ये कैसा धर्म है ये कैसे लोग हैं - तर्कशील भारत

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Monday, March 18, 2019

ये कैसा धर्म है ये कैसे लोग हैं


ये कैसा धर्म है
ये कैसे लोग हैं
ये कैसा दौर है
ये कैसा रोग है

मुसलमान को गर्व है 
की वो मुसलमान है
उसका मजहब सच्चा है
उसके अराकान सच्चे हैं
उसकी रवायतें पाक हैं
क्योंकि
दुनिया के सभी मुसलमानों का
खुदा एक है किताब एक है 
नबी एक है और किबला एक है

लेकिन 
इराक से लेकर सीरिया तक
और पाकिस्तान से लेकर 
ईरान तक
मरने वाले और मारने वाले
दोनों मुसलमान 
मुसलमान ही मुसलमानों की
नस्ले तबाह कर रहे हैं
मुसलमान ही मुसलमानों की
मस्जिदें गिरा रहे हैं

ये कैसा धर्म है
ये कैसे लोग हैं
ये कैसा दौर है
ये कैसा रोग है

हिन्दू को गर्व है कि वो हिन्दू है
उसका धर्म सच्चा है
उसकी परंपराएं पवित्र हैं
उसकी संस्कृति सनातन है
क्योंकि उसके मंदिर एक हैं
उसके त्योहार एक है
और उसके मान्यताएं एक हैं 
लेकिन ऊना से लेकर शब्बीर पुर तक
और गोहाना से लेकर मिर्चपुर तक
मारने वाले और मरने वाले
दोनों हिन्दू
हिन्दू ही हिन्दू को सता रहे हैं
हिन्दू ही हिन्दू का घर जला रहे है

ये कैसा धर्म है
ये कैसे लोग हैं
ये कैसा दौर है
ये कैसा रोग है

गीता या कुरान
अल्लाह या भगवान
हिन्दू या मुसलमान

बाहर से दोनों कितने ही अलग हों
अंदर से दोनों एक जैसे ही हैं

दाढ़ी मूंछ तिलक और टोपी को 
आपस मे बदल दीजिये
दोनों एक जैसे ही हैं

दलाली और शोषण के हमाम में
दोनो साथ साथ नंगे खड़े हैं

बाहर से दोनों 
कितने ही अलग दिखाई देते हों
दिमाग मे 
गोबर और दिल मे घृणा
दोनों ओर बराबर है

खून में जहर 
जबाँ में नफरत
व्यवहार में दोगलापन
आचरण में हरामखोरी
नियत में बेईमानी
नजरों में वासना
बातों में चोट
और सोच में खोट
दोनों ओर बराबर है

ये कैसा धर्म है
ये कैसे लोग हैं
ये कैसा दौर है
ये कैसा रोग है

हरा और पिला रंग 
देखने मे 
भले ही बिल्कुल जुदा दिखाई देते हैं
लेकिन दोनों मिलकर
एक ही तस्वीर में रंग भरते है
और वो तस्वीर होती है
शोषण और गरीबी की 
लूट और पाखंडों की
झूठ और बेईमानी की
घृणा और मक्कारी की

मजहबों के इस जोश में
सत्य खामोश है और
मानवता चीख रही है
अस्मिताएं नोंची जा रही हैं
आबरू लूटी जा रही है
मासूमियत रौंदी जा रही
हसरतें तबाह हो रही हैं
ख्वाब टूट रहे हैं
सपने बिखरते जा रहे हैं
धर्म के लिबास में
भेड़िये घूम रहे हैं
हाथों में इतिहास का परचम लिए
देशभक्त झूम रहे हैं

धर्म की फुट है
मजहबों का झूठ है
खो चुकी इंसानियत
बस लूट ही लूट है

ये सिख वो ईसाई
मैं हिन्दू तू मुसलमान
न तू इंसान न मैं इंसान
गाय हो गई हिन्दू
बकरा हो गया मुसलमान
भगवा हो गया हिन्दू
हरा हो गया मुसलमान 
खत्म हुई इन्सानित 
मर गया इंसान

ये कैसा धर्म है
ये कैसे लोग हैं
ये कैसा दौर है
ये कैसा रोग है

कोई नही जानता
धर्म किसने बनाये
ईश्वर को किसने पैदा किया
धर्म की झूठी
किताबों को किसने गढ़ा

कोई नही जानता 

किसने खींच दी
इंसानों के बीच
मजहबों की घिनौनी लकीरें
किसने तैयार कीं
जाती की मजबूत जंजीरें 
किसने बनाई
भूख और बदहाली की
ये बदरंग तस्वीरें 

ये किसी को नही मालूम 
लेकिन इतना हम जान चुके हैं

शोषण घृणा और वहशियत
गरीबी भूख और जहालत
पाखण्ड लूट और हैवानियत 
ये सब धार्मिक गिरोहों की देन है

जब तक 
धर्म ईश्वर और 
उसकी किताबों का वजूद
रहेगा

भूख और बदहाली की 
ये भयंकर तस्वीर 
कायम रहेगी
जाती की जंजीरें
और मजबूत होंगी
नफरत की दीवारें 
और बड़ी होंगी

इसलिए 

हर उस इंसान को 
जिसमें इंसानियत है
जिसमे संवेदनाएं है
और जिसमें थोड़ी सी
करुणा बाकी है 

और जो बदलना चाहते हैं
सदियों के दुर्भाग्य को
जो गिराना चाहते हैं
इंसानों के बीच खड़ी
नफरत की दीवारों को
जो चाहते हैं दुनिया खूबसूरत बने
जो चाहते हैं देश तरक्की करे
जिन्हें बेहतर भविष्य की कामना है
जिन्हें मानवता की चिंता है
जिन्हें गुरबत से नफरत है
और
जिन्हें बेबसों की फिक्र है

जो दमन रुदन और शोषण से 
मुक्ति चाहते हैं

जो दुख सितम और आंसुओं को
बर्दाश्त नही कर सकते

जो खुशहाली के ख्वाब देखते हैं
जो हरियाली के सपने देखते हैं

जिन्हें ईश्वर और खुदा से पहले
खुशी की चाह है
जिन्हें धन और धर्म से ज्यादा
मुस्कान की जरूरत है

उन्हें हर हाल में
धर्म ईश्वर 
और उसके दलालों के वर्चस्व को
चुनौती देना होगा

मजहब और उसकी 
रवायतों को नष्ट करना होगा

आसमानी किताबों को
जमीन में दफन करना होगा

यही आज मानवता की 
सबसे बड़ी जरूरत है

क्योंकि
मजहबों की 
घनघोर काली घटा के पीछे 
सत्य प्रेम और परिवर्तन का सूरज 
छुपा हुआ है

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