झूठ की बलिवेदी पर सत्य की बली - तर्कशील भारत

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Monday, March 11, 2019

झूठ की बलिवेदी पर सत्य की बली


तर्क करना या अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए पुरानी मान्यताओं पर चोट करना ये काम बुजदिलों का नही हो सकता इसके लिए ज्ञान विवेक बुद्धि और जुनून के साथ साथ हिम्मत की भी जरूरत होती है क्योंकि सत्य प्रेम और परिवर्तन का यह मार्ग बहुत ही जोखिम भरा होता है इसके बावजूद हर युग मे कुछ ऐसे क्रांतिकारी लोग पैदा होते रहे हैं जिन्होंने समाज को नई दिशा देने के लिए अपनी जान को जोखिम में डालकर पाखंडवाद का विरोध किया.

सबसे पहले बात करते हैं उस महान शख्स की जिनका नाम था मंसूर अल हल्लाज इनका जन्म 858 ईसवी में ईरान के बैजा नामक जगह पर एक पारसी परिवार में हुआ बाद में इनका परिवार मुसलमान हो गया था ये एक कवि थे ये वो दौर था जब पूरे ईरान पर इस्लामी खलीफा अल मुक्त्तदर का शाशन था.

मंसूर को शुरू से ही इस्लाम के फलसफे पर यकीन नही था जैसे जैसे वे बड़े हुए उन्होंने कुरान के आसमानी किताब होने के इस्लामिक दावे पर सवाल उठाने शुरू कर दिए उन्हें खुदा के सत्य होने पर भी यकीन नही था वे कहते थे अन-अल हक़ मतलब मैं ही सत्य हूँ वे मस्जिद को कामचोरों का अड्डा कहा करते थे वे शैतान को अल्लाह से श्रेष्ठ बताते थे और अपनी इस्लाम विरोधी बातों को कविताओं के जरिये अपने दोस्तों को सुनाया करते थे धीरे धीरे उनकी बातों का असर होना शुरू होने लगा और सबसे पहले उनके मुस्लिम रिश्तेदारों ने उनका साथ छोड़ दिया अब वे अकेले थे फिर भी उन्होंने हिम्मत नही हारी और अपनी कविताओं के जरिये लोगों को जगाने का प्रयास करते रहे उन्होंने हजरत मुहम्मद पर भी सवाल उठाना शुरू कर दिया यही से उनके विरोधियों की तादात बढ़नी शुरू हुई.

मुसलमानों के घोर विरोध के कारण 32 साल की उम्र में उन्हें अपना गांव बैजा को छोड़ना पड़ा वे वहां से सित्रा नामक शहर में पहुंच गए यहां शुरुआत में वे रुई धुनने का काम करने लगे. यहां रहने के लिए कोई जगह नही थी तो उन्हें बकरियों का कारोबार करने वाले एक कारोबारी के यहां शरण मिली.

ऐसा विद्रोही आदमी कभी शांत कैसे बैठ सकता है वे रात को बकरियों के साथ सोते थे और उन बकरियों को अपनी कविताएं सुनाते थे.

उनकी कविताएं जब बकरियों के झुंडों से निकलकर इंसानों के बीच पहुंची तब उन क्रांतिकारी कविताओं का असर शुरू हुआ लोगों ने यहां भी उनका विरोध शुरू कर दिया उन्होंने कुछ सवाल लिख रखे थे जो भी उनका विरोध करता वे उनसे अपने सवालों का जवाब मांग लेते लेकिन अफसोस कि उनके सवालों का जवाब कोई नही दे पाता. 

इसी दौरान वे ३ बार मक्का की यात्रा पर गए उन्होंने ख़ुरासान मध्य एशिया के अनेक भागों के साथ भारत की यात्रा भी की वे जहां जाते वहां इस्लाम की बुनियाद पर गहरी चोट करते इसलिये वे ज्यादा दिनों तक कही भी टिक नही पाते थे.

सितारा में 6 साल की नौकरी से जो भी कमाया था पांच साल की यात्रा में सब लुटा ने के बाद वे फिर से सित्रा आ गए और इस बार उन्होंने आलिमों को चुनौती देना शुरू कर दिया.

जब बात मुस्लिम उलेमाओं तक पहुंची तो उन्होंने मंसूर अल हल्लाज को समझाने की कोशिश की लेकिन मंसूर कहाँ मानने वाले थे उन्होंने बहस में शहर के सभी बड़े उलेमाओं को हरा दिया इस्लाम के इन जाहिल आलिमों की शिकायत पर 903 ईसवी में उनकी सारी कविताओं को जब्त कर लिया गया शहर के कोतवाल ने उन्हें चेतावनी दी कि अगर इस्लाम का विरोध करते हुए वह दुबारा पकड़ा जाता है तब उसे कड़ी सजा दी जाएगी.

