मैं नास्तिक क्यूँ बना ? - तर्कशील भारत

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Sunday, April 14, 2019

मैं नास्तिक क्यूँ बना ?


लोग मेरे विचारों के कारण 
ऐसा अनुमान लगाते हैं कि 
मैं एक नास्तिक हूँ
जबकि मैं
खुद को एक इंसान कहता हूँ
आधा अधूरा इंसान

कभी मुझे भी यकीन था
उस खुदा पर
जिसने ये कायनात बनाई
जो समय समय पर 
नबियों की फौज को
धरती पर भेजता है
जो आसमान से बयानबाजी करता है
फिर भी हमेशा छुपा रहता है

कभी मुझे भी भरोसा था 
खुदा की उस जात पर
जिसने सात आसमानों को 
छह दिनों में पैदा किया 
जिसने धरती को 
चादर की तरह बिछा दिया
और फिर
इस सूनी धरती की गोद मे
एक मर्द और एक औरत को
पैदा किया

कभी मैं भी मानता था 
कब्र के अजाब को
आख़िरत के हिसाब को

जब तक मैं 
इन सभी बातों को मानता था
तब तक मैं 
मुसलमान था

इससे ज्यादा मेरी कोई पहचान ही नही थी
और इस पहचान से ज्यादा मुझे कोई दरकार भी नही थी

फिर कुछ ऐसा हुआ कि 
सब कुछ बदलने लगा
क्योंकि मैं
सवाल करने लगा

हालांकि मेरे सवालों की शुरुआत तो
बहुत पहले ही हो चुकी थी
लेकिन तब मेरे सवाल 
मेरी बचकाना बातें साबित कर दी जाती थी

लेकिन जैसे जैसे मैं थोड़ा बड़ा हुआ
मेरे सवाल मुझसे भी बड़े हो गए 

मैंने पूछना शुरू किया की
जब वो खुदा कहता है कि हो जा
तो एक झटके में 
वो हो जाता है
जो वो चाहता है

तब क्यों कोई भूखे सोता है
क्यों कोई मासूम गरीबी में जीता है
क्यों कोई आत्महत्या करता है
क्यों रेप होते है
क्यों एक्सीडेंट होते हैं
किसान क्यों मरता है
कोई किसी का शोषण क्यों करता है
इतना अन्याय अत्याचार और भ्रस्टाचार क्यों है
इतना दुख दमन दर्द आंसू और बेबसी क्यों है
ये आतंकवाद क्यों है ये जातिवाद क्यों है

वो क्यों इस भयंकर अराजकता को 
खत्म नही करता 
वो क्यों इस अंतहीन व्यथा को दूर नही करता
वो क्यों नही मिटा देता 
उन दुर्भावनाओं को
जो इंसानियत का 
सर्वनाश करने पर उतारू हैं
इंसान और इंसान के बीच खींची 
सदियों पुरानी खौफनाक लकीरों को 
वो क्यों नही 
हमेशा के लिए हटा देता

उसे बस इतना ही तो कहना है कि 
खत्म हो जा 
तब
ये सारे दुख 
उत्पीड़न गरीबी और लाचारी 
एक झटके में खत्म हो जाएंगे.

वो ऐसा क्यों नही चाहता कि 
दुनिया बेहतर हो जाये 

वो ऐसा क्यों नही चाहता कि 
दुनिया सुखी हो जाये

मेरे सवालों के निष्कर्ष में 
मुझे तीन नतीजे मिले 
जो उसकी पोल खोलने के लिए काफी थे

उसे यह सब देखकर मजा आता है 

या उसमे इन्हें दूर करने की ताकत नही 

या फिर वह है ही नही

पहले निष्कर्ष के प्रतिउत्तर में मैं इस नतीजे पर पहुंचा की अगर उसे किसी के आंसुओं से खुसी मिलती है तब वह इंसानियत का सबसे बड़ा शत्रु साबित होता है

अगर उसमे हालात को बदलने की ताकत नही 
तब वह सर्वशक्तिमान नही हो सकता फिर ऐसे किसी कमजोर या कामचोर खुदा की इबादत करना बेवकूफी के सिवा और क्या है ?

