सब भाग्य का खेल है....(कविता) - तर्कशील भारत

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Monday, June 24, 2019

सब भाग्य का खेल है....(कविता)


गुरबत के अंधेरे कोनों से निकलती चीखें
अमीरी के शिखर तक कभी नही पहुंचती
क्योंकि
दोनों के बीच मे जो गहरी खाई है
वो लगातर बढ़ते क्रम में है...
बच्चे मरे या जवान
मजदूर मरे या किसान
सत्ता के बहरे कानों तक
इन मौतों की सदायें
कभी पहुंच ही नही पाती
क्योंकि सत्तासीन लोगों में
उन वेदनाओं को सुनने की 
ताक़त नही होती
हिम्मत नही होती
या शायद
फुर्सत नही होती...

हां
हर त्रासदी के बाद
कुछ सत्ताधारी लोग 
अपने बिजी शेड्यूल से
कुछ कीमती वक्त निकाल कर
घटनास्थल तक 
जरूर पहुंचते हैं
और
हर पीड़ित के जख्मों पर 
सात्वना का मरहम लगाते हैं
उनकी इस पहल से
त्रासदी के पीड़ितों को
हर मौत के बदले 
छोटा सा मुआवजा
और बड़ा सा आश्वाशन
जरूर मिल जाता है
साथ ही ये तसल्ली भी की
सब भाग्य का खेल है
शायद किस्मत को यही मंजूर था.

मुजफ्फरपुर के 
सरकारी अस्पताल के बाहर
बिलखती हुई कई मांओं की चीखें
किसी भी जिंदा इंसान को
झकझोर सकती है
विचलित कर सकती है
लेकिन हम जिंदा कहाँ 
सांसे चल रही हैं 
हम चल रहे हैं 
लेकिन
जिंदा लाश बनकर.

हम सब 
सदियों से
धर्म की जिस अफीम को चाट रहे हैं
उसने हमारी संवेदनाओं को
मार दिया है
और संवेदनाओं के मरने से
इंसान जिंदा लाश में तब्दील हो जाता है
इसलिए
हम सब मर चुके है
बस सांसे बाकी हैं
और चल पा रहे हैं
यही मामूली सा फर्क है 
हममे और
उन मुर्दा लाशों में...

मुजफ्फरपुर के अस्पताल में
170 बच्चों की मुर्दा लाशों के बीच
बहुत सी जिंदा लाशें भी भटक रही हैं
कुछ के हाथों में
कैमरे हैं तो कुछ के हाथों में राहत सामग्री
तो कुछ जिंदा लाशें ऐसी भी हैं
जो 
अपने महंगे टेलीविजन या 
कीमती एंड्रॉइड स्क्रीन पर
दूर बैठी 
मौत के इस प्रायोजित कार्यक्रम को 
देख रही है
कुछ जिंदा लाशें
चाय की चुस्कियों के साथ
क्रिकेट के स्कोर पर नजरें गड़ाएं
बच्चों की मौत के आंकड़ों पर 
विमर्श भी कर रही हैं.

सत्ता की ऊंची कुर्सियों पर विराजमान 
कुछ जिंदा लाशें
इंतजार में हैं
की कब मौतों के इस एपिसोड में
ब्रेक का समय आये
ताकि इस बीच
वे लोग
टोकरियों में लादकर
सात्वना और आश्वाशन की राहत सामग्रियों को
पीड़ित परिवारों तक पहुंचा आएं
और उन्हें समझा आएं की
सब मुकद्दर का खेल है
शायद भाग्य को यही मंजूर था.

हालांकि जिंदा लाशों की भावनाएं 
कुछ हद तक अभी मुकम्मल है
और
उनकी यह मुकम्मल भावनाएं
दूसरे के दर्द से थोड़ी सी आहत जरूर होती हैं
इन जिंदा लाशों को 
अफसोस करना भी आता है
वो हर 
बड़ी दुर्घटना पर
अपनी बेशकीमती 
संवेदनाएं प्रकट कर लेते हैं
अपना दुख जाहिर कर लेते हैं
जिंदा लाशों के इस उपकार से
मुर्दा लाशें धन्य हो जाती हैं.

