क्या सच मे डार्विन की खोज महज एक थेओरी है ? - तर्कशील भारत

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Tuesday, January 15, 2019

क्या सच मे डार्विन की खोज महज एक थेओरी है ?


इंसान की उत्पत्ति कैसे हुई ? धर्म और धर्मग्रंथों में इस संबंध में जो बातें मौजूद हैं वे सभी थोथी गप्प ही साबित हुई हैं क्योंकि ईश्वर केंद्रित सभी धर्म इंसान की उत्पत्ति को ईश्वर का चमत्कार समझते हैं इसलिए दुनिया के तमाम ईश्वरवादी धर्मों में सृष्टि की उत्पत्ति के सम्बद्ध में अलग अलग कहानियां गढ़ी गई हैं.

जब इतिहास में इंसानों ने लिखना सीखा तो उसने अपने हिसाब से सृष्टि से जुड़े रहस्यों की व्याख्या की जो आगे चलकर धर्म ग्रंथ बन गये

आज से लगभग दो सौ साल पहले इंग्लैंड के श्रुतबेरी में जन्मे सर डार्विन भी बाइबल की कहानियां पढ़ते हुए जवान हुए थे लेकिन वे भेड़चाल से अलग थे बचपन से ही उन्हें जीव जंतुओं से लगाव था और वे अलग अलग तरह के कीड़े मकोड़ों पक्षियों तितलियों मेढ़क चूहे समेत विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधों तक में दिलचष्पी लेते थे वे सोचते थे कि ईश्वर ने इन्हें कैसे बनाया क्यों बनाया ?

जब वे अपने प्रश्नों का उत्तर ईश्वर की किताब में ढूंढते तब उन्हें घोर निराशा ही हाथ लगती क्योंकि वहाँ लिखा था खुदा ने चाहा तो हो गया ये पूरी कायनात ये चांद सितारे ये नदी पहाड़ झरने पक्षी जीव जंतु पेड़ पौधे सब उस परमपिता के इशारे पर पल भर में यूँही बन गये थे.

बाइबिल ने उनकी जिज्ञासाओं को खत्म करने की बजाए और बढ़ा दिया था बीस साल की उम्र तक उन्हें यकीन हो गया कि इस कायनात को किसी ईश्वर ने नही बनाया और न ही धरती और इसमें रहने वाले विभिन्न प्रकार के जीवन को किसी ने छड़ी घुमाते ही बना दिया है

डार्विन का जन्म 1809 मे हुआ. चर्च का पादरी बनने की पेशकश को ठुकरा देने के बाद वो कई वर्षों तक अलग अलग जीव जंतुओं पर रिसर्च में लगे रहे 1831 में उनके पास इंग्लैंड से बाहर जाने का एक मौका आया. पानी के जहाज से विदेश घूमने के इस अवसर ने ना केवल उनकी जिंदगी को ही बदला बल्कि जीवन विज्ञान के पूरे इतिहास को बदल दिया.

मौका था ‘बीगल’ नाम के एक जहाज पर छह महीने तक दुनिया की सैर...

जहाज के कप्तान फिट्जरॉय को एक साथी की जरूरत थी जब डार्विन को इस बात का पता चला तो वे जैसे उछल पड़े परिवार के विरोध के बावजूद डार्विन बीगल पर जा पहुंचे.

इस जहा पर उनकी यात्रा 6 महीने की थी लेकिन डार्विन पांच साल बाद ही वापस घर लौटे

यात्रा शुरू होने पर जब जहाज महासागर में पहुंचा तो डार्विन ने बेहद खूबसूरत जीव देखे. वो हैरान थे कि यहोवा ने इतनी सुंदर रचनाएं बना कर समुद्र के बीच इन टापुओं पर क्यों डाल दीं ?

डार्विन को फॉसिल की अच्छी खासी समझ थी इन पांच वर्षों में वे बीगल के साथ एक टापू से दूसरे टापू का सफर करते रहे इस दौरान उन्होंने पाया कि उन टापुओं पर पाए जाने वाले जीव और वहां से मिलने वाले करोड़ों साल पुराने जीवाश्मों में बहुत समानता थी इससे वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे की हर अलग अलग टापुओं पर पाए जाने वाले अलग अलग जीव उस टापू पर निवास करने वाले करोड़ो वर्षों पहले के जीवों के ही वंसज हैं.

