धर्म की वजह से पाप नही होते ? - तर्कशील भारत

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Friday, April 26, 2019

धर्म की वजह से पाप नही होते ?


पाप और पुण्य के कॉन्सेप्ट को धार्मिक गिरोहों ने बड़े ही शातिराना तरीके से ईजाद किया हुआ है पाप मिटाए भी जाते है धोए भी जाते हैं और थोड़ी सी दक्षिणा में ढेर सारा पुण्य हासिल भी किया जाता है अल्लाह से दुआ करने तौबा करने या इबादत करने से घोर गुनाहों की माफी भी मिल जाती है इसलिए पाप पुण्य सबाब और गुनाहों का सम्बंध धर्म की मार्केटिंग से तो है लेकिन नैतिकता से इसका दूर दूर तक कोई लेना देना नही है यही कारण है कि सामाजिक ताने बाने को नुकसान पहुंचाने वाले अपराध या अपराधी प्रवित्ति के लोग ज्यादार धार्मिक ही होते हैं दुनिया भर की जेलें ऐसे अपराधियों से भरी पड़ी हैं.

दुनिया भर के क्राइम रिकॉर्ड को खंगाल कर देख लीजिए 99 प्रतिशत क्राइम किसी न किसी परमात्मा अल्लाह गॉड में विश्वाश करने वाले लोग ही करते हैं इसलिए ये कहना कि ईश्वर अल्लाह गॉड के डर से लोग अपराध नही करते बिल्कुल गलत और तथ्यहीन बात है.

मुस्लिम देशों में शरीयत कानून की वजह से रेप जैसे जघन्य अपराध न होने का ढिंढोरा पीटने वालों को शायद मालूम ही नही है कि इस्लाम मे रेप की कोई सजा है ही नही क्योंकि अगर औरत व्यभिचार करती है तो अल्लाह उसे मारने का हुक्म देता है लेकिन मर्द के लिए इस तरह के व्यभिचार या बलात्कार के लिए इस्लाम मे कोई सजा नही कुरान के अनुसार अगर कोई पुरुष अपने यहां काम करने वाली किसी नौकरानी के साथ रेप करता है तो इसके लिए वह बिल्कुल दोषी नही है.

अगर फिर भी इस अपराध के लिए उसे सजा दी जाती है तो इसे शरीयत या इस्लामिक लौ कहना बिल्कुल गलत है.

सच तो ये है कि अगर इन देशों में इस्लामिक कानूनों को लागू कर दिया जाए तो इन इस्लामिक मुल्कों में कोई भी लड़की सुरक्षित नही बचेगी.

अगर कुछ इस्लामिक मुल्कों में क्राइम रेट 0 है तो इसमें अल्लाह का डर कम और कानून का डर ज्यादा काम करता है अगर अल्लाह का डर अपराधों को रोकने में कारगर साबित होता तो वहां शरीयत कानून या कोई भी कानून लागू करने की जरूरत ही क्या है ?

वहां सभी मुसलमान है सभी अल्लाह को मानने वाले हैं इसलिए वहां के सभी नागरिकों को अल्लाह से डरते हुए नैतिक हो जाना चाहिए था कानून की क्या जरूरत ?

पापों की व्याख्या करते हुए गीता कहती कहती है 9/31 अर्थात कोई कितना ही बड़ा पापी क्यों न हो अगर एक बार कृष्ण का नाम ले लेता है तो उसे साधु ही समझना चाहिए-

यही है सभी धर्मों के पाप और पुण्य की असलियत इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नही हमारे देश मे सबसे ज्यादा अपराध होते हैं ?

अखबारों के पन्ने ईश्वरवादियों के कुकर्मों से रंगे होते हैं फिर भी न जाने ये लोग किस मुंह से दावा करते हैं कि ईश्वर के डर से लोग अच्छे कर्म करते हैं अगर ऐसा होता तो हमारा देश सबसे ज्यादा भ्रष्टाचारियों और अपराधियों का अड्डा नही बना होता.

यहां तो कण कण में भगवान और अल्लाह बसा हुआ है हर गली नुक्कड़ गांव कस्बा या शहर में कुकुरमुत्तों की तरह मंदिर मस्जिद अटे पड़े है धर्म की इस गन्दगी में बाबा मुल्ला सन्त पादरी नामक करोड़ों कीड़े बजबजा रहे है जो दिन रात ईश्वर की महिमा के बखान में लगे हुए हैं इसके बावजूद अपराध में दिनों दिन बढ़ोतरी हो रही है क्यों ?

