मैं 70 साल का बूढा लोकतंत्र हूँ - तर्कशील भारत

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Wednesday, June 12, 2019

मैं 70 साल का बूढा लोकतंत्र हूँ


मैं 70 साल का बूढा लोकतंत्र हूँ
हर 26 जनवरी को 
अपना जन्मदिन धूम धाम से मनाता हूँ
 हर पांच साल पर 
अपनी केंचुली उतारता हूँ
सजता हूँ संवरता हूँ निखरता हूँ
फिर सब भूल जाता हूँ

क्योंकि मेरी याददाश्त कमजोर है
 मैं 70 साल का बूढा लोकतंत्र हूँ

मैं बूढ़ा हो चुका हूँ
अपने ही वजूद से 
अब हार चुका हूँ
अपने जज्बातों की मौत पर
कई बार जश्न भी देख चुका हूँ
मेरे कमजोर हो चुके कंधो पर
जिम्मेदारियों का भारी बोझ है
जो लगातार बढ़ता जा रहा है
जिन्हें लेकर मैं
निर्बाध चला जा रहा हूँ
इसलिए निरंतर कमजोर हो रहा हूँ
और
मेरे पैरों में 
कई बेड़ियां हैं
जो लगातार मजबूत हो रही हैं

मेरी याददाश्त भी अब कमजोर हो चुकी है
क्योंकि मैं 70 साल का बूढा लोकतंत्र हूँ

मेरे हाथों में लिखी
प्रस्तावना की लकीरें भी
अब मिट चुकी हैं
या धूमिल हो चुकी हैं

मेरी नजरें लगातार
मन्द हो रही हैं
मेरे होंठ सुष्क हो रहे हैं
मेरे जज्बात
विलुप्त हो रहे हैं
मेरे सपने हसी हैं लेकिन
मेरे हालात बिगड़ चुके है
इरादे जवान है लेकिन
हिम्मत बूढ़ी हो चुकी है

जिन पगडंडियों पर मैं चल रहा हूँ
वहां चारों ओर मुश्किलों के बियाबान है
कठिनाइयों के जंगलात हैं 
अशिक्षा का अंधेरा है
कुपोषण का घना कोहरा है
जो लगातार और घनघोर होता जा रहा हैं
मेरे चारो ओर दर्द चीख और उदासियों की
सदायें गूंज रहीं है
जख्म रुदन और उबासियों की
डरावनी परछाईया मेरा पीछा कर रही हैं
गरीबी की खौफनाक वहशत
मुझे लगातार डरा रही है
घृणा की विषैली हवाएं 
मेरे बदन को चीर रही हैं
नफरतों के इस तूफानी सफर में
मेरा आस्तित्व बिखर रहा है
हिंसा की बेतहाशा बारिश में
मेरा तन बदन भीगा हुआ है
इस घुप्प अंधेरे को चीरती हुई
कई डरावनी आवाजें 
मुझे लगातार 
कचोटती हुई चली आ रही है
शोषण और दमन की 
ये जिंदा आवाजें
उन मुर्दों की हैं
जो कभी
मेरे ही पैरों तले
कुचले गए थे

मुझे याद नही
की मैंने अपने लोगों को
कितनी राहतें दी है
बस मुझे इतना याद है कि
मेरे अपने लोगों ने मुझे
कितना जख्म दिया है

मेरी याददाश्त कमजोर हो चुकी है
क्योंकि मैं 70 साल का बूढा लोकतंत्र हूँ

जब भी मैं अपने वर्तमान को 
करीब से देखने की कोशिश करता हूँ
मुझे मेरा इतिहास याद आ जाता है
कितनी मुश्किलों के बीच 
मेरा जन्म हुआ था
मेरे पूर्वजों ने 
कितनी दुश्वारियाँ को झेलकर 
मेरी परवरिश की थी
मुझे बड़ा किया
मुझे सक्षम बनाया
लेकिन कब मैं जवां हुआ 
मुझे याद नही
हाँ इतना जरूर याद है कि
युवावस्था की शुरुआत में ही
मेरे अपनो ने
मेरा अपहरण कर लिया था
मेरे साथ मेरे सपनों को भी
सत्ता के पैरों तले कुचल दिया था
एमरजेंसी के उस कठिन दौर से
निकला हूँ
उसके बाद
लगातार बुढ़ापे की ओर बढ़ा हूँ
बचपन और बुढ़ापे के 
दरम्यान का जो हसी पड़ाव होता है
मेरी जन्दगी में 
वो खूबसूरत समय कभी आया ही नही
खुशहाली का सुंदर दौर 
मैंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी देखा ही नही