जब वे दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के पास गालापागोस द्वीप पहुंचे तो उन्होंने देखा कि यहां के हर द्वीप की चिड़िया लगभग एक जैसी दिखती है, फिर भी उनमें कुछ मामूली फर्क भी होते हैं. किसी द्वीप पर उसकी चोंच लंबी होती है, तो किसी पर पतली किसी द्वीप पर उसकी छाती पर एक रंग होता है तो किसी पर नहीं. चिड़ियों के साथ-साथ, वहां कछुए की पीठ पर बने डिजाइन से पता चल जाता था कि वहां के हर द्वीप पर अलग अलग डिजाइन वाले कछुआ थे.

जिन द्वीपों पर खाने के लिए बीज थे, वहां चिड़िया की चोंच छोटी और मजबूत थी. जहां चिड़िया फूलों पर निर्भर थी वहां लंबी चोंच वाली चिड़िया थी.

इससे वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे की बहुत पहले सभी द्वीप एक ही रहे होंगे और उस बड़े से महाद्वीप पर एक ही किस्म की चिड़िया रहती होगी फिर सभी द्वीप एक दूसरे से टूट कर अलग हो गए समय के साथ जब द्वीप दूर हुए तो कुछ द्वीपों पर खाने के लिए बीज थे और कुछ पर फूल.

इस बदलाव से चिड़ियों ने भी परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलना शुरू किया पीढ़ी दर पीढ़ी हर चिड़िया ने अपनी नस्लों में सुधार किया और वातावरण के अनुकूल होते चले गए जो इस चिड़िया या जीव बदलती हुई परिस्थितियों के अनुकूल खुद को नही ढाल पाए उसे प्रकृति ने नष्ट कर दिया इसी को डार्विन ने नेचुरल सिलेक्शन का नाम दिया.

जिसका अर्थ है बदलते परिवेश के अनुसार निरंतर सुधार...

जीवित रहने के संघर्ष में प्रकृति पर जीत हासिल करने वाली प्रजाति ही आगे जाएगी मतलब की
जो जीतेगा वही जियेगा
यही है नेचर का सिलेक्शन 

यही थी सर डार्विन की महान खोज जिससे उन्होंने साबित किया था कि धरती पर जीवन महज एक प्राकृतिक संयोग है इसे किसी ईश्वर ने नही बनाया.

1860 में डार्विन की किताब "the origins of the spicies" प्रकाशित हुई जिसमें उन्होंने विकासवाद को दुनिया के सामने एक सार्वभौमिक सत्य के रूप में प्रस्तुत किया था.

सर डार्विन के लिखे पत्र आज भी डार्विन की महान सोच को व्यक्त करते हैं इन पत्रों में उनकी मानवीय सोच ईश्वर और धर्म के प्रति उनका नजरिया और मित्रों के प्रति उनका प्रेम स्पष्ट तौर पर नजर आता है कुछ उदाहरण देखिये

‘मैं एक बूढ़ा और बीमार व्यक्ति हूं जिसके बहुत सारे काम पहले से बाकी हैं. ऐसे में आपके सभी सवालों का जवाब देकर मैं अपना समय ज़ाया नहीं कर सकता और न ही इनका पूरा जवाब दे पाना संभव है. विज्ञान का क्राइस्ट (ईसा) के अस्तित्व से कुछ भी लेनादेना नहीं. मैं नहीं मानता कि ईश्वर ने किसी दूत के जरिए अपनी प्रकृति और मनुष्य की रचना में निहित अपने उद्देश्यों को कभी बताया होगा.’

ये लाइनें उस खत की हैं जो 1879 में चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन ने किसी जर्मन विद्यार्थी के लिए लिखा था. 

उनके लिखे कई पत्रों और उनकी कई किताबों में ईसाइयत के प्रति उनके विरोधी विचार साफ नज़र आते हैं. अपनी जीवनी में डार्विन ने लिखा था, ‘जिन चमत्कारों का समर्थन ईसाइयत करती है उन पर यकीन करने के लिए किसी भी समझदार आदमी को प्रमाणों की आवश्यकता जरूर महसूस होगी. 

