क्या ईश्वर की अवधारणा ही हमें नैतिक बनाती है ? - तर्कशील भारत

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Monday, April 29, 2019

क्या ईश्वर की अवधारणा ही हमें नैतिक बनाती है ?



मेरे एक ईसाई मित्र हैं जेम्स भाई उन्होंने बहुत ही सुंदर सवाल किया था कि हम दुनिया मे नैतिक बने रहते हैं क्योंकि हमें विश्वाश है कि मरने के बाद इसका रिवार्ड मिलेगा या अगर हम गुनाह करते हैं तो इसके लिए ईश्वर हमे सजा देगा लेकिन जब हम यह मान लेंगे की हम चाहे कितना भी अच्छा करें उसका कोई इनाम नही मिलने वाला या कितना भी बुरा करें उसके लिए कोई सजा नही मिलेगी तो हम अच्छा काम ही क्यों करेंगे ? दुनिया के कानून का डर इंसान के अंदर की हैवानियत खत्म नही कर सकता यह धर्म से ही मुमकिन है.

जेम्स भाई का यह सवाल बहुत ही दिलचष्प है इसके लिए हमे धर्म के पाप और पुण्य की व्याख्या को समझना होगा हमे यह भी देखना होगा कि धर्म के बताए अच्छे और बुरे कर्म कौन से हैं जिनपर हमे इनाम या सजा मिलेगी ?,
सभी धर्मों मे अच्छे और बुरे कर्मों की व्याख्या अलग अलग है.

इस्लाम के अनुसार सबसे उत्कृष्ट कर्म है ईमान लाना यानी इस्लाम के पांच अराकानों पर विश्वाश करना तब ही आप अल्लाह के रिवॉर्ड के हकदार होंगे अन्यथा नही.
अब जो भी आदमी इस्लाम की इस फिलॉसफी को नही मानता वो अल्लाह के रिवॉर्ड का हक़दार नही है इसका अर्थ यह है कि वह गुनहगार है और ऐसे किसी भी आदमी को जो इस्लाम पर यकीन नही रखता उसके लिए जन्नत हराम है और जिस आदमी पर जन्नत हराम है मतलब वह दोजख में ही जायेगा.

इस्लाम के अनुसार आप कितना ही अच्छा काम करें अगर आप मुसलमान नही है तो सब व्यर्थ है आपको अल्लाह का रिवॉर्ड चाहिए तो मुसलमान होना पड़ेगा.

अब आप मुझे बताइये की इसमें नैतिकता या मानवता वाली कौन सी बात है ?

बात करते हैं आपके धर्म की ..........
ईसाइयत के अनुसार जीसस ईश्वर के पुत्र हैं यह आपको मानना होगा या उसे स्वयं परमात्मा के रूप में स्वीकार करना होगा तभी आप यहोवा के रिवॉर्ड की उम्मीद कर सकते हैं वर्ना आप गुनाहगार हैं और आपका पकौड़ा बनाने के लिए जहन्नम में तेल से खौलती कड़ाही तैयार है.

जीसस यहोवा के पुत्र हैं वे क्रूज पर चढ़ाये जाने के तीसरे दिन फिर से जीवित हो उठे थे और आखिरी दिन सबका हिसाब होगा जो भी व्यक्ति ईसाइयत के इन ढकोसलों पर ईमान नही रखता वह पापी है चाहे वह दुनिया मे कितना भी अच्छा काम कर ले कोई फायदा नही वो तो तला ही जायेगा.
हिन्दू धर्म वर्णव्यवस्था पर आधारित है जिसमें चार वर्ण है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र और चारों का कर्म अलग अलग है हिन्दू धर्म के अनुसार आपको इस जन्म के अच्छे कर्मों का फल अगले जन्म में जरूर मिलता है 
गीता के अनुसार ब्राह्मण के लिए उसका कर्म है ज्ञान देना और दक्षिणा प्राप्त करना-
क्षत्रिय के लिए उसका धर्म है ब्राह्मण के बनाये नियमों का पालन करना और दान देना-
वैश्य का कर्तव्य है व्यापार करना-
और शुद्र का धर्म है ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना-

तुलसीदास जी कहते हैं पूजिय द्विज ज्ञान गुण हीना शूद्र न पूजिये ज्ञान प्रवीना.
अब बताइये की ऊपर के तीनों धर्मों में नैतिकता सदाचार या मानवता की कौन सी बात है ?
धर्म हमे कैसे नैतिक बना सकता है ? इंसानों को नैतिक बनाये रखने के लिए धर्मों का बनाया पाप और पुण्य का कॉन्सेप्ट आज के वैज्ञानिक युग मे अपनी प्रासंगिकता पूरी तरह खो चुका है.

