बेटी बचेगी तभी तो पढ़ भी पाएगी... - तर्कशील भारत

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Tuesday, June 11, 2019

बेटी बचेगी तभी तो पढ़ भी पाएगी...


आज
मुझे खुद को 
सामाजिक प्राणी कहने में भी 
शर्म आ रही है
क्योंकि 
मैं जिसे समाज कहता हूं 
वह 
वहशी दरिंदों का झुंड बन चुका है
जहां चारों ओर
दर्द है चीख है जख्म है घाव है
इसके अलावा भी 
अगर यहां कुछ और है
तो वह सिर्फ और सिर्फ
एक खामोश सा डर है 
एक ऐसा डर
जो मेरे चारों ओर मंडरा रहा है
हर क्षण हर समय.

इसी डर से मैं 
हर पल बचना चाहता हूँ
अपनी बेटियों को भी 
इसी भयानक डर से 
बचाना चाहता हूँ
क्योंकि 
बेटियां बचेंगी
तभी तो पढ़ भी पाएंगी

इसलिए मुझे हर पल 
यह डर सताता है कि
न जाने कब कोई दरिंदा
उन्हें नोंच डाले
उसके जिस्म को 
रौंद डाले
उसकी मासूमियत को
हमेशा के लिए कुचल डाले
एक महकते हुए फूल को 
खिलने से पहले ही
अपने खूनी जबड़ों से
चबा डाले

मुझे यह भी डर है कि 
न जाने कब 
अचानक
दरिंदों की एक बेलगाम भीड़
मेरे घर मे घुस आये
और 
मेरे परिवार को
नेस्तनाबूद कर डाले

मुझे यह भी डर है कि
न जाने कब 
मैं किसी वहशी 
और भूखे भेड़ियों की भीड़ का 
शिकार हो जाऊं
और वे
मेरे बदन को
पैट्रोल में भूंज कर खा जाएं

यह मेरा डर ही तो है
जो मुझे भी
हैवान बना देना चाहता है 

लेकिन 
मेरी थोड़ी सी बची खुची संवेदनाएं
मुझे हैवान होने से रोक देती हैं

इसलिए फिलहाल मैं खुद को
इंसान कह सकता हूँ
लेकिन अब 
मुझे अपने इंसान होने पर
शक भी है और शर्म भी
क्योंकि मैं 
ऐसे समाज मे जिंदा हूँ
जहां मेरे चारों ओर
मासूमियत तड़प रही हैं
मुस्कुराहटें मसली जा रही हैं
किलकारियां नष्ट हो रही हैं
इन सबके बीच
मैं देख रहा हूँ कि
भावनाओ की सूख चुकी नदी पर
कागज के बनावटी उसूल 
तैर रहे है

आंसुओं की घनघोर घटाओं के बीच
वेदनाओं की बिजलियाँ चमक रही हैं

चीखते झूठ के बीच
सच्चाई की आवाजें
खामोश की जा रही हैं

बेशर्म सत्ता के कदमों तले
बदहवास गरीबी घुटने टेक चुकी है

कानून का 
70 साल पुराना तराजू 
जस्टिस की मार्किट में
सरेआम बिक रहा है

न्याय और समानता की 
बकवास लाइनें 
जिन किताबों में कभी लिखी गई थी
वो रद्दीयां 
कब की
जलाई जा चुकी हैं

सत्ताधीशों और मठाधीशों के कूड़ेदान में
संविधान के कुछ पन्ने
अभी साबुत हैं 
जो जलने से बच गए थे

आज मैं
सबसे ज्यादा हैरान हूं
परेशान हूँ
साथ ही
डरा हुआ भी हूँ
क्योंकि
मैं भी
एक बेटी का बाप हूँ

जो अब उन्नीस साल की हो चुकी है
आज के हालात में
यह मेरे लिए 
जश्न की बात हो सकती है
की वह 
खूंखार दरिंदों के 
इस इंसानी बीहड़ मे भी
19 साल की उम्र पार करने में
कामयाब हो गई

