धार्मिक व्यवस्था ने औरत को बर्बाद किया - तर्कशील भारत

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Monday, April 1, 2019

धार्मिक व्यवस्था ने औरत को बर्बाद किया



दो पदार्थों के मिलन से ही सृष्टि का सृजन होता है जीव भी इसी प्रक्रिया से उत्पन्न होते है यही प्रकृति का नियम है जीवों में नर और मादा मिलकर सृष्टि के इसी नियम को पूरा करते हैं नेचर का ये सिद्धांत इंसानों पर भी लागू होता है लेकिन मनुष्य ने इस प्राकृतिक जरूरत को नैसर्गिक नही छोड़ा वो जैसे जैसे सभ्यता की ओर बढ़ा वैसे वैसे उसने कुदरत के नियमों से खिलवाड़ भी शुरू कर दिया सभ्यता के विभन्न पड़ावों से गुजरते हुए पुरुष ने वर्चस्व हासिल किया और सृष्टि की सबसे अनमोल कृति नारी पर उसने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया जिससे शुरू हुआ पुरुष द्वारा नारी उत्पीड़न का एक लंबा सिलसिला जो अब तक जारी है.

ये उत्पीड़न तब और कठोर हो गया जब इंसानी सभ्यताएं धर्म पर आधारित हो गईं.

सभी धर्मों का निर्माण पुरुषों ने ही किया है इसीलिए नारी के प्रति सभी धर्मों की अवधारणाएं लगभग एक जैसी ही हैं इन धर्मों में एक औरत के अधिकारों के लिए कोई जगह नही है उसके वजूद का एक ही मकसद है मर्दवादी समाज के बनाये कठोरतम नियमों को स्वीकार करते हुए जिंदगी बिता देना पिता पति भाई या बेटे के बिना वो अस्तित्वविहीन है.

नारी के प्रति यही सभी धर्मों की मानसिकता रही है इसी नारीविरोधी सोच के तहत धर्मग्रंथों में तरह तरह के धार्मिक नियमों में बांधकर एक औरत को सदा के लिए गुलाम बना दिया.

दुनिया के सभी धर्मों ने नारी की गुलामी को ईश्वर और भाग्यवाद से जोड़कर शोषण अन्याय वेदना दुख रुदन और आंसुओं की ऐसी इबारत लिख डाली जिसे जानकर हृदय कांप उठता है.

सदियों तक धर्म के नाम पर औरतों को जिंदा जलाने वाली सती प्रथा को महिमामण्डित किया जाता रहा इन्ही धर्मशास्त्रों के नाम पर हजारों वर्षों तक औरतों को जिंदा जलाया जाता रहा सती प्रथा नाम के इस धार्मिक कलंक को 1828 में राजा राममोहन राय और विलियम बैंटिक ने खत्म किया.

सभी तथाकथित भारतीय धर्मग्रंथों में नारी उत्पीड़न के एक से एक नियम मौजूद हैं मनुस्मृति में नारी पूज्यन्ते के जिस श्लोक के आधार पर प्राचीन काल मे नारी को पूजने का बखान किया जाता है गौर करने पर पता चलता है कि असल मे इस एकमात्र श्लोक में नारी अधिकार की बात न होकर उसकी पूजा द्वारा पुरोहितों के माल पानी का जुगाड़ किया गया है.

उसी मनुस्मृति के 8 अध्याय के 371वे श्लोक द्वारा नारी अस्मिता की पोल पूरी तरह खुल जाती है इस श्लोक के अनुसार " अगर कोई स्त्री अपने पति का घर छोड़ कर पिता के घर चली जाती है तब राजा का ये अधिकार है कि उस औरत को बीच चौराहे पर कुत्तों से नुचवा देना चाहिए"

ईसाइयत के नाम पर पिछले दो हजार वर्षों में औरतों का भयंकर शोषण और उत्पीड़न हुआ है चर्च में रहने वाली नन महिलाओं के साथ व्यभिचार की डरावनी हकीकतें आज भी उजागर होती रहती हैं.

अब बात करते हैं इस्लाम की

इस्लाम के बारे में सबसे बड़ा झूठ यही बोला जाता है ये धर्म नारी को सम्मान देता है इस्लाम के ठेकेदार बड़े शान से ये दावा करते हैं कि इस्लाम के उदय से पहले अरब समाज मे औरत के पैदा होते ही उसे जिंदा दफन कर दिया जाता था उसकी कोई औकात नही थी.

लेकिन जब हम इतिहास का अवलोकन करते है तो ये बाते बिल्कुल बेबुनियाद साबित होती हैं इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस्लाम से पहले के अरब समाज मे नारी की हैसियत इस्लाम के बाद के समाज से तो बेहतर ही थी इस्लाम की दूसरी लड़ाई इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि हजरत मुहम्मद की एक हजार की फौज में एक भी महिला शामिल नही थी जबकि दूसरी ओर मक्के की फौज में एक तिहाई औरतें युद्ध के मैदान में थी मक्का की फौज का नेतृत्व कर रहे अबु सुफियान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उसकी बीबी हिन्द इस लड़ाई में डटी हुई थी उसके साथ महिलाओं की बड़ी टुकड़ी थी और कई औरतें अपनी अपनी टुकड़ियों का नेतृत्व भी कर रही थीं

इससे ये साबित होता है कि इस्लाम से पहले औरतों की स्थिति क्या थी ? जिस समाज की औरतें युद्धभूमि में पुरुष के साथ खड़ी हों उस समाज मे औरतों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है.

अब बात करते हैं औरतों की इस्लाम के बाद हुई दुर्गति के बारे में...

इस्लाम मे एक औरत की क्या हैसियत है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 

नारी के सम्मान उत्थान और अधिकारों की बातें किसी भी धर्म का हिस्सा कभी रहे ही नही धर्म और धार्मिक किताबों के बनाये नारीविरोधी नियमों के उलट भारतीय संविधान उन्हें न्याय बराबरी और उन्नति के अवसर प्रदान करता है और ये भी सत्य है कि नारी के हितों की बात करने वाली दुनिया की सबसे उत्कृष्ट किताब भी भारत का संविधान ही है यही कारण है कि आज देश की महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी उपयोगिता साबित कर पा रही हैं.

लेकिन यह भी सत्य है कि जब तक धर्म धार्मिक गिरोह और धर्मशास्त्रों के नियम सामाजिक व्यवस्था पर हावी रहेंगे तब तक नारी के सम्मान अधिकार और उन्नति के संवैधानिक प्रावधान पूरी तरह कामयाब नही होंगे और कुछ महिलाओं की कामयाबी के साथ बहुसंख्यक नारी की दुर्गति बरकार रहेगी.

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