उस समय का इंसान हमारे मुकाबले कहीं ज्यादा सीधा और अनजान था जब इन चमत्कारों के बारे में बताया गया था’. ईसाइयत की कहानियों पर संदेह करते हुए डार्विन लिखते हैं ‘इस किताब में लिखी बातों और चमत्कारों की कहानियों में मुझे विरोधाभास नज़र आता है. जैसे-जैसे इन विरोधाभासों का प्रभाव मुझ पर बढ़ता गया ईसायत पर से मेरा विश्वास भी उठता चला गया.’

शुरुआती दौर में ये धर्मग्रंथ और इनके विचार डार्विन पर इस कदर हावी थे कि अपनी दोनों समुद्री यात्राओं पर वे अपने साथ बाइबिल ले गए थे. लेकिन जैसे जैसे उनकी खोज आगे बढ़ती गई बाइबल की कहानियों पर से उनका विश्वाश भी खत्म होता गया.

इस बारे में डार्विन लिखते हैं, ‘इन दो सालों (अक्टूबर 1836 से जनवरी 1839) के दौरान मुझे धर्म के बारे में ढंग से सोचने का मौका मिला. जब मैंने बीगल पर अपनी यात्रा की शुरूआत की थी मैं धर्म को लेकर घोर कट्टरवादी था. मुझे याद है कि जब मैं नैतिकता से जुड़े कई मुद्दों पर बाइबिल को किसी ठोस सबूत की तरह पेश करता था और तब जहाज के कई अधिकारी मुझ पर हंसा करते थे.’

वक्त के साथ डार्विन जैसे-जैसे अपना शोध आगे बढ़ाते गए, धर्म से उनका भरोसा कम होता चला गया धीरे-धीरे बाइबिल और जीसस क्राइस्ट पर से उनका विश्वास पूरी तरह समाप्त हो गया.

 इस बात का जिक्र उन्होंने 24 नवंबर,1880 को लिखे एक ऐतिहासिक पत्र में किया था. डार्विन ने फ्रांसिस एमसी डेर्मोट के एक पत्र का जवाब देते हुए साफ-साफ लिखा था, ‘मुझे आपको यह बताने में खेद है कि मैं बाइबिल पर भरोसा नहीं करता. यही कारण है कि मुझे जीसस क्राइस्ट के ईश्वर की संतान होने पर भी विश्वास नहीं है.’ (2015 में न्यूयॉर्क में नीलामी के दौरान इस पत्र की बोली 197,000 यूएस डॉलर लगाई गई थी)

उनके इन्ही क्रांतिकारी विचारों के कारण ही चर्च और उनके अनुयायियों को डार्विन के मानव विकास के सिद्धांतो से नफरत हो गई थी उन्हें लगता था कि अगर डार्विन के विचार यूँही लोगों तक पहुंचते रहे तो उनके सिद्धांतों से परमेश्वर और बाइबिल पर से लोगों का विश्वाश खत्म हो जाएगा और उनकी धार्मिक दुकानदारी बन्द हो जाएगी क्योंकि डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत उनकी धार्मिक कहानियों से जरा भी मेल नही खाता था.

तमाम ईसाई धर्मगुरूओं का मानना था कि पृथ्वी की रचना क्राइस्ट के जन्म से 4004 साल पहले हुई थी. लेकिन डार्विन के विकासवाद की थ्योरी पृथ्वी की उत्पत्ति को लाखों-करोड़ों वर्ष पहले का साबित करती थी.

 धर्मगुरूओं को दूसरी बड़ी आपत्ति इस बात से थी कि बाइबिल के मुताबिक ईश्वर ने एक ही सप्ताह में सृष्टि की रचना कर दी थी जिसमें उसने पेड़-पौधे, जीव-जंतु, पहाड़-नदियां और मनुष्य को अलग-अलग छह दिन में बनाया था. (बाइबिल के मुताबिक परमेश्वर ने पहले दिन सूरज और पानी बनाए. दूसरे दिन आसमान. तीसरे दिन पानी को एक जगह इकठ्ठा कर ईश्वर ने धरती और समुद्र बनाए और धरती पर पेड़-पौधे लगाए. चौथे दिन परमेश्वर ने तारों का निर्माण किया. पांचवें दिन परमेश्वर ने समुद्र में रहने वाले जीव-जंतुओं के साथ उड़ने वाले पक्षियों को बनाया और छठे दिन परमेश्वर ने धरती और जानवरों पर अधिकार के लिए अपनी छवि में इंसान की रचना की और उसे गिनती में बढ़ने का आशीर्वाद दिया.

