क्रांतिपथ पर कोई छोटा अथवा बड़ा कभी नही होता सब बराबर होते हैं - तर्कशील भारत

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Friday, April 12, 2019

क्रांतिपथ पर कोई छोटा अथवा बड़ा कभी नही होता सब बराबर होते हैं



प्रकृति की हर चीज निरंतर गतिमान है यही प्रकृति का नियम भी है समाज देश काल या व्यवस्था भी इसी सृष्टि का हिस्सा होते हैं इसलिये वो भी गतिशील हैं लेकिन सृष्टि गतिशील होते हुए भी जड़ है और सामाजिक व्यवस्था चेतनाशील मनुष्य चला रहे हैं जो अपनी सुविधा/इच्छा और मानसिकता द्वारा समाज की इस गतिशीलता को निरंतर प्रभावित करते हैं इसलिए समाज हमेशा गतिशील दिखाई देता है लेकिन इस गतिशीलता में उन्नति से ज्यादा अवनति नजर आता है यही से समस्याएं शुरू होती हैं जो एक जिंदा समाज को संक्रमित और बीमार बना देती हैं.
ऐसा हर युग मे होता आया है और ऐसे बीमार और संक्रमित समाज को बदलने के लिए हर युग मे लोग सामने आए हैं बुद्ध कबीर रविदास ज्योतिबा फुले राजा राममोहन राय दयानन्द सरस्वती डॉ अम्बेडकर भगत सिंह राहुल सांस्कृत्यायन ये सब वो युगपुरुष थे जिन्होंने सामाजिक संक्रमण के विरुद्ध आवाज उठाई.
ध्यान रहे कि क्रांति के पथ पर व्यक्ति नही विचार की ताकत सर्वोपरि होती है इसलिए हमें परिवर्तनशील विचारधारा को अपना मुखिया या मशाल मानते हुए आगे बढ़ना है यही वक्त की दरकार है.
परिवर्तन की ये आग कभी खत्म नही होती क्रांति की ये ज्वाला हम सबके अंदर बराबर है हम सब दुनिया को बेहतर होता देखना चाहते हैं हम सब चाहते हैं कि शोषण और पाखण्डों का सिलसिला समाप्त हो इसलिए हम सभी इक्कीसवीं सदी के क्रांतिकारी हैं आप भी मैं भी और जो भी ये क्रांति चाहता है वो इस सदी का क्रांतिकारी ही है अब इसमें "सबसे बड़ा" या "सबसे छोटा" कौन ? इस बात का कोई औचित्य ही नही है क्योंकि क्रांतिपथ पर कोई छोटा अथवा बड़ा कभी नही होता सब बराबर होते हैं सबकी अपनी अपनी उपयोगिता होती है.
इसलिए अगर सच मे कुछ बदलना है तो अपने अंदर के उस क्रांतिकारी को धरातल पर उतरने दीजिये और दूसरे क्रांतिकारी साथियों को साथ लेकर आगे बढिये बदलाव शुरू हो जाएगा.
याद रहे कि जब तक आदमी जमीन पर रहता है तभी तक उसमे बदलाव/क्रांति की गुंजाइश भी रहती है जैसे ही ऐसे किसी आंदोलन पर व्यक्तिवाद हावी हो जाता है तब ये क्रांतिकारी लोग मिलकर अपने किसी साथी को नेता बना कर जमीन से ऊपर उठा देते है जहां क्रांति और परिवर्तन की जरूरत/प्रासंगिकता ही खत्म हो जाती है.

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