मेरी आँखों के सामने भयंकर जनसंहार हुए
आबरू नोंची गई जिस्म तारतार हुए
अस्मते लूटीं गईं जघन्य बालात्कार हुए

धर्म और मजहब नाम के 
दो चाकों के बीच फंसा मैं
कराहता रहा
चीखता चिल्लाता रहा
लेकिन मेरे ही लोगों ने
मेरी पुकार को अनसुना कर दिया

झगड़े लफड़े आतंक गरीबी और जातिवाद 
इन सब को झेलते हुए 
कब मैं निढाल हुआ मुझे मालूम नही

दमन उत्पीड़न कुपोषण भय और भूख
इन सब के बीच
कब मैं बदहाल हुआ मुझे मालूम नही

मेरी याददाश्त कमजोर हो चुकी है
क्योंकि मैं 70 साल का बूढा लोकतंत्र हूँ

जब भी मैं उन आंखों को याद करता हूँ
जिनमे अब उम्मीदों के सिवा 
कुछ भी बाकी नही 
रो पड़ता हूँ 
क्योंकि 
इन उदास आँखों को 
हसीन सपने मैंने ही तो दिखाए थे
जब भी मैं
उजाड़ हो चुके
बगीचों को देखता हूँ
हैरान हो जाता हूँ
क्योंकि
मैंने
कभी अपने हाथों से 
इन्हें सींचने की कोशिश की थी
बेबसी का मुकद्दर हाथों में लिए 
फुटपाथों की खाक छानते मासूम बच्चों को
जब भी मैं देखता हूँ
कांप उठता हूँ
क्योंकि इनके हाथों में
किताबों का वादा मैंने ही तो किया था
उनके भविष्य की गारंटी 
मैंने ही तो ली थी
जब भी मैं 
उन चेहरों को देखता हूँ
जिनके गालों को
कभी मैंने प्यार से सहलाते हुए 
उनसे कहा था
अच्छे दिन जरूर आएंगे
आज भी उन चेहरों पर 
मेरे उंगलियों के निशान बाकी हैं
मेरा प्यार से उनके गालों को सहलाना
उनके चेहरे पर पड़ा
इतना जोरदार तमाचा कैसे बन गया
मुझे याद नही

जब भी मैं किसी 70 साल के बूढ़े लाचार
बेबस और बदहाल चेहरे में झांकता हूँ
मुझे अपना प्रतिबिंब नजर आता है
इन झुर्रीदार बूढ़ी आंखों में कभी
हजारों ख्वाब पले होंगे
यह बूढा दिल भी कभी जवा रहा होगा
जिनमे सैंकड़ों अरमान जगे होंगे
इस बुजुर्ग चेहरे के पीछे जो 
लाचार आदमी छुपा है
उसके पास भी कभी
एक सुंदर भविष्य रहा होगा
जिसे उसने अपनी गठरी में 
छुपा कर बड़े जतन से 
संभाला होगा
लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर
भविष्य का वह मामूली 
मगर कीमती गट्ठर
उसके लिए भारी बोझ 
बन गया है 
जो उसके साथ ही 
हमेशा के लिए
आग में जल जाएगा
दफन हो जाएगा

ये उस बूढ़े का दुर्भाग्य है या मेरी असफलता
मैं नही जानता.

मेरी याददाश्त कमजोर हो चुकी है
क्योंकि मैं 70 साल का बूढा लोकतंत्र हूँ

कभी मैं भी
गुरबत घृणा और नाउम्मीदी 
को मिटाने की सोच रखता था
हालात को बेहतरी की ओर ले जाने का 
जोश रखता था

भ्रष्टाचार को 
जड़ से मिटा देने की चाहत थी मन मे
समता बंधुता न्याय और भाईचारे का 
तसव्वुर था जहन में

लेकिन न वो वक्त आया 
न हालात सुधरे
कोशिशें तो बहुत कीं
लेकिन सफलता नही मिली
मैं लायक था लेकिन
मुझे ऊर्जा देने वाले लोग
नालायक साबित हुए

जिन पर मुझे एतबार था
मेरी आँखों के सामने
वे लोग मेरा शोषण करते रहे
मुझे कमजोर करते रहे
और फिर मेरी कमजोरियों का फायदा उठाते हुए
मुझे लगातार और कमजोर करते रहे.