इस विवाद के बाद उन्हें काम मिलना बंद हो गया उनके मालिक ने भी उन्हें निकाल दिया वे बिल्कुल बेसहारा और बेरोजगार हो गए आखिरकार मजबूर होकर सन 913 में उन्हें अपने गांव बैजा लौटना पड़ा.

अब वे 51 साल के हो चुके थे लेकिन उनके विचार अभी भी जवान थे इस उम्र में उनकी कविताओं ने और भी पैना रुख अख्तियार कर लिया था इसी वजह से एक साल के अंदर ही अब्बासी ख़लीफ़ा अल मुक़्तदर के आदेश पर उन्हें गिरफ्तार कर बगदाद की जेल में कैद कर लिया गया इस्लाम के विरोध में लिखी उनकी अनमोल पुस्तक किताब-अल-तवासीन को जब्त कर लिया गया और उनसे कहा गया कि अगर वो इस्लाम के बारे में अपनी तमाम बातों से तौबा कर लेता है तब उसे छोड़ दिया जाएगा.

लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया इसकी वजह से आठ साल तक उन्हें भयंकर यातनाएं झेलनी पड़ी आखिरकार 26 मार्च 922 को उनकी फांसी का दिन मुकर्रर कर दिया गया फांसी देने से पहले से उन्हें भयंकर यातनाएं दी गईं उनके नाखून उखाड़ लिए गए उन्हे कोड़े मारे गए देखने वालों ने पत्थर बरसाए फिर भी वे अपनी बात पर कायम रहे और कहते रहे अन-अल हक मैं सच्चा हूँ

क्रूर धार्मिक लोगों ने उनके हाथ में छेद कर दिए और फिर उनके हाथ पैरों को काट दिया. 

इसके बावजूद वे कहते रहे मैं सच्चा हूँ तब आखिरकार उनकी जीभ भी काट ली गई और उन्हें सूली पर चढ़ा दिया गया मृत्यु के बाद उनके शरीर को आग के हवाले कर दिया गया क्योंकि मुसलमानों का कब्रिस्तान एक सच्चे काफिर को दफन करने के काबिल नही था इसलिए जलाने के बाद उनकी चिता की राख को भी मुल्क की सीमा से बाहर फिकवा दिया गया.

घृणा नफरत और क्रूरता यही सभी धर्मों के मूल में है सभी धर्मों का इतिहास सत्य के पुजारियों के खून से रंगा हुआ है भारत के चार्वाक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

भारत के ये महान संत कब पैदा हुए इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नही है फिर भी इनके बारे में थोड़ी बहुत जानकारी ग्रंथों में मिल जाती है.

चार्वाक ने आत्मा ईश्वर पुनर्जन्म वेदों और पुरोहितों का जमकर विरोध किया उनका मानना था कि ईश्वर आत्मा वेद और पुनर्जन्म की बातें कोरी कल्पना मात्र हैं जिन्हें धूर्तो ने ठगने के लिए बनाया है उनके इसी तरह के विचारों के कारण उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया.

महाभारत में चार्वाक की हत्या का जो प्रयोजन नजर आता है वो बेहद निंदनीय है युद्धिष्ठर द्वारा किये जा रहे बेफिजूल के कर्मकांडों का चार्वाक घोर विरोध करते हैं साथ ही पुरोहितों द्वारा यज्ञ के नाम पर की जाने वाली पशुबलि को मानवताविरोधी साबित करते हुए कहते हैं कि

"धर्म के नाम पर किये जाने वाले ये पाखंड विश्व शांति के लिए हानिकारक हैं इसे जितनी जल्दी हो सके त्याग देना चाहिए इसी में सम्पूर्ण मानवता का भला है" 

महाभारत के शांतिपर्व के श्लोक नम्बर 35 और 36 के अनुसार चार्वाक की बातों से पुरोहित क्रोध से मूर्छित होकर हुंकार करने लगे उन्होंने चार्वाक को एक ही वार में समाप्त कर दिया वो धरती पर ऐसे गिरा मानो कोई वृक्ष गिरा हो.

एक आदमी जिसके दिल मे संवेदनाये बची हुई थी वो विश्वकल्याण की बात करते हुए पाखंडवाद का विरोध कर रहा था क्या ये उसकी इतनी बड़ी गलती थी कि उसे पाखंडियों ने एक ही झटके में खत्म कर दिया ? यही है धर्म का वह असली और वीभत्स चेहरा जिसे आमजन से छुपाया जाता है.