मैं हैरान हूँ कि
मेरी बेटी
बच भी गई
और पढ़ भी गई

लेकिन परेशान हूँ
यह सोचकर की
हर बेटी
इतनी खुशकिस्मत नही

6 माह 6 साल और 16 साल की बेटियां
हर दिन 
घात लगाए बैठे 
हवस के भूखे भेड़ियों की
शिकार हो रही हैं
वासना के भूखे ये खूंखार दरिंदे
हर गली हर नुक्कड़ पर 
बेटियों की ताक में छुपे बैठे है
मौका मिलते ही वे
बेटियों के जिस्म से उसकी बोटियों को 
अलग कर देते हैं
उसके नाजुक बदन को
चीर डालते है
उसके कोमल मांस को
कच्चा चबा डालते हैं
हवस के ये भूखे दरिंदे
बेटियों की बोटी बोटी नोच कर
आपस मे बांट लेते हैं

हमारा सभ्य समाज
इसी असभ्य कारनामे को
बालात्कार की संज्ञा देता है.

और

बेटियों के ऐसे हर शिकार के बाद
हमारा समाज 
असभ्यता और बर्बरता की ओर
एक कदम आगे की ओर बढ़ जाता है

जानवर से इंसान बनने में
झुंड से समाज बनने में
लंबा वक्त जरूर
लगा 
लेकिन इंसान से जानवर बनने में
और समाज से झुंड बनने में
अब ज्यादा देर नही
डार्विन के विकासवाद की थ्योरी में
काफी पेंच छुपे थे
जो अब जाहिर हो रहे हैं

डार्विन के 
सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट
का मतलब अब समझ आता है
वह है 
वर्चस्व की लड़ाई में
वही जीतेगा जो
सत्ता के साथ रहेगा

मैं हैरान हूं यह देखकर की
बालात्कार पर होती राजीनीति
राजनीति के रोज होते बालात्कार 
की घिनौनी दास्ताँ बयाँ कर रहे हैं

मैं हैरान हूँ
यह सोचकर की
साम्प्रदायिक पैमाने पर
बालात्कार की शिकार या शिकारी
फायदेमंद साबित हो रहे हैं
कौन सी लाश 
कितनी TRP दे सकती है
कौन सा अपराधी
वोटों का कितना ध्रुवीकरण कर सकता है
इस नजरिए के साथ
बालात्कार का विरोध या समर्थन हो रहा है

मैं हैरान हूँ यह जानकर की
जिन बालात्कारों में
साम्प्रदायिकता का मजा नही है
उन वारदातों पर
हमारा सभ्य समाज
खामोशी की चादर ओढ़े
सोया रहता है.

मैं हैरान हूं कि
हमारा सभ्य समाज
एक पागल कुत्ते की तरह
तभी जागता है 
जब वह 
लाश के मजहब को
सूंघ लेता है

मैं हैरान हूं ये देखकर की
हर जघन्य बालात्कार के बाद
मौकाए वारदात से 
बच्ची की लाश से पहले
उसके मजहब की तफ्तीश हो रही है

मैं हैरान हूं
यह सोचकर कि
बेटियों के जिस्म में
वो कौन सी चीज छुपी होती है
जिसे पाने के लिए दरिंदे 
उसकी ताक में घात लगाए 
छुपे रहते हैं
और मौका मिलते ही
उन पर
टूट पड़ते है

मैं जानना चाहता हूं कि
6 दिन 6 महीने 6 साल की 
बच्ची में भी क्या वही टेस्ट होता है 
जो एक 60 साल की बूढ़ी औरत में होता है ?

मेरे यह सवाल 
मुझे हर पल कचोटते हैं
मेरा यह डर
मुझे उदासियों से भर देता है

मेरी यह नाजायज दहशत
मुझे हर बार
कहती है कि
मेरा यह डर जायज है

और जब भी 
मेरा यह डर
मेरे वजूद पर हावी होता है
मैं रो पड़ता हूँ
 टूट जाता हूँ
बिखर जाता हूँ
बिफर पड़ता हूँ

जब भी मैं 
हैवानियत की शिकार
किसी बेटी के मरने की 
खबर पड़ता हूँ
मुझे खुद के जिंदा होने पर
दुख होता है
ऐसा लगता है जैसे
मेरे जिस्म से मेरा वजूद
मिट रहा है
मेरी रगों से मेरा लहू
निचोड़ा जा रहा है
मेरी आँखों से 
भविष्य के मेरे सुनहरे सपने
बिखर रहे हैं