तीसरा निष्कर्ष बड़ा ही चौंकाने वाला था कि वह है ही नही

अगर वह है ही नही तब उसके नाम पर धर्म का इतना बड़ा आडंबर क्यों 
ये मंदिर ये मस्जिद चर्च आश्रम किसलिए ?
नामज और पूजा किसलिए
हज और तीर्थयात्राएं क्यों
कुर्बानी और बलि क्यों

लाखों करोड़ों की तादात में 
वो धर्म गुरु किसलिए 
जो एक झूठे ईश्वर के नाम पर 
आलीशान जिंदगी जी रहे हैं
जो झूठे खुदाओं के नाम पर
अय्याशियां कर रहे हैं

करोड़ो निठल्ले मौलाना और साधु 
समाज को क्या दे रहे हैं कुछ भी तो नही

धर्म के नाम पर परजीवियों की ये जमात
भूखे नंगे समाज को दीमक की तरह
खोखला जरूर कर रही हैं

कहाँ है वो खुदा
कहाँ है वो ईश्वर 

ये सारे सवाल मुझे हैरान करते रहे
मेरी ये स्वाभाविक वेदनाएं 
मुझे परेशान करती रही

शायद मेरी इन्ही कुंठाओं के कारण
लोगों ने मुझे 
नास्तिक कहना शुरू कर दिया था 
हालांकि तब तक 
मैं नास्तिकता की परिभाषा भी 
नही जानता था.

मेरे सवाल जैसे जैसे जवान हुए
आसमानी किताब पर खड़ी
14 सौ साल पुरानी इमारत 
मेरे सामने खंडहर में तब्दील हो गई

मेरे लिए इस खंडहर में
अब कुछ भी बचा न था

मैं निकल पड़ा उन दूसरे ठिकानों की ओर
जहां मुझे मेरे सवालों का जवाब मिल पाते

बहुत खोजा बहुत ढूंढा लेकिन मेरे सवाल अधूरे ही रहे

दूसरे मजहबों की आसमानी किताबों में भी मुझे वही षड्यंत्र नजर आया जो मैंने इधर देखा था इसलिए इन सब को इकट्ठा कर मैंने रद्दी में फेंक दिया.

मैं इंसान बनने की प्रक्रिया में 
आगे की ओर बढ़ा ही था कि
लोगों ने मुझे 
नास्तिक कहना शुरू कर दिया 

जो लोग पहले मजाक में 
मुझे नास्तिक कहते थे 
वे अब खुले तौर पर 
मुझे नास्तिक कहने लगे 

काफी समय तक 
मैं इस बात में 
अंतर नही कर पाया था कि 
इस तरह नास्तिक कह कर 
लोग मुझे गाली दे रहे हैं 
या फिर 
ये कोई विशेष उपाधि है ?

मुझे नास्तिक होना पसंद नही था 
क्योंकि मुझे एक इंसान बनना था 
मैं एक इंसान बनने की प्रक्रिया में था
नास्तिक नही.

मैं हर उस बात का विरोध करने लगा जो मानवता के खिलाफ एक साजिश थीं

धर्म जाती सम्प्रदाय धर्मग्रंथ और इन पर आधारित परंपराएं और मान्यताएं इन सब का षड्यंत्र मैं समझ चुका था.

अगर ये सभी चीजें
मानवता के पक्ष में होती 
तो हालात इतने बुरे न होते

इसलिए मुझे खुद पर यकीन था कि
मैं सही था

मैं इस नतीजे पर पहुंच चुका था कि
कही कोई ईशर खुदा भगवान नही है

अगर एक प्रतिशत वह है भी
तो हमे उसकी जरूरत भी नही है

अगर किसी को उसकी जरूरत है भी
तो उसे एक दायरे से बाहर नही होना चाहिए

अगर ईश्वर को मानने से
शांति मिलती है
तो उसी ईश्वर के नाम पर
इतनी अशांति क्यों

अगर आपके मन की चारदीवारी में ही
आपका ईश्वर कैद रहे तो
इससे मानवता को कोई नुकसान नही