ऐसे ऐसे अपराध जिसे सुनकर मानवता भी शर्मशार हो जाती है कौन हैं ये अपराधी ? ईश्वर का खौफ क्यों नही इन्हें रोक पाता ? 

पुष्यमित्र सुंग चंगेज खान हलाकू तैमूर हिटलर इतिहास के इन सभी खलनायकों को ईश्वर का डर क्यों नही रोक पाया ?

केरल के चर्च में ननों के साथ रेप के आरोप में गिरफ्तार पादरियों को उनके यहोवा का डर क्यों नही रोक पाया ?


मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में मासूम बच्चियों से रेप करने वाला आदमी भी ईश्वरवादी ही था कठुआ में मंदिर के अंदर रेप करने वाले लोग भी ईश्वरवादी ही थे गोरखपुर शेल्टर होम कांड याद है न कौन था उसका मुख्य आरोपी ? नास्तिक तो नही था.

आशाराम रामरहीम दातिमहाराज या सोमनाथ दिक्सित ये वो लोग थे जो दिन रात ईश्वर के डर का बखान किया करते थे और खुद ही ईश्वर से नही डरे पकड़े गए तो उनका ईश्वर लापता हो गया.

और ये तो वो लोग थे जो पकड़े गए ऐसे न जाने कितने पाखंडी समाज मे ईश्वर का डर फैलाने की आड़ में निडर और निर्लज्ज बने बैठे हैं 

मस्जिद मदरसों और मजारों के अंदर रेप करने वाले लोगों को उनके अल्लाह का डर क्यों नही रोक पाता ?

42 बच्चों की हत्या करने वाली दो बहने जो फांसी के इंतजार में जेल की काल कोठरी में पड़ी हैं नास्तिक नही थी बल्कि हर मासूम बच्चे के कत्ल के बाद ये दोनों बहने दो घण्टे तक ईश्वर की पूजा करती थीं.

अपने पूरे परिवार का कुल्हाड़ी से गला रेत देने वाली शबाना पांचों वक्त की नमाजी थी.

निठारी कांड का मुख्य आरोपी जिसपर आरोप था कि ये दोनों मिलकर मासूम बच्चों की हत्या कर उनकी लाशों को खाते हैं ये दोनों हैवान ईश्वरवादी ही थे.

ईश्वर है या नही सवाल ये नही है यहां सवाल यह है कि अपराधों को रोकने में ईश्वर अल्लाह का डर कितना कारगर है तो ऊपर के उदाहरण से साफ है कि खुदा भगवान ईश्वर का डर अपराध और अपराधियों को रोक पाने में पूरी तरह से नाकाम है बल्कि ईश्वर कई अपराधों और अपराधियों की प्रेरणा बन जाता है जैसे हर साल अन्धविश्वाश के कारण कई बच्चों की बलि चढ़ा दी जाती है ये कुकृत्य ईश्वर के नाम पर ही होता है.

अब चलते हैं उन देशों की ओर जहां ईश्वर का डर नही है नॉर्वे डेनमार्क फ़िनलैंड जापान स्विट्ज़रलैंड और स्काटलैंड ये वो देश हैं जहां की बड़ी आबादी किसी भी ईश्वर को नही मानती यहां जाकर देख लीजिए यहां कोई किसी ईश्वर से नही डरता और यहां कोई अपराध नही होते ऐसा क्यों ?

दुनिया के सबसे सुखी लोग इन्ही देशों में रहते हैं यहाँ क्राइम रेट 0 है या लगातर घटते क्रम में है कई नास्तिक देशों में तो जेल बन्द कर दिए गए हैं और हैरानी की बात है कि इनमे से कई देशों में पचास वर्षों में कोई भी बड़ा क्राइम नही हुआ.

ईश्वर और धर्म सामाजिक व्यवस्था के लिए हमेशा घातक थे और आज के वैज्ञानिक युग मे भी अगर यह पाखण्ड चालू है तो यह समाज के लिए बेहद दुर्भाग्यपपूर्ण स्थिति है क्योंकि इन्ही पाखण्डों के नाम पर तमाम धार्मिक गिरोह अपने अपने षड्यंत्रों में लगे हुए है और समाज को धार्मिक जहालत के अंधकार में धकेल कर उनका जबरदस्त शोषण कर रहे हैं ये सब हो रहा सिर्फ और सिर्फ ईश्वर खुदा और गॉड के नाम पर.

