क्या दुख का संबंध भाग्य से है ? - तर्कशील भारत

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Thursday, April 25, 2019

क्या दुख का संबंध भाग्य से है ?


आज हर आदमी दुखी है हमारे चारों ओर दुख ही दुख है कोई इसलिए दुखी है क्योंकि उसके पास कुछ भी नही है न घर न जमीन और न ही ढंग की नौकरी कोई इसलिए दुखी है क्योंकि उसके पास नौकरी तो है लेकिन घर नही है किसी के पास घर है तो नौकरी नही है किसी के पास दोनों है लेकिन उसे ढंग की बीबी नही मिली किसी के पास मकान नौकरी और बीबी तीनो है लेकिन उसे अभी तक बच्चा नही हुआ किसी के पास बीबी बच्चे घर नौकरी सब है लेकिन फिर भी दुखी है क्योंकि वह अपने बच्चों को वो सुख नही दे पा रहा जो वह चाहता है वह चाहता है कि उसके बच्चे महंगे स्कूल में पढ़े उसके पास भी बड़ा सा घर हो अच्छी नौकरी हो बैंक बैलेंस हो रुतबा हो जिसके पास यह सब है वह भी दुखी है क्योंकि वह चाहता है कि उसके बच्चे विदेश में पढ़े धन की कोई कमी न हो और जो विदेशों में सेटल हैं उन्हें भी कोई न कोई दुख जरूर है दुखों की इस सीढ़ीनुमा व्यवस्था में नीचे वालों के लिए उनसे ऊपर जो भी है उन्हें लगता है कि वो सुखी है.

और जो लोग वास्तव में सुखी है उन्होंने कभी न कभी दुख जरूर झेला है और भविष्य में वह कभी भी दुखी हो सकता है इसी डर से वह भी आज पूरी तरह सुखी नही है.

इसलिए हम अक्सर सोचते हैं कि दुनिया मे कितना गम है मेरा गम कितना कम है.

आखिर दुख क्यों होते हैं संसार मे कोई दुखी और कोई सुखी क्यों है ? क्या यह सब भाग्य की वजह से है ?
आइए इन सवालों का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं.

हम जिस देश काल या परिस्थिति में पैदा हुए इसे किसी ने तय नही किया बल्कि जिस देश काल या परिस्थिति में हमारे माता पिता ने संभोग किया उसका परिणाम हैं हम.

अब अगर कोई साउथ अफ्रीका के किसी दूरदराज के आदिवासी कबीले में किसी स्त्री पुरुष ने मिलन किया है तो उसके परिणामस्वरूप जो बच्चा पैदा हुआ वह एक अफ्रीकी आदिवासी का बच्चा होगा जिसका कबीला बाकी दुनिया से कटा हुआ है इन्ही परिस्थितियों में उसकी परवरिश होगी और बड़ा होने पर वह उन्ही संस्कारों को ढोएगा जो उसे विरासत में मिली होंगी यहां जीवन भर वह जो भी दुख झेलेगा उसके लिए वह जिम्मेदार नही है बल्कि वो देश काल और परिस्थिति है जिसमे उसका जन्म हुआ देश काल और परिस्थिति का संयोग प्राकृतिक था इसलिए उसके दुखों का कारण भी नेचर ही है.

अब आप कहेंगे कि नेचर ने उस अफ्रीकी आदिवासी बच्चे के साथ नाइंसाफी क्यों की ? वह जिंदगी भर उन सुविधाओ से वंचित क्यों रहा जिसका उपभोग पूरी दुनिया कर रही है.

ईंट के भट्टे से सभी ईंटे समान प्रक्रिया द्वारा ही निकलती हैं सभी ईंटों को निश्चित अवधि तक पकना होता है बाहर आने के बाद कोई ईंट अम्बानी के घर मे लगती है कोई गरीब के बाथरूम में.

अब बताइये की ईंटों के इस भाग्य या दुर्भाग्य को किसने तय किया ? 