ईसाई मिशनरीज देश मे भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाकर उन्हें ईसायत के घिनौने चूल्हे में झौंकने का प्रयास करते हैं वे लोगों को बाइबिल की झूठी कहानियों द्वारा समझाते हैं कि बाइबिल ही उनकी मुक्ति का असली मार्ग है लेकिन ये भोले भाले लोग नही जानते कि इतिहास में इसी बाइबिल की वजह से बहुत से निर्दोष इंसानों के साथ निहायत ही घिनौना व्यवहार किया गया है ?

ज्योरदानो ब्रूनो को चर्च और बाइबिल की मान्यताओं का विरोधी पाए जाने के कारण उन्हें जेल में ठूस दिया गया क्योंकि वे बाइबल की दकियानूसी बातों का खंडन करते थे वे ब्रह्मण्ड को अनन्त मानते थे साथ ही पृथ्वी को ब्रह्मण्ड का केंद्र मानने से भी उन्होंने इनकार किया था उनकी ये बातें बाइबल और चर्च की मान्यताओं के विपरीत थीं इसी वजह से उन्हें आठ साल की कैद हुई जेल में उनसे कहा गया कि वो अपनी इन बातों को त्याग कर बाइबल में लिखी बातों को सच मान लें लेकिन वे अपनी बातों पर कायम रहे आखिरकार ब्रूनो को सरेआम एक चौराहे पर जिंदा जला दिया गया.

ब्रूनो ने हँसते हुए आग में जलना स्वीकार किया लेकिन आखिरी वक्त तक वे अपनी बातों पर कायम रहे उन्हें पूरा विश्वाश था कि वे सही हैं साथ ही वे ये भी जानते थे कि एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब पूरी दुनिया मान लेगी की वे सही थे आखिरकार सत्य की जीत हुई और आगे चलकर पूरी दुनिया ने उनके सिद्धांतों को स्वीकार कर लिया.

यही है धार्मिक गिरोहों की धार्मिक सहिष्णुता जिसकी लंबी चौड़ी बातें सभी धर्म के ठेकेदार करते हैं लेकिन वास्तविकता में न्याय प्रेम और सहनशीलता नाम की कोई चीज इनके DNA में होती ही नही इसीलिए सभी धार्मिक गिरोह धर्मरक्षा जिहाद या क्रुसेड के नाम पर हिंसा और आतंक का सहारा लेते हैं.

सभी धार्मिक गिरोहों के DNA में ही आतंकवाद मौजूद होता है और इसी आतंकवाद के बदौलत आज इक्कीसवीं सदी में भी ये सभी गिरोह पूरी तरह सक्रिय हैं और साथ ही अपने मानवताविरोधी मंसूबो में सफल भी हैं.

क्योंकि ये जानते हैं इनके द्वारा फैलाये झूठ पाखंड और षड्यंत्रों पर तर्कवादियों का एक मामूली तर्क ही भारी पड़ सकता है इसलिए इन्हें तर्क ज्ञान और विचारवान लोगों से हमेशा घृणा रही है और आज भी ये नफरत कायम है.

एक तर्कशील व्यक्ति इनकी वर्षों की मेहनत पर पानी फेर देता है इसलिए इन लोगों ने तर्क का मुकाबला हमेशा तलवार से किया है बुद्धिजीवियों से धर्म को हमेशा खतरा बना रहता है और "धर्मरक्षा" की यही मानसिकता दूसरों के प्रति घृणा का भाव पैदा करती है.

एक तर्कशील व्यक्ति को तैयार होने में हजारों किताबों का योगदान होता है वर्षों के अध्ययन और अनुभव से एक विवेकशील/बुद्धिजीवी तैयार होता है लेकिन उसे मारने में बस एक क्षण ही लगता है इस तरह हमेशा झूठ की तलवार से सत्य को हरा दिया जाता है.

ये भी सच है कि आदमी मर जाता है उसके विचार जिंदा रहते है और यही महान विचार आगे चलकर हजारों विवेकवान नास्तिक और मानवतावादियों को पैदा भी कर देते हैं इस तरह सच मर कर भी हमेशा जिंदा रहता है.

सच और झूठ का ये युगों पुराना संघर्ष कब तक जारी रहेगा पता नही लेकिन इतना तो तय है कि झूठ शोषण और पाखंडों की घनघोर काली घटा के पीछे ही सत्य प्रेम और परिवर्तन का सूरज छुपा हुआ है.

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