तलवार नही सलवार के जोर पर फैला इस्लाम - तर्कशील भारत

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Tuesday, March 19, 2019

तलवार नही सलवार के जोर पर फैला इस्लाम


पूरी दुनिया मे धर्मों का इतिहास 4 हजार वर्ष से ज्यादा पुराना नही है इन्ही 4 हजार वर्षों के दौरान दुनिया के तमाम धर्म आस्तित्व में आये हैं इन सभी धर्मों में इस्लाम सबसे नया धर्म है 14 सौ साल पहले इस धर्म का उदय हुआ अपने उदय के मात्र 500 वर्षों के दौरान ही यह धर्म पूरी दुनिया मे पहुंच गया और अगली कुछ शताब्दियों में इस धर्म ने बड़ी बड़ी सल्तनतें स्थापित कर लीं.

आखिर इस्लाम इतनी तेजी से क्यों फैला ?

और आज भी पूरी दुनिया मे ये धर्म बहुत तेजी क्यों से फैल रहा है ?

इस्लाम के ठेकेदार कहते हैं कि इस्लाम मे वो तासीर है कि एक दिन पूरी दुनिया मुसलमान हो जाएगी.

आखिर वो कौन सी तासीर है जो इस्लाम को बढ़ाने में पेट्रोल का काम करती है आइए जानते हैं.

इस्लाम की शुरुआत मक्का से हुई जब हजरत मुहम्मद ने अपना मिशन शुरू किया तब यह केवल सामाजिक कुरूतियों के विरुद्ध एक जनजागरण का कार्यक्रम था लोग जुड़ते गए करवा बनता गया धीरे धीरे ये करवा और बढ़ा.

मुहम्मद के इस आंदोलन से घबराए धर्म के ठेकेदारों ने हजरत मुहम्मद और उनके इस आंदोलन से जुड़े लोगों का दमन शुरू कर दिया जिससे तंग होकर मुहम्मद और उनके साथियों ने मदीना का रुख किया.

मदीने में हजरत मुहम्मद ने अपने इस आंदोलन को धार्मिक रूप देकर इसे एक अलग धर्म इस्लाम के रूप में स्थापित किया हालांकि जब वे मक्का में थे तभी से वे खुद के पैगम्बर होने का दावा करने लगे थे लेकिन वहां रुकावटें बहुत थी उन्ही के रिश्तेदार उनकी पोल खोल देते थे.

मदीना में स्थापित होने के बाद यहां उन्हें कोई रोकने टोकने वाला नही था उन्होंने जमकर अपने इस नए धर्म का प्रचार किया.

हर जाहिल समाज मे कई विसंगतियां मौजूद होती हैं और अज्ञानता के कारण वो समाज इन सामाजिक कुरूतियों को दूर करने के लिए हमेशा किसी अवतार की प्रतीक्षा करता है.

हजरत मुहम्मद ने लोगों की इस मानसिकता का भरपूर लाभ उठाया उन्होंने दावा किया कि वे खुदा के द्वारा भेजे गए नबी हैं खुदा से उनका डायरेक्ट कनेक्शन है जो उनकी बातों को मानेगा उसे ऐसी जन्नत मिलेगी जहाँ खूबसूरत हूरें होंगी.

वासना इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी है और एक जहालत भरे पुरुषवादी समाज मे तो वासना की आसक्ति कूट कूट कर भरी होती है ये ऐसी दुर्भावना होती है जिसका कोई अंत ही नही होता.

हजरत मुहम्मद ने पुरुषों के अंदर की इसी कामलिलिप्सा को इस्लाम से जोड़ दिया.

बस फिर क्या था इस्लाम तेजी से फैलने लगा गांव गांव शहर शहर इस्लाम का डंका बजने लगा. 

और कामुकता की ये मानसिकता ही वह तासीर है जो इस्लाम को पूरी दुनिया मे बढ़ाने के लिए पेट्रोल का काम करती है.

ऐसा नही है कि कामवासना का इस तरह महिमामंडन केवल इस्लाम मे है ऐसी वाहियात परिकल्पना तो सभी धर्मों में है मंदिरों की देवदासियां उस महान धर्म मे छुपी कुत्सित कामवासना का प्रतिबिंब है जहां धर्म के नाम पर औरतों को जिंदा जलाना पूण्य समझा जाता था.

चर्च में रहने वाली ननों के साथ चर्च की चारदीवारी के अंदर होने वाली रासलीलाओं के किस्से दर्शाते हैं कि यहोवा की दया वासना के बिना अधूरी है.

जब तक सेक्स पर आधारित इन झूठे धर्मों का वजूद रहेगा तब तक समाज मे पुरुषवादी मानसिकता की कुत्सित विकृतियां कायम रहेंगी जिसमें नारी की अस्मिता उसका सम्मान और उसके अधिकारों के लिए कोई जगह ही नही होगी.

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