ईश्वर नहीं है तो सृष्टि को किसने बनाया ? - तर्कशील भारत

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Thursday, July 25, 2019

ईश्वर नहीं है तो सृष्टि को किसने बनाया ?


खुदा ने कायनात बनाई ये आकाशगंगाये ये सितारे इतना बड़ा नीला आसमान ये धरती ये नदियां पेड़ पौधे तरह तरह के परिंदे ये जानवर इंसान सब किसने बनाया कोई तो होगा जिसके इशारे से यह सब आस्तित्व में आया ?

वो कौन है जिसने ये रंगबिरंगे फूल बनाये जिंदगी और मौत खुशी और गम दिन और रात कोई तो होगा जिसके हाथों में इन सबकी डोर है ?

जब से इंसानों ने सोचना शुरू किया कई बुनियादी सवालो ने उसे परेशान किया इन उलझनों ने इंसानियत को हमेशा से उलझाए रखा फिर भी इंसान जंगलों से बाहर निकला और सभ्यताएं कायम की हालांकि इस पड़ाव तक पहुंचने के लिए उसे काफी जद्दोजहद करनी पड़ी फिर भी झुंडों में शिकार करने वाले इसी दो पाये जीव ने आगे चलकर बड़ी बड़ी सभ्यताएं स्थापित कर डाली.

इस दौरान ही उसे फुरसत के वो पल हासिल हुये जिसमे उसके ख्वाब जन्मे और जवां हुए वो कुदरत को समझने की कोशिशे करने लगा उसने गौर किया कि सूरज चाँद और सितारे रोज अपना रास्ता तय करते हैं और 365 दिनों के बाद फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं इसी दौरान मौसम बदलते हैं बरसात होती है सूखा पड़ता है फूल खिलते हैं बाढ़ आती है गर्मी पड़ती है और सर्दी आती है.

आखिर ये सब कौन करता है कुदरत के इस फ़लसफ़े को कौन गढ़ता है ? वो कौन है जो माँ की कोख में 9 महीने बच्चे को पोसता है वो कौन है जो फूल को खिलने की खूबसूरत ताक़त देता है फिर उसे खुशबू से भर देता है वो कौन है जो एक छोटे से बीज को पेड़ बना देता है फिर उस पर फल उगा देता है ? वो कौन है जो आसमान में दिया जला कर उसे धीरे धीरे चला रहा है दिन के आसमान में पीला सा आग गोला जो रोज सुबह पूरब से निकलर पश्चिम में डूब जाता है वो कौन हो जो चाँद से हमेशा छेड़छाड़ कर उसकी बनावट को बदलता रहता है वो कौन है जो हवाओं को चलाता है वो कौन है जो दरिया को राह दिखाता है वो कौन है जिसने समंदर को बनाया है वो कौन है जिसने जानवर और इंसानों को बनाया है ?

इंसान के पास ऐसा कोई सीधा तरीका नही था जिससे उसे अपने इन सवालों के जवाब मिल पाते सवाल बड़े थे और इंसान बहुत मामूली लेकिन इन बड़े सवालों को इसी मामूली इंसान के दमाग ने ही तो गढ़ा था इसलिए इंसान मामूली जरूर था लेकिन उसका दिमाग मामूली बिल्कुल नही था वो बहुत ताक़तवर था इसलिए इंसानी दमाग ने अपने सवालों के हल के लिए कई अक़ीदों को गढ़ लिया.

इन नई मान्यताओं में कई अलग अलग देवताओं की कल्पनाएं थी जो अलग अलग कुदरती घटनाओं के लिए जिम्मेदार थे.

अलग अलग सभ्यताओं में बनी अलग अलग मान्यताएं जिनके अलग अलग तरीके थे सबका मकसद बस एक ही था इंसान की बेलगाम जिज्ञासाओ को शांत करना.

लेकिन आगे चलकर यही मान्यताएं और इन अलग अलग मान्यताओं को मानने वाले लोग कबीलों में बदल गये जिनके पास अपनी अपनी मान्यताओं और कल्पनाओं का ढेर था.

इसके बाद शुरू हुआ इन अक़ीदों के आपस मे टकराने का दौर जिसमे कई सभ्यताओं ने दूसरी तहजीबों को निगल लिया या उनके साथ गठजोड़ कर लिया इससे इंसान की अलग अलग मान्यताओं ने अलग अलग मजहबों का रूप धारण कर लिया.