लेकिन डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत इस पूरी प्रक्रिया से उलट एक अलग ही कहानी कहता था. डार्विन ने विकासवाद पर आधारित अपनी किताब, ‘द ऑरिजिन ऑफ द स्पीशीज़’ में लिखा था, ‘मैं नहीं मानता कि पौधे और जीवित प्राणियों को ईश्वर ने अलग-अलग बनाया है ये सारे जीव कुछ चुनिंदा जीवों के वंशज हैं और इतिहास के वो चुनिंदा जीव उससे पहले के किसी दूसरे जीवों के वंसज थे जिनमें वक्त के साथ परिवर्तन आते गए और इस तरह धरती पर लाखों प्रजातियों का उदय हुआ.

जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस क्रिक ने 1953 मे एक ऐसी खोज की, जिससे चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत और मजबूत हुए उन्होंने जीव विकास के उस नक्शे को पढ़ने का रासायनिक कोड जान लिया था, जो हर जीवधारी की कोशिका में मौजूद होता है केवल चार अंको वाले इसी कोड को आज डीएनए कहते हैं इस खोज के लिए 1962 में दोनो को चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला.

अलग अलग जीवों के डीएनए कोडिंग के मिलान से भी डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत बिल्कुल सही साबित होता है क्योंकि चिम्पेनजी और इंसानों के डीएनए आपस मे 98 प्रतिशत तक मेल खाते हैं और शोध करने करने पर पता चलता है कि करीब 80 लाख साल पहले दोनों के पूर्वज एक थे इसी तरह गिलहरी और इंसानों के डीएनए 67 प्रतिशत तक मिलते हैं इसका अर्थ ये है कि करोड़ों वर्ष पहले इन दोनों के पूर्वज एक ही थे यानी आज बिल्कुल अलग अलग दिखाई देने वाले ये दोनों जीव 6 करोड़ साल पहले मौजूद जीव की किसी एक ही शाखा से निकले थे और अलग अलग परिस्थियों के अनुरूप खुद को परिष्कृत करते हुए वर्तमान स्वरूप तक पहुंचे हैं.

इसी तरह सांप छिपकली और मगरमच्छ इन अलग अलग प्रजातियों के पूर्वज समय के किसी कालखंड में साझा रहे होंगे.

अजगर का एक्सरे करने पर उसके चार पैर दिखाई देते हैं इसका मतलब है कि ये जीव भी कभी चार पैरों पर चलता होगा बिल्कुल आज के कामोड़ो ड्रेगन की ही तरह.

इन सभी सबूतों के आधार पर सभी धर्मों की बनाई कपोलकल्पित कहानियां झूठी साबित होती हैं.

डार्विन ही वह पहले जीव विज्ञानी थे जिन्होंने जीवन की उत्पत्ति के रहस्यों पर से पर्दा उठाया था जिससे धर्म की वर्षो पुरानी मान्यताएँ बिखर गई थी ऐसा नही है कि उनकी इस महान खोज से केवल ईसाइयत को चुनौती मिली थी बल्कि उनका विरोध तो सभी धर्मों ने किया और आज तक हो रहा है

तो क्या सच मे डार्विन ये कहते थे कि इंसान बन्दर से विकसित हुआ है ?

विकासवाद पूरी सृष्टि का सार्वभौमिक सत्य है चंद सितारे पहाड़ धरती और इस पर रहने वाला हर जीव आज भी निरंतर विकास की प्रक्रिया से गुजर रहा है बन्दर से इंसान का विकास नही हुआ बल्कि बन्दर और इंसानों का विकास किसी साझा पूर्वज से हुआ है और दोनों को वर्तमान स्वरूप तक विकसित होने में करोड़ों वर्षो का समय लगा है निश्चित है कि आज से करोड़ों वर्षों के बाद इन सभी प्रजातियों का स्वरूप आज से बिल्कुल अलग होगा.

