ए आर रहमान का असली चेहरा बेनकाब || AR Rahman Fully Exposed - तर्कशील भारत

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Sunday, March 10, 2019

ए आर रहमान का असली चेहरा बेनकाब || AR Rahman Fully Exposed


अभी हाल ही में म्यूजिक डाइरेक्टर ए आर रहमान ने अपनी बेटी के साथ मंच साझा किया था स्लमडॉग मिलेनियर फ़िल्म के दस साल पूरे होने के उपलक्ष्य में इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया था यहां सबसे दिलचष्प था एआर रहमान की बेटी खदीजा का भाषण इस दौरान वह पूरी तरह बुर्के में कैद थीं मुझे बेहद हैरानी हुई उन्हें इस रूप में देखकर.

मैंने देखा है कि पढ़े लिखे मुस्लिम वर्ग में या अमीर मुस्लिम परिवारों में भी हिजाब से परहेज किया जाता है क्योंकि प्रगतिशील आदमी बुर्का को औरतों की गुलामी से जोड़ कर देखता है मॉडर्न लोगों में तो बुर्का जैसे परिधान धार्मिक जहालत का प्रतीक समझे जाते हैं शायद इसीलिए ज्यादातर बड़े मौलानाओं की लड़कियां भी आम तौर पर इस तरह के लिबास नही पहनती.

रहमान साहब बॉलीवुड की दुनिया मे कामयाबी की जिस ऊंचाइयों पर हैं या वे जिस प्रोफेशन में है वहां चारों ओर इतना खुलापन है की इस तरह की संकीर्णता के लिए वहां कोई जगह ही नहीं है.

इसी वजह से इस इवेंट के बाद रहमान साहब की काफी आलोचना हुई लोगों ने कहा कि "रहमान ने अपनी बेटी पर बुरका पहनने का दबाव डाला होगा इसलिए खदीजा ने बुर्का पहना था" लोगों का यह भी कहना था कि "एक तरफ तो रहमान खुद को प्रगतिशील दिखाने का ढोंग करते हैं दूसरी ओर अपनी बेटी को बुर्का पहनने पर मजबूर करते हैं" शोशल मीडिया पर उनकी बहुत किरकिरी हुई तब प्रतिक्रिया में उन्होंने एक फोटो पोस्ट किया.

इस तस्वीर में नीता अंबानी के साथ एआर रहमान की वाइफ सायरा जिन्होंने सर पर पल्ला किया हुआ है रहमान की दूसरी बेटी रहीमा जिन्होंने सूट पहना है और यहां भी बुर्क़े में हैं खदीजा.

ट्रोल करने वाले लोगों को जवाब देने के लिए इस फोटो को रहमान साहब ने अपने ट्विटर पर फ्रीडम टू चूज हैश टैग के साथ पोस्ट किया यानी अपनी पसंद के हिसाब से पहनने की आज़ादी.

खदीजा ने भी अपनी फेसबुक पोस्ट के द्वारा अपने पिता का बचाव करते हुए लिखा कि "बुर्का पहनना मेरा निजी फैसला है इसमें मेरे पेरेंट्स का कोई दबाव नही है"

इस पूरे प्रकरण में मेरे मन मे कुछ सवाल उठे जो मैं अरुणाचलम् शेखर दिलीप कुमार मुदलियार’ उर्फ अल्ला रक्खा रहमान साहब से पूछना चाहता हूँ.

ये अच्छी बात है कि बच्चों को उसके हिसाब से पहनने रहने चुनने की आजादी होनी चाहिए आपकी इसी सोच के कारण जब आपकी लड़की ने बुर्का पहनने का निर्णय किया होगा तब आपकी ओर से उन्हें कोई दिक्कत नही हुई होगी क्योंकि ये तो खदीजा के फ्रीडम टू चूज का मामला था न ...?

लेकिन मुझे लगता है खदीजा के बुर्का पहनने के मामले में उस के फ्रीडम टू चूज से ज्यादा आप का इस्लाम के प्रति गहरा लगाव बड़ा फैक्टर रहा है.

क्योंकि खदीजा को अचानक सपना नही आ गया होगा कि उसे बुर्का पहनना चाहिए उसकी ये मानसिकता यूँही ही नही बन गई होगी खदीजा के इस फैसले के पीछे असली वजह है उसकी परवरिश और परिवार का धार्मिक परिवेश ?

खदीजा की मौजूदा मानसिक स्थिति को देखते हुए मैं दावे से कह सकता हूँ कि इस्लाम की कट्टरता पर आधारित पारिवारिक परिवेश में ही खदीजा की परवरिश हुई है जिसकी वजह से उसने बुर्का पहनना पसंद किया और घर का मुखिया होने के कारण खदीजा की इस मनोदशा के लिए आप पूरी तरह जिम्मेदार साबित होते हैं.

क्योंकि खदीजा का बुर्का पहनने का फैसला आपके धर्म के हिसाब से जायज था इसलिए आपने उसे समझाने की कोशिश भी नही की कि बेटा ये ठीक नही है आप उसे समझा सकते थे कि बेटा शरीर को इस तरह कपड़ों में कैद कर लेना फ्रीडम टू चूज नही हैं"

आप इस्लाम के प्रति इतने कट्टर न होते और आपने मजहबों का इतिहास पढ़ा होता तब आपको पता होता कि इस्लाम सहित सभी धर्मों ने औरतों को शोषण व्यथा और गुलामी के सिवा कुछ नही दिया.