धर्म जिसमें खुदा का या कई खुदाओं की कल्पनाएं शामिल थीं और अलग अलग सभ्यताओं के अलग अलग खुदा थे उनका यह खुदा सिर्फ उनके लिए ही था इसलिए वो कुछ लोगों के इशारों पर काम करने लगा उस खुदा को खुश किया जा सकता था उससे दूसरों को नुकसान पहुंचाया जा सकता इस तरह खुदा ईश्वर या देवताओ की कल्पनाएं ताक़तवर होती चली गईं और अपने लाभ के लिए या दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाने लगा.

आगे चलकर कई खुदा नकली साबित किये गए कई खुदाओं की हस्तियां मिटा दी गईं और कई खुदा इंसान की बढ़ती समझ के आगे बौने साबित हुए इसलिए मिटा दिए गए.

इसके बाद दौर आया ताक़तवर खुदाओं का जो इतना मजबूत हो कि उसे कोई चुनौती न दे पाए और जिसका वजूद लंबे वक्त तक इंसानी कल्पनाओं में कायम रहे जो उसे मिटाने की कोशिश करे वो तबाह हो जाये जो उसे हमेशा खुश रखे उसे इनाम मिले ये इनाम इंसान को जिंदगी में भी चाहिए था और मरने के बाद भी.

इस तरह मरने के बाद की जिंदगी का कॉन्सेप्ट तैयार हुआ जन्नत दोजख क़यामत आख़िरत के ख्याल यही से पैदा हुए.

एक खुदा की यह साधारण सी कल्पना आगे चलकर बहुत ही ताक़तवर कॉन्सेप्ट साबित हुआ जिसे लोगों ने तेजी से स्वीकार भी किया इस दौरान आसमान से किताबें भी नाजिल होने लगीं जिसमें खुदाओं की बातें हुआ करती थी इंसानी सभ्यताओं को मजबूर किया गया कि वो उन आसमानी किताबों में लिखी बातों को आखिरी सच स्वीकार कर लें.

आगे चलकर इस खुदाई फ़लसफ़े में भी कई कमियां दिखाई देने लगीं जिन्हें ठीक करने के लिए कई अलग अलग युगपुरुष निकल कर सामने आए जिन्होंने जंग लगे पुराने खुदाओ को अपने तरीके से नया किया आसमानी किताबों के अधूरे ज्ञान को पूर्ण किया और उसे लोगों के सामने नए तरीके से पेश किया यानी पैकेट नया माल वही पुराना... यही लोग आगे चलकर पैगम्बर मान लिए गए...

एक लंबा वक्त बीता अब सभ्यताओं के पास पैगम्बरों की एक लंबी सूची थी जिसमे हर नया पैगम्बर अपने पीछे एक नई संस्कृति बनाता चला गया जिसमें खुदा तो वही था लेकिन उसका काम पहले वाले से थोड़ा अलग था अब वो बस कल्पनाओं तक सीमित न था बल्कि इंसानी कंधों तक आ पहुंचा था उसके फरिश्ते इंसान की सांसों को गिनने लगे थे.

 जो अब तक सिर्फ किताबों के पन्नो तक सिमटा हुआ था वो अब कण कण में विराजमान हो गया उसके इशारों से अब पत्ते भी हिलने लगे इसलिए उसका डर अब चारो ओर स्थापित हो गया उसके नाम पर कई गिरोह तैयार हो गये उसकी इबादत में इंसानियत तबाह होने लगीं मरने के बाद कि जिंदगी के लिए मरने से पहले की जिंदगानियाँ कुर्बान होने लगी इस तरह सर्वशक्तिमान ईश्वर की इस नई अवधारणा ने दुनिया को जितना सुकून दिया उससे कहीं ज्यादा धरती को बरबाद भी किया.

खेती की शुरुआत से लेकर आज के दौर तक इंसान ने हर पल खुद को सुधारा है अपने ज्ञान को मजबूत किया  दुनिया को समझने का उसका नजरिया बदला इंसान ने नई जानकारियां इकट्ठी कीं तकनीक का आविष्कार किया साइंस को परवाज दिया लेकिन जो मान्यताएं उसे मरने के बाद कि जिंदगी के बारे में झूठी तसल्ली दे सकती थीं उन खयालातों को उसने बंदरिया के मरे हुए बच्चे की तरह संभाले रखा.