मन से निकाल कर
आप उसे अपने घर की चारदिवारी में भी
सीमित कर दें तो भी 
इंसानियत महफूज रहेगी

लेकिन 
जब आपका गॉड 
इसका ईश्वर उसका खुदा 
मन की चेतनाओं से 
आज़ाद हो कर
घर की बॉण्डरी से 
बाहर निकल जाता है
तब वह 
इंसानियत के खिलाफ 
औजार बन जाता है
या बना दिया जाता है
ऐसे में
मानवता क्षीण हो जाती है और
धर्म तांडव करने लगता है
क्योंकि तब यह
शोषकों का हथियार बन जाता है 
या बना दिया जाता है

उसके नाम पर परजीवी पनपने लगते हैं
जो समाज की संवेदनाओं को खत्म कर देते हैं उसे भावहीन और खोखला बना देते है 
ऐसा समाज समाज नही रहता
वो धर्म के संक्रमण से ग्रसित हो जाता है
और ये संक्रमण इंसानियत के लिए
कैंसर से ज्यादा घातक साबित होता है.

ऐसे समाज मे
धर्म के नाम पर 
बाजार खड़े हो जाते है
ईश्वर और अल्लाह की 
विचित्र दुकानें
सजने लगती हैं
मजहब के नाम पर
व्यापार होने लगता है
फिर उसी के नाम पर सरेआम
इंसानियत का 
बलात्कार होने लगता है

ईश्वर के नाम पर
गिरोह पनपने लगते है
धर्म और मजहब का ये कुसंस्कार
फसाद की संस्कृति में तब्दील हो जाता हैं

ईश्वर के नाम पर 
लूट के तरीके ईजाद होते है
कपट की कुप्रथा शुरू होती है
और मानव की संस्कृति
विकृतियों में बदल जाती हैं

ऐसा समाज जितना धार्मिक होता है
उतना ही हिंसक भी हो जाता है

क्योंकि सभी मजहबों को 
दूसरे मजहबों से 
खतरा उतपन्न हो जाता है

इसीलिए मुझे उस ईश्वर से बैर है
जिसके नाम पर शोषण का ये खेल
खेला जाता है

मैं नही मानता उस खुदा को 
जो हिंसा की वकालत करता है
मैं नही मानता उस ईश्वर को 
जिसके धर्म की रक्षा के लिए
इंसान को इंसान के लहू की 
जरूरत पड़ती है

इसलिए 
मैंने दुनिया के 
तमाम धर्म 
और उनके सारे खुदाओ का 
बहिष्कार कर दिया

शायद इसीलिए मैं 
एक घोसित नास्तिक 
समझ लिया गया

हालांकि मुझे अब भी ये नही पता था कि
नास्तिक होना मेरी उपलब्धि है या
ये मेरे लिए दूसरों की दी हुई गाली है

क्योंकि मैं एक इंसान बनने चला था
लेकिन न जाने कब मैं नास्तिक बना दिया गया 

आखिरकार
मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि
अगर सच को सच कहना नास्तिकता है
तो मुझे गर्व है कि मैं नास्तिक हूँ
अगर झूठ घृणा और पाखण्डों को 
तबाह करने की सोच रखना
नास्तिकता है
तो मुझे अपने नास्तिक होने पर फख्र है

अगर दुनिया को 
बेहतर बनाने का ख्वाब देखना 
नास्तिकता है
तो मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं
नास्तिक हूँ

अगर संवेदनाओं के अथाह समुद्र में
गोता लगाने वाले को नास्तिक कहते हैं
तो मुझे खुशी है कि मैं नास्तिक हूँ

अगर नास्तिक होने से 
दुनिया बदल सकती है 
तो मैं घोषणा करता हूँ कि 
मैं एक नास्तिक हूँ

अगर नास्तिक होने से 
समाज की वर्षों पुरानी विसमताये
मिट सकती हैं तो
मैं चिल्ला चिल्ला कर कहता हूं कि
मैं नास्तिक हूँ
मैं नास्तिक हूँ
मैं नास्तिक हूँ

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