और कह उठती हैं
सब भाग्य का खेल है
किस्मत को शायद यही मंजूर था

ऐसी जिंदा लाशें
मुजफ्फरपुर की इस भयंकर त्रासदी में
मुर्दा हो चुकी लाशों के लिए
कितना भी रो लें 
कितना भी अफसोस कर लें
वे मर चुके बच्चे लौट कर 
वापस कभी नही आएंगे

क्योंकि सुशाशन बाबू के कुशाशन की
अर्थियों पर लेटी 170 मासूमों की यह लाशें
आयुष्मान के कफ़न में
हमेशा के लिए
लपेटी जा चुकी हैं.

कुछ ही समय बाद
170 बच्चों की खामोश हो चुकी यह लाशें
पूरी तरह
भुला दी जाएंगी
उनकी बची खुची यादें भी 
सदा के लिए मिटा दी जाएंगी
उनकी मांओं की चीखें भी
हमेशा के लिए बिसार दी जाएंगी
गूगल पर वेदनाओं की
कुछ तस्वीरों के सिवा
उनका कुछ भी शेष नही बचेगा.

ऐसे में
भूख से आग से या 
लू लगने से मर रहे लोगों को
भला कौन याद रखेगा ?

आज किसके पास इतनी फुर्सत है कि
वो दो साल पीछे के 
उस हादसे को याद करे
जब मिड डे मील खाकर
40-50 बच्चे मारे गए थे ?
किसके पास फुरसत है कि वो
उन 150 बच्चों की लाशों को याद करे
जो ऑक्सीजन की कमी से
तड़प तड़प कर 
हमेशा के लिए
खामोश हो गए थे ?

सब तकदीर का खेल है
शायद भाग्य को यही मंजूर था.

जिंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथों में है
हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं
कोई भूख से मरे या दंगों में
कोई आग से मरे या बीमारी से
कोई चमकी से मरे या 
ऑक्सीजन की कमी से
सब ऊपरवाले कि मेहरबानी है
इसमें
नीचे वालों का क्या दोष ?
सब भाग्य का खेल ही तो है
मौसम बदलता रहेगा और
यह सब 
निरंतर चलता रहेगा
गर्मी का सीजन खत्म होते ही
हर साल की तरह
इस बार भी
बाढ़ के प्रकोप से लोग विस्थापित होंगे
चीखें उठेंगी पलायन होंगे घर उजड़ेंगे 
मौतें होंगी
मौकाए वारदात पर
हर बार की तरह फिर से
गिद्धों का जमघट होगा
ढेर सारा आश्वाशन और मुट्ठी भर मुआवजे से
पीड़ितों की झोलियां
भर दी जाएंगी
यह सब नौटंकी
बरसात के खत्म होते ही
खत्म हो जाएगी
और हर बार की तरह
भुला दी जाएगी
क्योंकि जो करता है 
ऊपरवाला करता है
और वो जो करता है
सब ठीक ही तो करता है
इसमें सरकारों का
उसके मंत्रियों का भला क्या दोष ?

सब भाग्य का खेल ही तो है

गर्मी सूखा और बरसात के बाद
सर्दियों की सुगबुगाहट शुरू होगी
फुर्सत के इन दिनों में
हाशिये के लोग 
दंगों की आग में झोंक दिये जाएंगे
एक बार से
घर जलेंगे चीखें उठेंगी
बलात्कार होंगे विस्थापन होगा

हर घटना के बाद
इंसान नुमा गिद्ध
फिर से
मौकाए वारदात पर 
अपने बिजी शेड्योल से
कुछ कीमती क्षण बचा कर
आश्वाशन और सहानुभूति की
सरकारी मदद लेकर हाजिर होंगे

और त्रासदी के शिकार लोगों को 
यह समझाएंगे की
सब भाग्य का खेल है शायद 
किस्मत को यही मंजूर था.