अब दिक्कत यह हुई कि एक ओर साइंस जवां होता गया वही दूसरी ओर आसमानों का इल्म जमीन के ज्ञान के नीचे दबता चला गया यही जमीनी इल्म पुरानी मान्यताओं की सभी सीमाओं को तोड़ रहा था साइंस उन सभी सवालों के जवाब दे रहा था जो हजारों सालों के दौरान उसकी जिज्ञासाओं का कारण बनी रही थी जिसके हल के लिए न जाने कितने झूठ गढ़े गए थे पाखण्ड रचे गए थे खुदाओं की पैदाइश की गई थी मजहबों का आरंभ हुआ था पैगम्बरों की कतारें लगीं थीं और आसमानों से किताबें बरसीं थीं.

अब विज्ञान और धर्म के बीच कोई रिश्ता बाकी न रहा हालांकि कुछ वैज्ञानिकों ने यह कहते हुए की धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बिना धर्म अंधा है दोनों के बीच पुल कायम करने की कोशिशें की थी लेकिन वो ज्यादा टिकाऊ साबित न होने पाईं.

क्योंकि धर्मों की सारी फिलॉसफी पुरानी मान्यताओं पर आधारित थी जिनमे रत्ती भर का बदलाव करना भी इंसान के बस में नही था इन्हें किसी ईश्वरीय शक्ति ने नही बनाये थे फिर भी उसमें छेड़छाड़ करना वर्जित था इसके उलट साइंस का पूरा कॉन्सेप्ट टेस्ट एक्सपेरीमेंटस और शोध की बुनियाद पर कायम था इंसान विज्ञान के नए उसूलों को बना सकता था उसकी थेरीइस को बदल सकता था विज्ञान में झूठ और पाखण्डों के लिए कोई जगह नही थी यहां खयालों की पूरी आजादी थी जो मजहबों के दायरे से बाहर की बात थी इसलिए दोनों का एक दूसरे से दूर दूर तक कोई मेल ही न था दोनों साथ साथ कभी चल ही नही सकते थे इसलिए एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हो गए.

विज्ञान ने जब सृष्टि के अस्तित्व के बारे में ईश्वरीय मान्यताओं को नकारते हुए कई नई जानकारियां उपलब्ध करवाई तो धर्मों ने उन जानकारियों को ईश्वरीय दर्शन से जोड़ने की नाकाम कोशिशें की.

जब विज्ञान ने अलग अलग एलिमेंट्स को खोजा और यह समझने की कोशिश की की यह कैसे काम करते हैं तब धर्मों ने कहा कि ऑक्सीजन हायड्रोजन नायट्रोजन और कार्बन को किसने बनाया ?

साइंस ने ग्रेविटी की बात की तो मजहब ने कहा कि ग्रेविटी को किसने बनाया ?

यानी हजार 3 हजार सालों के बीच पैदा हुए खुदाओ और उनकी किताबों का सारा इल्म यहां गायब हो गया ?

आज मजहब खुदा अल्लाह गॉड ईश्वर उसकी सभी तथाकथित पवित्र किताबें और इन पर आधारित सारी मान्यताएं विज्ञान के सामने पूरी तरह नंगी हो चुकी हैं और आज का धार्मिक इंसान अपने सवालों को साथ लेकर आज भी वही खड़ा है जहां हजारों साल पहले खड़ा था.

आसमानी किताबों की जमीनी हकीकत यही है कि उनमें ज्ञान के नाम पर सिर्फ जहालत भरी हुई है इन कताबों की सारी मान्यताएं वक्त में बहुत पीछे रुकी हुई है जो आज के दौर में कचरे के सिवा कुछ भी नही है उन पर यकीन रखने वाले लोगों की सोच कभी भी वक्त के साथ कदमताल नही कर सकती इसलिए वे लोग समाज के दुश्मन साबित होते है जो आज साइंस को धर्म से कम आंकने की भूल करते हैं आज का सबसे बड़ा सच ये है कि जो कौम साइंस के साथ नही वो दुनियावी रेस में हमेशा फिसड्डी ही बनी रहेगी और मजहबों के सडांध भरे कुंए में कैद मेंढक की तरह हमेशा टर्र टर्र करती रहेगी और जो इस मजहबी कुंए से निकल भागेगा वही नास्तिक कहलायेगा.