जो लोग रिवॉर्ड के लिए अच्छा काम कर सकते हैं वो लोग पैसों के लिए बुरा काम भी कर सकते हैं.
सुपारी लेकर किसी का मर्डर करने वाले भी तो यही करते है लालच में किये या करवाये जाने वाले काम मे कही कोई नैतिकता नही है अगर आप किसी डर की वजह से बुरा काम नही करते इसका अर्थ है कि यदि डर न हो तो जरूर आप बुरा काम करेंगे इसमें भी नैतिकता वाली कोई बात नही है इस फिलॉसफी के आधार पर तो आप पूरी तरह भ्रष्ट साबित होते हैं.

यदि आपका व्यक्तित्व रिवॉर्ड या सजा के हिसाब से काम करता है तो इसका अर्थ यह है कि आपका अपना कोई कैरेक्टर है ही नही.

असल मे नैतिकता या मानवता का सम्बंध धर्म से है ही नही धर्म किसी को नैतिक बनाने की गारंटी कभी दे ही नही सकता बल्कि धर्म केवल मानसिक गुलाम ही पैदा कर सकता है जिसके लिए अच्छा कर्म उसके धर्म की परिधि तक ही सिमटा होता है ऐसे व्यक्ति से मानवता या नैतिकता की उम्मीद करना भी व्यर्थ है क्योंकि ऐसा आदमी अपने धर्म की रक्षा के लिए दूसरे की जान लेने से पीछे नही हटेगा क्योंकि मजहब की हिफाजत उसके लिए अच्छा कर्म है.

सभी धर्मों में अच्छे कर्मों की फिलॉसफी अलग अलग है नामज पढ़ना इस्लाम के अनुसार अच्छा कर्म है इसमें दूसरों के लिए क्या नैतिकता है ? 

कुर्बानी देना बली देना विसर्जन करना रोज नामज हज ईस्टर मनाना जुलूस निकालना ये सब अलग अलग धर्मों के अच्छे कर्म हैं एक धर्म वाले के लिए जो कर्म अच्छा है जिसमे उसे रिवॉर्ड मिल सकता है दूसरे धर्म वाले के लिए वो पाखण्ड है इसलिए धर्मों का बनाया अच्छे और बुरे का कॉन्सेप्ट सार्वभौमिक नही है इन्हें नैतिकता या मानवता की संज्ञा कभी नही दिया जा सकता ?

नैतिकता या मानवता यह सार्वभौमिक होता हैं और इसके लिए किसी भी धर्म की जरूरत नही होती है.
किसी भूखे को खाना खिला देना मानवता है किसी को संकट से बचा लेना मानवता है और यह मानवीय गुण इस बात पर निर्भर है कि आप कितने संवेदनशील हैं आपकी संवेदनाये ही आपको प्रेम भाईचारा सहयोग और ईमानदारी के लिए प्रेरित करती हैं और आपकी इन संवेदनाओं का आपके धर्म से दूर दूर तक कोई संबंध ही नही है यह मानवीय गुण हैं जो सभी मे होते हैं.

आप इस बच्चे को देखिए इसकी छोटी सी साइकिल से एक मुर्गी का बच्चा घायल हो गया वो उसे लेकर सीधे हॉस्पिटल पहुंचा और डॉक्टर से उसे ठीक करने के लिए निवेदन करने लगा.
ये छोटा सा बच्चा किस रिवॉर्ड को पाने के लिए लालायित था बताइये या कौन से धर्मग्रंथ को पढ़कर उसने ऐसा किया ? इस मासूम बच्चे ने तो धर्म की किसी किताब को नही पढ़ा ? इसे जन्नत और दोजख का भी इल्म नही फिर इसने ऐसा क्यों किया ? वो चाहता तो उस चूजे को वही छोड़कर भाग सकता था बच्चा था उसे कौन टोकता और इंसानों की इस भीड़ में न जाने कितने इंसान रोज कुचले जाते हैं एक मामूली सा चूजा कुचला भी जाता तो ईससे किसी को क्या फर्क पड़ता ? 

उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसमें संवेदनाये थी और इन संवेदनाओं के लिए किसी भी धर्म की जरूरत नही पड़ती जनाब.

और न ही इसके लिए किसी रिवॉर्ड की जरूरत होती है इसी तरह जो लोग गलत काम करते हैं उन्हें किसी ईश्वर खुदा या भगवान का डर कभी नही रोक सकता.

इस खबर पर गौर कीजिए मेरी नजर में इससे वीभत्स गलत काम कुछ नही हो सकता.

एक बेटे ने अपनी माँ को ही हवस का शिकार बना लिया मां चीखती रही और बेटा उसकी अस्मत को नोंचता रहा यहां उसे अगले जन्म में सुअर बनने का डर क्यों नही रोक पाया ?


एक आउर घटना बताता हूँ इस खबर में एक बाप अपनी नाबालिग बेटी को अपने दोस्तों के बीच सेक्स के लिए परोसता है.

इन दोनों घटनाओं में अपराधियों को उनका धर्म या ईश्वरीय सजा का डर क्यों नही रोक पाया ?

ये बात ध्यान रखिये की इंसान के अंदर छुपे नैतिकता या इंसानियत को बाहर निकलने के लिए किसी भी रिवॉर्ड की जरूरत नही है और खुदा का खौफ या दोजख का डर इंसान के अंदर छुपी हैवानियत को कभी खत्म भी नही कर सकता.

इंसान आज धर्म के नाम पर कत्लेआम कर रहा है हैवान बना हुआ है इस खूबसूरत दुनिया को धर्म और धर्म पर आधारित पाखंडवादी व्यवस्था ने ही बर्बाद किया हुआ है.

आतंकवाद बम धमाके मोब्लिंचिंग की घटनाएं वही लोग अंजाम देते हैं जिनकी संवेदनाओं को धर्म ने मार दिया है ये सब अमानवीय घटनाएं इंसान ही करता है जातिवाद शोषण और पाखण्ड ये सब धर्मों की ही महान खोज है.

सबको अपने पाखण्डों पर घमंड है सब को अपने अपने खुदाओं को सही साबित करना है सब को दुनिया मे अराजकता पैदा कर ईश्वर से अपने इन अच्छे कामो का रिवॉर्ड हासिल करना है और उन्हें हर हाल में अपने धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ साबित करते हुए उसे बचाये रखना है.

शुक्र की बात है कि धर्मों के बनाये नियमों को उन धर्मों के ही 99 प्रतिशत लोग फॉलो नही करते और तब इतना बुरा हाल है धर्मों के बताए या बनाये अच्छे और बुरे कर्मों के कॉसेप्ट पर यदि 10 प्रतिशत लोग भी चलने लग गए तो समझिए पूरी दुनिया को नरक बनने में ज्यादा समय नही लगेगा.

एक धर्म के दूसरे धर्म के प्रति किये गए महान और अच्छे कर्मों से इतिहास के पन्ने रंगे हुए है इन अच्छे कर्मों के दौरान जो लोग खुदा को प्यारे हुए उन्हें इसका रिवॉर्ड मिला कि नही यह आज तक कोई बताने नही आया ?

दूसरे धर्मों के प्रति नफरत की बात छोड़िए एक ही धर्म के लोगों ने अपने ही मजहबी भाइयों के प्रति हैवानियत की हदें पार की हैं इतिहास देख लीजियेगा.

पिछले 1400 वर्षों में शिया और सुन्नियों ने एक दूसरे को काटा और आज भी दोनों एक दूसरे को खुदा के पास भेजने पर उतावले हैं क्या यही है उनके अच्छे कर्मों की व्याख्या ? 

