क्या कहूँ क्या लिखूं किस पर लिखूं क्यों लिखूं !!! - तर्कशील भारत

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Saturday, March 23, 2019

क्या कहूँ क्या लिखूं किस पर लिखूं क्यों लिखूं !!!


क्या कहूँ क्या लिखूं किस पर लिखूं क्यों लिखूं मेरे कहने या लिखने से कुछ बदल जाये तो मैं रोज लिखूं खूब लिखूं लेकिन मैं देखता हूँ कुछ नही बदलता मेरे हृदय की वेदनाएं मुझे जब भी कचोटती हैं लिखने बैठ जाता हूँ लिखता हूँ खूब लिखता हूँ लेकिन कुछ नही बदलता सोच दृश्य और हालात रुदन आंसू और ख़यालात गम नफरत और जज्बात दुख दहशत और वाकयात ये सब चीजें जब भी मुझे परेशान करती हैं लिखता हूँ खूब लिखता हूँ लेकिन कुछ नही बदलता मायूस चेहरे उदास आंखे बुझते अरमान टूटते ख्वाब बेलगाम नफरतें बढ़ रही सरहदें सिमटती हसरतें चीखती मासूमियत बिकती इंसानियत मचलती हैवानियत भूख और गुरबतों का बोझ जिम्मेदारियों का भार परेशानियों की मार बीमारियों की भरमार ये सब चीजें जब भी मुझे परेशान करती हैं लिखता हूँ खूब लिखता हूँ लेकिन कुछ नही बदलता आदमी और आदमी के बीच धर्म और जाति की ऊंची दीवारें आदमी और आदमी के बीच दौलत और रुतबे की ऊंची मीनारे रोटी से ज्यादा नफरतों की दरकारें आदमी से आदमी को वोट के लिए लड़वाती सरकारें हर हाथ मे तनी हुई घृणा की तलवारें ये सब चीजें जब भी मुझे परेशान करती हैं लिखता हूँ खूब लिखता हूँ लेकिन कुछ नही बदलता इसलिए मैं सोचता हूँ लिखना छोड़ दूँ सदा के लिए अपनी खामोश कलम को तोड़ दूँ अपने बेलगाम खयालातों को दफन कर दूँ अपने बेअसर जज्बातों को कही दूर छोड़ आऊं अपनी वेदनाओं को खुद से जुदा कर दूँ लेकिन मैं जानता हूँ मैं ऐसा नही कर सकता कभी नही क्योंकि मैं इतना कमजोर भी नही की खुद से भी न लड़ सकूँ ? इसलिए कुछ बदले या न बदले मैं लिखता रहूंगा लिखता रहूंगा लिखता रहूंगा....

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