इसी तरह हमे यह समझना होगा कि प्रकृति कभी नाइंसाफ़ी नही करती वो दुनिया के प्रत्येक मनुष्य को एक समान ही पैदा करती है नौ महीने का गर्भ सबको झेलना पड़ता है 

इंसानी समाज मे आर्थिक सामाजिक और राजनैतिक असमानता जो हमने पैदा की है उसकी वजह से कोई वर्ग आज भी जंगलों की खाक छान रहा है और कोई आलीशान बंगलों में रह रहा है ये अव्यवस्था ही दुखों का सबसे बड़ा कारण है इसमें प्रकृति का कोई दोष नही है बल्कि सारा दोष असमानता पर आधारित उस व्यवस्था का है जिसे हमने बनाया है.

दुनिया मे सबसे ज्यादा गरीब लोग भारत मे रहते हैं दुनिया के सबसे गरीब 25 देशों में जितनी गरीबी है उतने गरीब हमारे देश के केवल आठ राज्यों में हैं हर साल हजारों की तादात में किसान आत्महत्या कर लेते है हर साल लगभग 5 लाख से ज्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं और हर साल लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मारे जाते हैं इन सभी विपदाओं में दुखों का अंबार पैदा होता है जो निरंतर कई प्रकार के दूसरे दुखों को पैदा करता चला जाता है.

अब इतने सारे दुखों का कारण क्या है ? क्या ये सारे दुख लोगों के भाग्य या भगवान की वजह से है ? तो बताइए कि सारे अभागे भारत मे ही क्यों भरे पड़े हैं ? इतनी भयंकर स्थिति उस देश मे है जहां हर गली हर नुक्कड़ हर गांव में भगवान और अल्लाह के मंदिर मस्जिद थोक के भाव मे मौजूद हैं ? यही दुर्भाग्य दुनिया के उन देशों में क्यों नही है जहां भाग्य और भगवान का यह दिमागी कचरा नही हैं.

संयुक्त राष्ट्र की हाल की एक रिपोर्ट आपके इस भाग्यवादी नजरिये को उखाड़ फेंकने के लिए काफी है विश्व खुशहाली रिपोर्ट में इस साल भारत 140 वें स्थान पर रहा जो पिछले साल के मुकाबले सात स्थान नीचे है. विश्व के सबसे खुशहाल देशों की सूची में फिनलैंड लगातार दूसरे साल इस मामले में शीर्ष पर रहा. 

संयुक्त राष्ट्र की ये सूची 6 कारको पर तय की जाती है. इसमें आय, स्वस्थ जीवन सामाजिक सपोर्ट, आजादी, विश्वास और उदारता शामिल हैं.

यूएन की इस रिपोर्ट के अनुसार भारत मे चिंता, उदासी और क्रोध सहित नकारात्मक भावनाओं में वृद्धि हुई है.

 फिनलैंड को लगातार दूसरे वर्ष दुनिया का सबसे खुशहाल देश माना गया है। उसके बाद डेनमार्क, नॉर्वे, आइसलैंड और नीदरलैंड का स्थान है। रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान 67 वें, बांग्लादेश 125 वें और चीन 93 वें स्थान पर है. इसमें सबसे नीचे है सूडान जो फिलहाल गृहयुद्ध की चपेट में है दुनिया के सबसे अमीर देशों में शामिल अमेरिका खुशहाली के मामले में 19 वें स्थान पर है.
Ndtv e-21 मार्च 2019 

अब इस रिपोर्ट के बाद जरा सोचिए कि यदि हमारे दुखों का कारण भाग्य या भगवान होता तो पूरी दुनिया के लोग इस भाग्यवाद का शिकार होते जैसा कि हम अपने चारों ओर देखते है और ये गाना गाते हुए संतुष्ट हो जाते हैं की... 

दुनिया मे दुख केवल वही है जहां व्यवस्था अपना काम ठीक ढंग से नही करता इसलिए हमारे दुखों की मुख्य वजह व्यवस्था ही है.

सूडान वर्ल्ड हैपिनेस की सूची में सबसे निचले पायदान पर है क्योंकि वहां गृहयुद्ध चल रहा है इसलिए उस देश मे चारो ओर सिर्फ दुख ही दुख है भूख कुपोषण महामारी से त्रस्त जनता इसे ही अपना भाग्य मान बैठी है यही हाल सीरिया का भी है.