संत रविदास ज्योतिबाफुले राहुल सांस्कृत्यान राधामोहन गोकुल जी मुंशी प्रेम चंद सुरेंद्र कुमार शर्मा संतराम बीए ललई सिंह रामस्वरूप वर्मा महाराज सिंह भारती और रामास्वामी पेरियार जैसे सैंकड़ो पहापुरुषों ने हिन्दू धर्म के तथाकथित अच्छे कर्मों की बहुत ही तार्किक व्याख्या की है इस धर्म के बारे में डॉ अम्बेडकर ने लिखा कि "ये धर्म नही है बल्कि गुलाम बनाये रखने का षड्यंत्र है ?"

जेम्स भाई ईसाइयों के अच्छे कर्मों का इतिहास पूरी दुनिया जानती है क्रुसेड के नाम पर ईसाइयों ने दूसरे धर्म वाले लोगों का भयंकर जनसंहार किया परमेश्वर की दया का राग अलापने वाले ईसाइयों ने अपने ही लोगों के प्रति दया और करुणा को ताक पर रख दिया था.

1853 में बैतलहम के चर्च की पवित्र चाबी को हासिल करने की खातिर ईसाइयों के तीनों सम्प्रदाय आपस मे लड़ मरे ढाई साल तक चली इस खूनी जंग में तकरीबन 10 लाख ईसाइयों को ईसाइयों ने ही रिवॉर्ड पाने के लिए यहोवा के पास भेज दिया था.

बताइये उन दस लाख लोगों को खुदा का खौफ क्यों नही रोक पाया ? ईसाइयत के लिए जो लोग मरे उन्हें कौन सा रिवॉर्ड मिला ? या जिन्होंने कत्ल किया उन्हें कौन सी सजा मिली ?

मानवता करुणा न्याय प्रेम सहयोग और नैतिकता यह सब हमारी अपनी समझ परवरिश और कुछ हद तक हमारे जीन्स पर आधारित होता है साथ ही क्रूरता बेईमानी और आपराधिक मनोवृत्ति भी हमारी परवरिश समझ और हमारे जीन्स पर ही आधारित है.

इंसान के अंदर अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के जीन्स मौजूद होते हैं और पारिवारिक परिवेश देश काल और परिस्थिति ये सभी कारक मिलकर एक इंसान के वजूद को तैयार करते हैं इसका अर्थ यह नही की हमारे पिता एक अच्छे इंसान हों तो हम भी अच्छे ही होंगे या वे बुरे हों तो हम भी बुरे ही होंगे एक डाकू का बच्चा एक अच्छा प्रोफेसर साबित हो सकता है और एक प्रोफेसर का लड़का चोर हो सकता है यह भी जरूरी नही की जो चोर है उसके अंदर नैतिकता मानवता नही होगी और यह भी जरूरी नही की जो प्रोफेसर या डॉक्टर है वो भ्रस्ट नही होगा एक चोर भी संवेदनशील हो सकता है और एक डॉक्टर भी क्रूर हो सकता है.
कोई भी धर्म इंसान की इस मनोवृत्ति को कंट्रोल नही कर सकता इसलिए कोई भी धर्म इंसान को नैतिक नही बना सकता या उसके बुरे इरादों को रोक नही सकता.

आज की दुनिया को आपके झूठे धर्म और उसकी झूठी फिलॉसफी की कोई जरूरत नही है आज शिक्षा जागरूकता ज्ञान मनोविज्ञान न्याय व्यवस्था और वैज्ञानिकता से इंसान के अंदर की नैतिकता को निखारा जा सकता है और उसके अंदर की हैवानियत को नियंत्रित किया जा सकता है.

आज धर्म दुनिया की सबसे बड़ी बीमारी बन गई है आज के दौर में सामाजिक व्यवस्था धर्म की वजह से बर्बाद हो रही है धर्म समाज मे अराजकता पैदा कर रहा है दुनिया भर के समाज अब धर्म से नही बल्कि मानवता द्वारा निर्मित नई न्याय व्यवस्था पर आधारित है जिसमें धर्म की कोई भूमिका नही है ऐसे में धर्म और धार्मिक गिरोहों द्वारा बनाई गई काल्पनिक ईश्वरीय फिलॉसफी कायदे कानून और सिद्धांत पूरी तरह फेल हो चुके है अप्रासंगिक साबित हो चुके हैं.