आपको पता होना चाहिए कि एक औरत के लिए धर्म से बड़ा शत्रु कुछ नही हो सकता.

धार्मिक जहालत के लिबास में पूरी तरह लिपटी हुई एक औरत को आप कौन सी आज़ादी देने की बात करते हैं ?

मजहब के प्रति आपकी इस जहालत भरी सोच से यह भी साबित होता है कि अगर आपकी बेटी खुले विचारों की होती तब आपका ये हैश टैग "फ्रीडम टू चूज" कहीं दिखाई नही देता.

इससे यह भी साबित हो जाता है कि इक्कीसवीं सदी में भी अपने बच्चों को धर्म की घिनौनी बेड़ियों में कैद रखने वाला आप जैसा आदमी प्रगतिशील कभी नही हो सकता.

चलिए छोड़िए आप मुझे ये बताइये की आपका लड़का अमीन जो इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहा है अगर इस्लाम के नाम पर आतंकवाद का रास्ता चुन लेता और हाथों में किताबों की जगह हथियार उठा लेता और कहता कि मुझे अपनी मर्जी से जीने का पूरा हक है तब भी क्या आप फ्रीडम टू चूज़ का टैग लिए घूमते ? 

नही न ...?

कोई अंतर नही है दोनों बातों में सर ...


इस्लाम के नाम पर हथियार उठाने में और इस्लाम के नाम पर बुर्का ओढ़ने में दोनों बातें इंसानियत के खिलाफ हैं और जहालत की निशानी हैं खासकर एक सिलिब्रिटी के लिए तो ये डूब मरने की बाते हैं लेकिन प्रगतिशीलता के लिबास में छुपे आप जैसे कट्टरपंथी लोगों को इससे कोई फर्क नही पड़ता क्योंकि आप ऊपर से चाहे कितने ही बड़े एआर रहमान हों लेकिन असल मे आपके अंदर एक जाहिल कट्टरपंथी छुपा हुआ है.

वर्ना आप खदीजा को उसी समय जरूर डांटते जब उसने पहली बार बुरका पहनने की जिद की थी ठीक वैसे ही जब बचपन मे उसकी बेफिजूल की जिद पर आपने उसे डाँट लगाया होगा क्योंकि तब आप अच्छी तरह जानते थे कि फ्रीडम टू चूज बच्चों के लिए हमेशा सही नही होता एक जिम्मेदार पैरेंट अपने बच्चों को कुछ भी कहने या कुछ भी करने की आजादी कभी नही दे सकता.

बच्चों को मनमानी करने की छूट देना फ्रीडम नही होता सर बल्कि एक जिम्मेदार पिता बच्चों को फ्रीडम टू चूज की जगह फ्रीडम टू राइट चूज सिखाता है यानी कि बेहतर चुनने बेहतर करने और बेहतर पहनने की आजादी.

आपका बच्चा कहता कि उसे शराब या जहर पीना है और ये उसका निजी फैसला है तब यहाँ आप फ्रीडम टू चूज़ वाला हैश टैग नही आजमाते बल्कि झट से उसके कान के नीचे दो लगाकर कहते कि ये गलत है ये तुम्हारा निजी मामला कैसे ? शराब पीने का फ्रीडम आप कभी भी अपने बच्चे को नही देते.

रहमान साहब आप व्यक्तिगत जीवन मे काफी अच्छे इंसान होंगे ये अलग बात है लेकिन जब आप सैलिब्रिटी हो जाते हैं तब आपकी छोटी से छोटी बातो को भी लोग फॉलो करने लग जाते है ऐसे में आप खदीजा को इस तरह प्रेजेंट करके समाज को क्या सीख देना चाहते हैं ?

आप पूरी दुनिया मे घूमते हैं आपको पता होगा कि पुरातन धार्मिक परंपराओं से नारी की मुक्ति कितनी जरूरी है और दुनिया भर में इसके प्रयास भी हो रहे हैं ऐसे में अपने बच्चों को मजहब के दकियानूसी खयालों से बाहर निकालना आज हर प्रगतिशील व्यक्ति का कर्तव्य है आज वक्त की सबसे बड़ी जरूरत भी यही है कि हम नई पीढ़ी को मनमर्जी से कुछ भी करने की आजादी न देकर उन्हें सही सोचने समझने चुनने और सही करने की प्रेरणा दें यही मानवता है और इसी तरह दुनिया को बेहतर बनाया जा सकता है.

इस्लाम मे एक औरत की क्या औकात है आप खदीजा से नही मलाला से जाकर पूछिये या पाकिस्तान की उन अभागी औरतों से जाकर पूछिये जिनका इस्लाम के रक्षकों ने सबकुछ तबाह कर दिया था इस्लाम क्या है जाकर पूछिये उन बेबस औरतों से जिनका इस्लाम के नाम पर सब कुछ उजाड़ा जा चुका है इस्लाम मे औरतों के हुक़ूक़ जानना है तो जाकर पूछिये कब्रों में पड़ी उन अभागी लाशों से जिन्हें खुदा के बंदों ने गोली से उड़ा दिया था वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने गलती से आपका हैश टैग फ्रीडम टू चूज इस्तेमाल कर लिया था.

और आपने भी तो वही किया जो तालिबानी करते हैं वे जोर जबरदस्ती से औरतों को मजहब का मानसिक गुलाम बनाते हैं आपने सॉफ्ट तरीके से एक औरत को इस्लाम की जंजीरों में फिट कर दिया वाह सर...

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