एक नास्तिक हमेशा एक आस्तिक से ज्यादा सच्चा होता है क्योंकि वो वक्त के साथ चलता है उसे परलोक तक का सफर मंजूर नही उसे किसी जन्नत की दरकार नही एक नास्तिक इसी दुनिया को स्वर्ग बनाने का इरादा रखता है वह सच से इश्क करता है पृथ्वी से प्यार करता है और मानवता से मुहब्बत करता है क्योंकि आज उसके पास साइंस है जो उसे बिल्कुल अप टू डेट रखता है.

लेकिन एक आस्तिक के लिए ये दुनिया एक कैदखाना है तो कोई कैदी अपनी कालकोठरी से मुहब्बत भला क्यों करेगा ? उसे तो इस जेल से जल्द से जल्द निकलकर उस काल्पनिक स्थान तक पहुंचना है जहां वह हमेशा के लिए रहने वाला है जहां हसीन हुरें उसके इंतजार में हैं.

यही अंतर है एक मजहबी इंसान में और एक नास्तिक मे...

दुनिया को बदरंग और बदहाल किया है इन खयाली खुदाओ ने और उसके नेक बंदों ने....

हर दौर में इंसानों ने अपनी सहज जिज्ञासाओं का जवाब ढूंढा है लेकिन हर जवाब के बाद कई नए सवालों से इंसान का सामना भी होता आया है आज भी इंसान के सवालात खत्म नही हुए हैं लेकिन आज इंसान अच्छी तरह जानता है कि उसके सवालों का हल सड़ी हुई आसमानी किताबों में नही है बल्कि विज्ञान के पास ही है.

सूरज क्या है उसे कौन चलाता है चाँद को रोशनी कौन देता है नदियों को रास्ता कौन दिखाता है परिंदों का पेट कौन भरता है फूलों को खुशबू कौन देता है ये सितारे आकाशगंगाये कैसे काम करती हैं आज के दौर का बच्चा भी इन सवालों के पीछे के कारणों को अच्छी तरह जानता है.

आज के दौर में इंसान इन छोटे सवालों का हल ढूंढ चुका है और आज इन छोटे मोटे सवालों से कही ज्यादा बड़े सवाल हमारे सामने खड़े है जिनका जवाब आज के इंसान को ढूंढना है.

आज के इंसान के सामने जो सवाल हैं वो पहले के मुकाबले ज्यादा बड़े है क्या इस सृष्टि से अलग कोई और भी यूनिवर्स का वजूद है ? दूसरी आकाशगंगाओ में चक्कर लगा रहे अनगिनत सितारों में कितने हमारे सितारे के जैसे है जिसके इर्द गिर्द धरती जैसा कोई गोला चक्कर लगा रहा हो और क्या ऐसी किसी नई नवेली धरती पर हमारे जैसे इंसान भी मौजूद हो सकते हैं ? हमारे जैसे न सही किसी और तरह के जीव ही वहां मौजूद हों ?

क्या कभी हम उनसे मिल पाएंगे ? क्या कभी हम अपने नजदीकी पड़ोसी सौरमण्डल प्रोक्सीमा सेंतुरी तक पहुंच पाएंगे ? क्या कभी हम रोशनी की गति से सफर कर पाएंगे ?

क्या होगा जब हम किसी नजदीकी ब्लैकहोल के बिल्कुल करीब पहुंच जाएं ? क्या होगा जब इंसान की मुलाकात किसी दूसरी दुनिया के इंसान से हो ?

सवालों से डरना इंसान की सबसे बड़ी बुजदिली है और सवालों का हल खोजते रहना इंसानियत का सबसे बड़ा तकाजा है.

आज के दौर में इंसान के सामने यही प्रश्न हैं जिनका जवाब उसे ढूंढना है हर हाल में ढूंढना है जब तक इंसानी सभ्यताओं का आस्तित्व है उसे सवालों का सामना करना ही होगा और शायद वो दिन कभी न आये जब इंसान के सवाल बाकी न रहे इसलिए जब तक मानवता का वजूद रहेगा उसकी जिज्ञासाएं भी बरकरार रहेंगे और जिस दिन इंसान के सवाल खत्म हो जाएंगे वो दिन इंसानियत के लिए आखिरी दिन साबित होगा.

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