दुनिया का सबसे बड़ा झूठ ये नही है कि "ईश्वर है" बल्कि एक और झूठ है जो इस झूठ से भी ज्यादा प्रचलित है वो है
"मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना"
ये इतना बड़ा झूठ है जिसके टक्कर का दूसरा कोई झूठ नही और आश्चर्य की बात है कि इस झूठ पर लगभग सभी धर्मों की एकता है इन धर्मों के बीच चाहे जितना सिर फुटव्वल हो लेकिन अपने झूठ को बचाने की खातिर सब एक हो जाते हैं.

धर्म की कोई भी किताब हमे नैतिक नही बना सकती वेद कुरान बाइबिल या कोई भी किताब हो इन सबकी रचनाएं इंसानो ने ही कि हैं हो सकता है इन किताबों में लिखी कुछ बातें तात्कालिक समय के लिए बहुत उपयोगी रही हो लेकिन आज इनकी कोई उपयोगिता नही है भले ही कितना ही झूठ गढ़ कर इन्हें वैज्ञानिक साबित करने की कोशिश की जाए ये समाज को पतन में ही ले जाएगी.

जैसे दस साल पुरानी बुखार की दवा आज किसी के बुखार को ठीक नही कर सकती. चाहे वो दवा दस साल पहले कितनी ही कारगर रही हो आज कूड़े के समान है वैसे ही ये सभी धर्म ग्रंथ और आसमानी किताबे आज किसी काम की नही है बल्कि समाज के लिए घातक हो चुके हैं इनका त्याग बेहद जरूरी है.

इंसानियत नैतिकता करुणा प्रेम और सहयोग की भावना हर इंसान में छुपी होती है जरूरत है उस मानवीय गुण को बाहर निकालने की तभी हम मनुष्य कहलाने के हकदार साबित हो सकते हैं और इसके लिए हमे किसी रिवॉर्ड की जरूरत नही है.
एक बेहतर सामाजिक व्यवस्था के निर्माण में आपका योग्यदान ही तय करेगा कि आप कितने नैतिक हैं ?
आज के बदलते दौर में नैतिकता और मानवता की सर्वोच्च्य पहचान यही हो सकती है की आपमें कितनी संवेदनाएं मौजूद हैं ?

आज हमें वर्षों पुरानी उन सभी घेराबंदियों को तोड़ देना चाहिए जो हमें इंसान बनने से रोकती हैं जो दूसरे के दर्द को समझने में रुकावटें पैदा करती हैं आज हमे उन सभी दीवारों को उखाड़ फेंकना चाहिए जो हमे हैवान बनाती हैं.
आज इंसान बनने के लिए उन सभी रेखाओं का मिट जाना जरूरी है जो हमें हिंसक भेड़ों की भीड़ बनाती हैं.
जिस दिन ये बंदिशें खत्म होंगी उसी दिन ये सम्पूर्ण धरती हमारी मां होगी देश हमारा घर होगा मानवता हमारा धर्म बन जायेगा और तब दुनिया मे केवल दो ही जाती होगी मर्द और औरत. 
करुणा प्रेम समर्पण सहयोग और मानवता पर आधारित उस नई सामाजिक व्यवस्था में किसी को नैतिक होने के लिए या अच्छा कर्म करने के लिए किसी खुदा के रिवॉर्ड की जरूरत नही होगी.

मानवता के इस मार्ग पर चलकर ही हम मनुष्य कहलाने योग्य साबित होंगे वर्ना फिलहाल हमारी औकात धर्मों के अलग अलग बाड़ों में कैद दो पैरों पर चलने वाले एक जानवर से ज्यादा और कुछ नही.

इंसानियत जिंदाबाद

1 comment:

  1. भाई हमनें भी एक छोटा सा प्रयास किया है , इसे अपने फ़ॉलोवरर्स के बीच शेयर कीजिए
    https://gyansagarmanthan.blogspot.com/

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