन मस्तिष्क पर उसका अवचेतन हावी हो जाता है तब वह कुछ ऐसी हरकतें करने लगता है जो हमारी समझ से परे होता है और ऐसी मानसिक अवस्था को ही हम बुरी आत्मा का साया समझ लेते हैं.

एक सवाल और
देश मे कई ऐसे स्थान हैं जहां पहुंचते ही वे औरतें झूमने लगती हैं जिनके ऊपर भूतों का असर होता है ?

आपको नाचना नही आता इसके बावजूद जब आप किसी पार्टी में डीजे के पास होते हैं तो आपके पैर अपने आप थिरकने लगते हैं और जिन्हें थोड़ा बहुत भी नाचना आता है वे तो कूद पड़ते है मैदान में...

यही होता है जब पहले से बीमार औरत ऐसी किसी जगह पर जाती है जहां पहले से कई औरते झूम रही होती हैं तो वह औरत भी झूमने लगती है और इनके बीच कई ऐसी औरते भी झूमने लगती हैं जिनके ऊपर किसी आत्मा का साया नही होता.

जो भूत लोगो के शरीर पर आकर तांडव करता है वह असल मे अशिक्षा सामाजिक असमानता जातिवाद गरीबी और धर्म के अंधकार से निकला वर्षों पुराना भूत है जिसे भगाने के लिए अनेकों ओझा गुनी आकर चले गए जिन्हें हम महापुरुष कहते हैं लेकिन जहालत का यह भूत आज भी समाज पर चढ़ा हुआ है और तांडव कर रहा है समाज की अज्ञानता से उत्पन्न होने वाला यह भूत और जहालत के अंधेरे से निकलने वाला यह जिन्न शिक्षा जागरूकता और वैज्ञानिक सोच से ही खत्म हो सकता है.

जिस समाज मे उपेक्षा गरीबी और जागरूकता की कमी होती है वही सबसे ज्यादा भूत प्रेत और जिन्न होते हैं इसलिए सबसे ज्यादा भूत सबसे पिछड़े इलाकों में ही पाये जाते है जिस समाज मे जितनी ज्यादा गरीबी होगी वहां आपको उतने ही विचित्र प्रकार के भूत देखने को मिलेंगे और जहां जितने ज्यादा पढ़े लिखे शिक्षित और सक्षम लोग होंगे वहां उतने ही कम भूत देखने को मिलेंगे क्योंकि ये भूत कितने भी ताक़तवर हों शिक्षित और सभ्य समाज मे इन्हें हमेशा से डर लगता है एक शिक्षित और जागरूक समाज मे भूत प्रेत और जिन्न का साया भी नही पड़ता क्योंकि अज्ञानता के अंधकार में ही भूतों का वास होता है और अज्ञानता का यह भूत ज्ञान की चिंगारी देखते ही उल्टे पांव दूर भाग जाता है.

जब तक समाज मे वैज्ञानिक चिंतन की परंपरा का विकास नही होगा तब तक समाज मे भूत प्रेत और जिन्नों की कई प्रजातियां तांडव करती रहेंगी और इनके साथ ही फर्जी मनोचिकित्सकों की फर्जी दुकानें भी हमेशा चलती रहेंगी.

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