इस आश्वाशन और मुआवजे के 
भारी भरकम बोझ तले दबा गरीब 
इस दुर्भाग्य को 
अपने भाग्य में लिखा हुआ मानकर
संतुष्ट हो जाएगा
और उज्ज्वल भविष्य की कामना लिए
अपने वर्तमान के गमों को भूल जाएगा

तब तक सर्दी आ जायेगी 
पूरे साल मौत जिन घरों का रास्ता 
भूल गई थी
जो लोग
दंगों से बारिश से आग से 
ट्रेन से या खुदकुशी से बच गए थे
अब उनकी बारी आएगी

प्रतिदिन सैंकड़ों की तादाद में
ढंड से मौतें होंगी
गरीब के घरों से जनाजे उठेंगे
फिर से चीखें गूंजेंगी
घर उजड़ेंगे
मातम पसरेगा

एक बार फिर से 
सात्वना और आश्वाशन 
के साथ
भाग्य की चर्चा होगी
और फिर 
सर्दी के खत्म होते ही
लाश की तरह 
सब शांत हो जाएगा

हर बार की तरह
इस शांतिकाल में भी
भक्तिकाल का दौर शुरू होगा
अठजाम आराधना तीर्थ हज 
जमात हक़ीक़ा अखण्ड पाठ 
मिलाद शिवचर्चा जगराता
कुरानखानी पूजा और विसर्जन में मस्त गरीब
इस भक्तिकाल में 
बीती हुई बातों पर मिट्टी डालते हुए
सच्चा भक्त बन जाएगा
और गुजरी हुई हर त्रासदी को
भूल जाएगा

फरवरी से अप्रेल के बीच 
एक बार फिर से
खुशगवार मौसम आएगा
इस बीच सड़कों पर 
गलियों में
ट्रेन हादसों में
और दंगों में
हर साल की तरह
लोग मरते रहेंगे 
चीखें उठती रहेंगी
घर उजड़ते रहेंगे
विस्थापन होता रहेगा

और हर त्रासदी के बाद
भक्तिकाल का कोई भी भगवान
जो कण कण में विराजमान है 
या रहमानुररहीम अल्लाह
जो हर शय पर कादिर है
वह
अपने भक्त या बन्दे की पीड़ा को देखने 
उसके जख्म पर मरहम लगाने
उसकी वेदनाओं को महसूस करने
मौकाए वारदात तक
कभी नही पहुंचेगा

आएंगी तो वही कुछ जिंदा लाशें
जो हर बार की तरह
बांटती रहेंगी
सात्वना और आश्वाशन की
गढरिया
और
चढ़ाती रहेंगी
मय्यतों पर
किस्म किस्म के फूल

और हर गरीब को समझाती रहेंगी की
सब भाग्य का खेल है
शायद किस्मत को यही मंजूर था.

गरीब आदमी 
एक बार फिर
अपने इस दुर्भगय को
अपना भाग्य समझकर कर
सब कुछ
भूल जाएगा.

क्योंकि जो करता है 
ऊपरवाला करता है 
नीचे वाले का क्या दोष ?

तब तक फिर से गर्मी आजायेगी
वही गर्मी
जिसमे भयंकर लू चलती है
और यह लू 
कई इंसानों को
लाशों में बदल देती है
सैंकड़ों की तादात में....

गर्मी के इस तपते हुए मौसम में
घरों में आग लगेगी
गांव के गांव जलेंगे
एक बार फिर से
चीखें उठेंगी 
दर्द आंसू और रुदन की 
इस भयंकर त्रासदी के बाद
एक बार फिर से 
कुछ लोग हाजिर होंगे
हाथों में सात्वना आश्वाशन और 
मुआवजे की सरकारी सहायता लिए....

और पीड़ितों को समझाएंगे कि
सब भाग्य का खेल है
शायद किस्मत को यही मंजूर था

इस एक लाइन में 
वो जबरदस्त ताक़त है कि
मामूली सी यह एक पंक्ति
दर्द चीख घाव दमन शोषण और मौत
इन सारी वेदनाओं को क्षण भर में 
शांत कर देती है
प्रतिकार की भावना को नष्ट कर देती है
सुधार की गुंजाइश भी बाकी नही बचती
और
परिवर्तन की जरूरत भी खत्म हो जाती है....

सब भाग्य का खेल है 
शायद किस्मत को यही मंजूर है.

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