तब 
मैं ढूंढता हूँ उस खुदा को
जिसके इशारे के बिना 
एक पत्ता भी नही हिलता

मैं पुकारता हूँ उस परमात्मा को
जो संकट के समय अवतार लेता है

मैं बुलाता हूँ उस यहोवा को
जो अपने बन्दे पर दया रखता है

मैं चाहता हूं ये तीनों एक साथ आएं
और मुझे बताएं 
की ये दुनिया उनमे से किसने बनाई
और क्यों बनाई

इनमे से 
वो कौन है 
जो खुद को 
सबसे बड़ा दयालु कहता है

वो कौन है 
जो इनमे 
सबसे सर्वशक्तिमान होने का 
दावा करता है

वो कौन है
जो कहता है हो जा तो 
एक क्षण में वो काम हो जाता है

वो कौन है जो
अपने भक्तजनों के संकट
क्षण भर में 
दूर करने की गारंटी देता है

इनमे से जो भी 
सामने आएगा
उसे उसी क्षण 
बारूद से उड़ा देना उचित होगा

क्योंकि वह झूठा है
मक्कार है फरेबी निर्दयी है
सभी बालात्कारों का 
जिम्मेदार वही है
सभी लाशों का
कातिल वही है
और
सभी चीखों का 
गुनहगार भी वही है

मुझे नफरत है
खुदाओं के इस गिरोह से

मुझे घृणा है 
हर उस तहजीब से
जो इंसान के अंदर की तमीज को
हैवानियत में तब्दील होने से नही रोक पाती

मैं विरोध करता हूँ
हर उस संस्कृति का
जो इंसान को 
भीड़ बनाती है

मैं इनकार करता हूँ
हर उस रिसालत का
जो इंसान को भेड़ बनाती है

मैं थूकता हूँ हर उस तंजीम पर
जो इंसान को भेड़िया बनाती है

जब कोई बेटी 
दरिंदों के शिकंजों में 
फंस कर 
चीखती है चिल्लाती है
सिसकती है बिलखती है
तब 
सर्वशक्तिमानों का यह झुंड
कही नजर नही आता

ईश्वर लापता हो जाता है
यहोवा गुम हो जाता है
गॉड मर जाता हैं
और अल्लाह 
बेशर्मी के किसी अंधेरे कोने में
मुंह छुपा लेता है
या
ये सबके सब 
निर्लज्ज होकर
मासूमियत से बालात्कार के 
इस खौफनाक मंजर का
लुत्फ उठाते हैं
हर घटना पर
जाम टकराते हैं
हर चीख पर 
जोर जोर से अट्टहास करते हुए 
अगली घटना की प्लालिंग में
जुट जाते हैं.

लेकिन इंसानियत का दुश्मन 
सर्वशक्तिमानों का ये गिरोह
ये भूल जाता हैं कि
जिस इंसान ने 
उन्हें अपने हाथों से मढ़ा है
उनका तसव्वुर और उनकी तस्वीरों को 
बड़ी श्रद्धा से गढ़ा है
उसके फलसफों और उसकी रवायतों को 
जिन हाथों ने और जिन दिमागों ने
जिन खयालो ने जिन विचारों
बड़ी तसल्ली और इत्मीनान से
तैयार किया है

एक दिन वही इंसान
अपने उन्ही नापाक हाथों से
इस पूरे खुदाई निजाम को 
हमेशा के लिए उखाड़ फेंकेंगा

एक दिन इन्ही इंसानी हाथों से

खुदा भगवान गॉड अल्लाह 
उसका मजहब और उसकी इबादत
आयतें और उसकी रवायतें
उसूल और उसके रसूल 
ये सबके सब
क्षण भर में 
मिट्टी में मिला दिए जाएंगे

और इन सब के नाम पर
पलने वाले
खूंखार मजहबी गिरोह भी
मजहबों की चिताओं के साथ ही
जला दिए जाएंगे
या धर्मों के मकबरे में
हमेशा के लिए दफन कर दिए जाएंगे

तब न कोई डर होगा 
न कोई दहशत होगी
तब किसी बेटी की बोटियो को
कोई भेड़िया 
बोटी बोटी नही कर पायेगा.

तब किसी बेटी को 
किसी खूंखार दरिंदे से 
बचाये जाने की 
जरूरत भी नही होगी 
तब हर बेटी पढ़ेगी आगे बढ़ेगी
बिना किसी भय के बिना किसी डर के...

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