हकीकत यही है कि आज इंसानियत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा ईश्वर और धर्म ही है जब तक हम इन धर्म ईश्वर और धार्मिक गिरोहों की असलियत को नही समझेंगे तब तक हम इनके बनाये पाखण्डों के षड्यंत्र में ही उलझे रहेंगे धर्म और ईश्वर के इस मकड़जाल से मुक्ति पाये बिना सत्य प्रेम और परिवर्तन पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की कल्पना भी व्यर्थ है. 

सुरक्षा की भावना ही डर को जन्म देती है और यही डर आज संसार के सभी जीवों के आस्तित्व में होने का कारण भी है इसलिए डर इन्सान के जीवन का अभिन्न हिस्सा है

इन्सान प्रत्येक उस चीज से डरता है जो उसे नुकसान पहुंचा सकती है जैसे -आग ,पानी, खूंखार जानवर इत्यादि, इन सब के आलावा जो इन्सान को सबसे बड़ा डर है वो है मृत्यु का डर या यूं कहें की स्वयं के आस्तित्व के खोने का डर ,पुरापाषाण काल के मानव के इसी एक डर ने कालान्तर में कई सारी कल्पनाओं को जन्म दिया जैसे -अल्लाह भगवान, आत्मा, परलोक, स्वर्ग-नरक, देविदेवता वगैरह वगैरह ताकि स्वयं को तसल्ली दे सके की उसका आस्तित्व मृत्यु के बाद भी रहेगा , यही कल्पनाएँ जिन्हें मानव की सहज बुद्धि ने मृत्यु के डर को निष्क्रिय करने के लिए तैयार किया था आगे चलकर तरह-तरह के कर्मकांडों और अंधविश्वासों में बदल गई और इन्ही कर्मकांडों और अंधविश्वासों ने धीरे-धीरे धर्म का रूप ले लिया.

जरा सोचिये - हम कुत्ते से डरते है, शेर से डरते हैं , भेडिये से डरते हैं , सांप से डरते हैं, बिच्छु से डरते हैं, तूफान से डरते हैं अँधेरे से डरते हैं लेकिन ईश्वर अल्लाह गॉड से हम क्यों डरते हैं ? आज तक कभी भी किसी भी आदमी को किसी ईश्वर अल्लाह या गॉड ने आकर ये नही कहा कि मुझसे डरो तब वो कौन लोग हैं जो दिन रात हमे ईश्वर के नाम पर डराने में लगे हुए हैं और हमारे डरने से आखिर फायदा किसका है ?

ये हमारा वहम है कि ईश्वर के डर की वजह से हम अच्छा काम करते हैं असल मे नैतिकता का सम्बंध किसी भी धर्म से नही है अच्छा करने की प्रेरणा अच्छी समझ से आती है और अच्छी समझ होना आपकी परवरिश आपके ज्ञान और आपकी संवेदनाओं पर निर्भर है ये बात मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ.

आज से बीस साल पहले जब मैं इस्लाम को मानता था अल्लाह से डरता था उसके सभी अराकानों को फॉलो करता था तब मैं रोजाना गोश्त खाता था लेकिन जब से मैं इस्लाम को त्याग कर इंसान बनने की प्रक्रिया में आगे बढ़ा हूँ तब से मैंने मांसभक्षण पूरी तरह त्याग दिया है जब तक ईश्वर से मैं डरता था तब तक मुझमे जीवो के प्रति कोई संवेदना नही थी और जब मेरे मन से अल्लाह का खौफ खत्म हुआ तब मैं इंसान बनने की ओर अग्रसर हुआ और जीवों के प्रति मेरे मन मे करुणा का भाव उतपन्न हो गया.

जब तक हमारी आंखों पर धर्म का चश्मा रहेगा हम दुनिया को उसके मूल रूप में कभी देख ही नही पाएंगे और जैसे ही हमारे दिमाग से यह धार्मिक संक्रमण दूर होगा हम पूरी तरह स्वस्थ्य हो जाएंगे और तब हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई की बंदिशों को तोड़ कर हकीकत मे हम सब भाई भाई हो जाएंगे और तब ये मुल्क दुनिया का सबसे सुखी देश बन जायेगा.

इंसानियत जिंदाबाद

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