 देश के कई इलाकों में इस समय भयंकर सूखे का आलम है कई ऐसे इलाके हैं जहां लोगों के लिए पानी की समस्या ही सबसे बड़ा दुख है वे इसे वर्षों से झेल रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है की यही उनका मुकद्दर है अगर सरकारें इस ओर ध्यान दे तो लोगों का यह दुख या दुर्भाग्य सदा के लिए समाप्त हो सकता है.

बिहार की कोसी नदी हर साल लाखों परिवारों को दुखी करती है लोग विस्थापित होते पलायन करते हैं मरते हैं कोसी नदी की दुखों की यह बाढ़ उस क्षेत्र के लोगों का मुकद्दर तभी तक है जब तक सरकार उसका कोई स्थायी समाधान नही कर देती.

पिछले साल महाराष्ट्र में मात्र 5 महीने में 1100 किसानों ने आत्महत्या की क्या ये उनके भाग्य में लिखा हुआ था तब अमेरिका जापान का किसान ऐसा आत्मघाती कदम क्यों नही उठाता ?

कोई भी आदमी आत्महत्या तब करता है जब उसके दुखों की इंतहा हो जाती है उसकी उम्मीदों के सारे द्वार बंद हो जाते हैं और जब किसी खास इलाके के लोग थोक के भाव मे सुसाइड करते हैं तो ये प्रशाशनिक भ्रष्टाचार के कारण होता है न कि ऐसा उनके भाग्य में लिखा हुआ था.

जिस समाज मे आर्थिक असमानता की खाई जितनी ज्यादा गहरी होती है वहां उतनी ही ज्यादा गरीबी होती है और जहां जितनी ज्यादा गरीबी होती है वही सबसे ज्यादा दुख होते हैं और आर्थिक असमानता का कारण राजनैतिक व्यवस्था ही होती है.

हालांकि कुछ दुखों के लिए व्यक्ति खुद भी जिम्मेदार होता है जैसे-

शराब का आदि एक आदमी इसके लिए खुद जिम्मेदार है क्योंकि उसे भी पता है कि यह बहुत गलत चीज है वह चाहे तो इसे छोड़ भी सकता है लेकिन वह अपनी इस आदत को नही छोड़ता जिससे कई प्रकार के दुख पैदा होते हैं उसकी इस आदत से वह आर्थिक रूप से पिछड़ जाता है जिससे उसके परिवार को कई प्रकार के दुखों का सामना करना पड़ता है परिवार में लड़ाई झगड़े शुरू होते हैं ऐसे परिवेश में पलने वाले बच्चों पर भी इसका गहरा असर होता है जिससे उनका भविष्य प्रभावित होता है शराब की अधिकता से वह बीमार होता है उसका लिवर खराब होता है इन सभी दुखों का कारण वह व्यक्ति स्वयं है.

इसी तरह से बीड़ी सिगरेट तम्बाकू या और दूसरे नशीले पदार्थों के आदि लोग कई प्रकार के दुखों का शिकार होते हैं और इन दुखों के लिए व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार होता है.

कुछ दुख ऐसे भी होते हैं जिसके लिए कोई भी जिम्मेदार नही होता ये आकस्मिक दुख होते है जैसे-

पूरी दुनिया मे प्राकृतिक आपदा से भूकम्प सुनामी बारिश तूफान से हर साल करोड़ो लोग प्रभावित होते हैं दुख झेलते हैं जापान अमेरिका या दुनिया के सबसे ताकतवर देशो में भी हर साल इस प्रकार की आपदा से लाखों लोग भयंकर विपत्तियों का सामना करते हैं इन दुखों के लिए सीधे तौर पर प्रकति ही जिम्मेदार है.

हर साल सड़क दुर्घटनाओं में लाखों लोग मारे जाते हैं घायल होते है या जिंदगी भर के लिए अपंग हो जाते हैं यह आकस्मिक दुख होता है जिसके लिए सीधे तौर पर कोई जिम्मेदार नही होता.