अगर सभी इंसान बन्दर से बने हैं तो आज के बन्दर कब इंसान बनेंगे ?

समय और परिस्थितियां ही विकास को गति देती हैं काले बालों वाला जंगली भालू हिमयुग के दौरान जब ठंडे प्रदेशों तक पहुंचा तब उसने वहां के हालात के हिसाब से खुद को ढाल लिया आज वो अपने काले रिश्तेदारों से बिल्कुल अलग है समय के अंतराल में छिपकलियों की कुछ प्रजातियां सांप बन गईं लेकिन कुछ छिपकलियां आज भी अपने उसी रूप में हैं तो आप कहेंगे कि अगर छिपकली से सांप बने हैं तो आज की छिपकलियां क्यों नही सांप बन रही ? 

तमाम जीवों में आज भी विकास हो रहा है निरंतर...

जिसे हम अपनी छोटी सी जिंदगी में शायद ही महसूस कर पाएं फिर भी मैं कुछ उदाहरण देता हूँ जिससे आप विकास की इस मद्धिम गति को थोड़ा बहुत समझ सकते हैं.

बहुत समय तक ये माना जाता था कि नेचुरल सिलेक्शन बहुत धीमी प्रक्रिया है- इसमें हजारों साल लगते हैं. लेकिन कुछ उदाहरण हमारे सामने हैं जब बीसवीं सदी के शुरुआत मे एंटीबायोटिक्स का आविष्कार हुआ था तब माना जाने लगा था इससे रोगाणु पूरी तरह खत्म हो जाएंगे मगर कुछ ही सालों में देखा गया कि इन जीवाणुओं ने एंटीबायोटिक से लड़ना और उसे नष्ट करना सीख लिया है. अब हाल ये है कि किसी भी एंटीबायोटिक के आते ही कुछ एक साल मे ही जीवाणु उससे लड़ने में सक्षम हो जाते हैं.

इसका कारण है जब शुरुआत में सब जीवाणु एंटीबायोटिक से मारे जा रहे थे, तब नया पैदा हुआ जीवाणु उस एंटीबायोटिक से लड़ने की क्षमता में अपनी मां से ज्यादा ताकतवर होगा और लड़ने का यह गुण वह अपनी अगली पीढ़ी को देता जाएगा जिससे कुछ ही दशकों में जीवाणुओं की एक ऐसी नई पीढ़ी तैयार हो जाती है जो अपने पूर्वजों से ज्यादा ताकतवर होती है 

ऐसे ही अलग जीवाणु में यदि एंटीबायोटिक से लड़ने की शक्ति आ जाए, तो वो फटाफट लड़ने की क्षमता वाले जीवाणु पैदा करेगा और जो एंटीबायोटिक से लड़ नहीं पायेगा समाप्त हो जाएगा. यह नेचुरल सिलेक्शन का सबसे बेहतरीन उदाहरण है.

एक और उदाहरण से समझिए योरोप के वेल्स में औधोगिकरण की शुरुआत होने से पहले यहां तितली की कई प्रजातियां थी कुछ ही दशकों के बाद इस क्षेत्र में फैक्टरियों से निकलने वाले प्रदूषण के कारण बहुत सी तितलियां गायब हो गई लेकिन एक प्रजाति ने इस बदलते परिवेश में खुद को ढाल लिया और आज तितली की यह प्रजाति अपने मूल प्रजाति की तितलियों से बिल्कुल अलग दिखाई देने लगी है.

ऐसा ही तमाम जीवों में होता है इंसान और बन्दर आज भी निरंतर बदलाव की प्रक्रिया में है ये अलग बात है कि इनमें होने वाले बदलाव तितलियों या जीवाणुओं की तरह हम अपने जीवन काल मे कभी न देख पाए क्योंकि परिवर्तन की ये गति सभी जीवों में एक समान नही होती छोटे जीव तेजी से बदल सकते हैं लेकिन बड़े जीवों में यही बदलाव लाखों वर्षों की प्रक्रिया हो सकती है इसलिए आप कभी भी बन्दर को बदलते हुए नही देख पाएंगे.