इसलिए मैं अब हार चुका हूँ
और आगे बढ़ने की ताकत भी अब खो चुका हूँ

क्योंकि
ख्वाहिशें जिंदा हैं लेकिन जज्बात मर चुके हैं
आंखे जिंदा हैं लेकिन ख्वाब मर चुके हैं
इंसान जिंदा है लेकिन इन्सानियत मर चुकी है
वहशियत जिंदा है लेकिन जहनियत मर चुकी है
फ्रेम जिंदा है लेकिन तस्वीरें मर चुकी हैं
लकीरें जिंदा हैं लेकिन तहरीरें मर चुकी हैं
भीड़ जिंदा है लेकिन तहजीब मर चुकी है
तरीके जिंदा हैं लेकिन तरकीब मर चुकी है
जिस्म जिंदा हैं लेकिन आत्माएं मर चुकी हैं
उम्मीदें जिंदा है लेकिन आसनाएँ मर चुकी हैं
वासनाएं जिंदा हैं लेकिन भावनाये मर चुकी हैं
अस्मिताएं जिंदा हैं लेकिन संवेदनाएं मर चुकी हैं

मेरी याददाश्त कमजोर हो चुकी है
क्योंकि मैं 70 साल का बूढा लोकतंत्र हूँ

ये मेरी विफलताएं है जिनपर 
मुझे शर्म आनी चाहिए
ये मेरी हकीकत है 
जिसपर मुझे रोना चाहिए

क्योंकि मुझसे उम्मीदें लगाए 
आधा हिंदुस्तान आज भी हासिये पर खड़ा है
वो मुझसे 
अपने भविष्य की बेहतर गारंटी चाहता है
वो मुझसे 
सुख समृद्धि और प्रगति की अपेक्षाएं रखता है
वो चाहता है 
उसका यह बूढ़ा और लंगड़ा लोकतंत्र 
उसकी हर ख्वाहिशों को 
एक झटके में पूरी कर दे

लेकिन कैसे ? 

यह सवाल मेरा नही है

इसलिए इसका जवाब उन्हें ढूंढना होगा
जो उम्मीदों की पंक्ति में 
सबसे पीछे खड़े हैं
इस सवाल का जवाब उन्हें खोजना होगा
जो 70 सालों के मेरे सफर में
आज भी निर्बल से पड़े हैं
इस सवाल का जवाब उन्हें ढूंढना होगा
जो आज भी इस जिद पर अड़े हैं कि
अच्छे दिन जरूर आएंगे.

फिलहाल मैं विकास के भारी बोझ को
ढोते हुए और वक्त से नजरें चुराते हुए 
अंतहीन और अनिश्चित भविष्य की ओर
बढ़े जा रहा हूँ.

इस विश्वास में की 
एक दिन हासिये पर खड़े लोग
अपने सवालों के हल खोज लेंगे
नाउम्मीदी की अंधेरी फजाओं के बीच
आशाओं का उजाला ढूंढ लेंगे
घृणा की जहरीली हवाओ का रुख भी
एक दिन जरूर बदलेगा
उदास आंखों के गुम हो चुके ख्वाब
फिर से जाग उठेंगे
मायूस चेहरे भी
अपनी खो चुकी मुस्कान के साथ
फिर से खिल उठेंगे
उजड़ चुके बागों में 
फिर से बहारें लौटेंगी
दुख के बादल छटेंगे
पैरो की बेड़ियां टूटेंगी
उम्मीदों की चिंगारी
बेबसी के मुकद्दर को
जला देगी
खुशियों का सवेरा 
गमों के अंधकार को 
भगा देगा
सत्य की तेज हवाएं
पाखण्डों की बुनियाद को 
हिला देगी
प्रेम की ऊर्जावान सदायें
नफरतों के विषैले वृक्ष को
उखाड़ फैकेंगी
और
परिवर्तन की नई संस्कृति
सड़ चुकी पुरानी परंपराओं को
हमेशा के लिए
मिटा देगी

मुझे उम्मीद है 
एक दिन मेरा भी समय आएगा

तब मैं बूढा निढाल मायूस 
फिर से जवां हो जाऊंगा

फिलहाल तो बस यह एक ख्वाब है
और इन सपनों के अलावा मेरे पास शेष कुछ नही

मेरी याददाश्त कमजोर हो चुकी है
क्योंकि मैं 70 साल का बूढा लोकतंत्र हूँ

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