बहुत पहले प्लेग मलेरिया या गंदा पानी पीने की वजह से लाखों लोग दुखी होते थे मरते थे लेकिन जब इन सबका इलाज ढूंढ निकाला गया तो ये सारे दुख गायब हो गए इसी तरह कभी पोलियो चेचक हैजा जैसे रोग भी लोगों के लिए दुखों का कारण थे जो आज नही हैं.

जब लोग इन महामारियों से ग्रसित थे तो इन दुखों को अपने भाग्य में लिखा हुआ समझते थे उन्हें लगता था कि ये सब ईश्वरीय प्रकोप है प्रभू की लीला है खुदा का अजाब है लेकिन जब से विज्ञान ने ईश्वर की इन तमाम लीलाओं की नसबंदी की है तब से ये लीलाएं बन्द हो चुकी हैं.

दुख का संबंध भाग्य या भगवान से नही है बल्कि हमारे आसपास के ज्यादातर दुखों की वजह व्यवस्था ही है लेकिन अज्ञानता के कारण हम अपने दुखों को भाग्य या भगवान से जोड़ देते हैं ऐसा हम इसलिए मानते हैं क्योंकि हम दुख की असली वजहों को समझ नही पाते हैं धर्म और धार्मिक गिरोहो ने सदियों से हमे यह बताया है कि सब ईश्वर की माया है जो भी होता है भगवान या अल्लाह की मर्जी से होता है वो सबका भाग्य पहले से तय कर देता है इसलिए कोई अमीर होता है कोई गरीब कोई सुख भोगता है और किसी की किस्मत में सिर्फ दुख ही दुख होता है धार्मिक गिरोहों द्वारा फैलाये गए इस भ्रमजाल से हमारे दुख तो दूर नही हो पाते बल्कि इस तरह की मानसिकता से हमारी स्वाभाविक चेतना नष्ट जरूर कर हो जाती है जिससे हम अपने दुखों के कारणों को समझ ही नही पाते हैं और इसे भाग्य से जोड़कर देखने लगते हैं यही वजह है कि जहां जितना ज्यादा धार्मिक पाखण्ड होता है वहां उतनी ही ज्यादा गरीबी होती है और गुरबत के इस भयंकर सडांध में चारो ओर हमे केवल दुख ही दुख नजर आता है.

एक बात और हमेशा याद रखना चाहिए कि हमारा वर्तमान हमारे अतीत का परिणाम है और हमारा भविष्य हमारे वर्तमान पर निर्भर है वर्ल्ड हैपिनेस की सूची में आज जो देश सबसे ऊपर हैं इतिहास में उन्होंने भी भयंकर दुखों को झेला है उन्होंने अपने दुखों को खुद से दूर किया क्योंकि वे अपने दुखों के कारणों को जानमे में कामयाब हुए और सामूहिक रूप से उनका हल ढूंढ निकाला अगर वे इन्हें अपनी किस्मत समझ कर संतुष्ट हो जाते तो वे मानवता की इस ऊंचाई तक कभी नही पहुंच पाते.

हमारा वर्तमान दुख और गुरबत के जिस अंधकार में डूबा हुआ है इसके लिए भाग्य या भगवान जिम्मेदार नही है बल्कि आज की हमारी व्यथा के लिए असली दोषी हमारी सड़ी हुई दूषित मानसिकता है जिससे हम समस्याओं के मूल कारणों की तह तक कभी पहुंच ही नही पाते और भाग्य को दोषी मानते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी दुखों के भंवर में फंसे रहते हैं.

अगर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को दुखों के इस अथाह दलदल से बचाना चाहते हैं तो हमें दुखों के असली स्रोतों को तार्किक ढंग से समझना होगा आज अगर हम भाग्य और भगवान के मिथ्या विश्वास से आजाद हो गए तो समझिए की भविष्य के दुखों से हम अपनी पीढ़ियों को बचाने में कामयाब हो जाएंगे और तब चारों ओर दुख व्यथा और रुदन की जगह सत्य प्रेम और परिवर्तन ही नजर आएगा.

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