प्रकृति के तीन ही सिद्धांत है जो सार्वभौमिक हैं उत्सर्जन विकास और विनाश.

सृजन विकास और विनाश का यह सिद्धांत जड़ और चेतन दोनों पर लागू होता है क्योंकि चेतन भी प्रकृति का हिस्सा है इसलिए ये सभी जीवों के साथ इंसान पर भी लागू होता है इंसान पैदा होता है उसके शरीर का हर तत्व इस प्रक्रिया से गुजरता है वो विकास करता है और आखिरकार मर जाता है यही सृष्टि का नियम है.

क्या सच मे डार्विन की खोज महज एक थेओरी है ?

जी नही आज विकासवाद का सिद्धांत ठीक वैसे ही एक सार्वभौमिक सत्य है जैसे आज हम जानते हैं कि पृथ्वी घूमती है आज का जीव विज्ञान डार्विन के इसी सिद्धांत पर टिका हुआ है डार्विन के इस सिद्धांत को महज थेओरी बताने वाले लोग डार्विन को इसलिए झुठलाने का प्रयास करते हैं ताकि इन लोगों के झूठे धर्म और नकली धर्मग्रंथ प्रासंगिक बने रहें क्योंकि डार्विन के सिद्धांतों ने इन ईश्वरीय ग्रंथों की बखिया उधेड़ कर रख दी है इसीलिए सिर्फ ईसाई ही नही बल्कि तमाम धार्मिक गिरोहों को डार्विन से नफरत है.

डार्विन ने विकासवाद के सिद्धांत द्वारा हमे ये समझया की परिवर्तन ही संसार का नियम है समय और परिस्थियों के अनुरूप सभी जीवों ने खुद को बदला है परिवर्तन की इस लंबी प्रक्रिया से निकलकर ही विभिन्न प्रकार के जीव आस्तित्व में आये हैं जिन्हें आज हम देखते वे तमाम जीव विजेता हैं वो सृष्टि के हर इम्तेहान में पास हुए हैं इसलिए आज भी हमारे साथ धरती पर विचरण कर रहे हैं जो हार गए वे विलुप्त हो गए.

आज धरती पर हम जीवन के रूप में जो कुछ भी देखते हैं उसका अस्तित्व प्रकृति से लड़ते रहने का ही परिणाम है.

मनुष्य का विकास भी प्रकृति से लड़ने की लंबी प्रक्रिया का नतीजा है मानव सभ्यता की शुरुआत में कहीं कोई ईश्वर नही था इंसान के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रकृति ही थी आग बारिश तूफान और बीमारियों से लड़ते रहना इंसान की मजबूरी थी वो हर बार लड़ता कभी हारता तो कभी कुदरत की विनाशलीला का शिकार भी हो जाता जड़ और चेतन की इस लड़ाई में हर बार चेतना ने खुद को और बलवान किया और निरंतर लड़ते हुए पहले के मुकाबले हर बार मजबूत हुआ सृष्टि और जीवन की ये लड़ाई आज भी लगातार जारी है.

मनुष्य के करोड़ों वर्षों के इतिहास में कही भी कभी भी किसी ईश्वर का कोई हस्तक्षेप नही रहा पिछले 10 हजार वर्षों में ही ईश्वर की अलग अलग कल्पनाओं ने इंसान की अलग अलग सभ्यताओं में आकार लेना शुरू किया.

इंसान ने सबकुछ प्रकृति से जीत कर ही हासिल किया है ज्ञान विज्ञान संसाधन और सभ्यताएं ये सब हमने कुदरत से लड़कर ही हासिल किया है यही हमारे विकास की संक्षिप्त कहानी है हमारी इस विकासगाथा में हम निरंतर आगे बढ़ते गए और पुरानी चीजों से मुक्त होते गए गुफाओ का जीवन पत्थरों के हथियार तीर भाला रथ मिट्टी के घर फूस के घर मिट्टी के बर्तन ये सब जो कभी हमारी सभ्यताओं का अभिन्न हिस्सा थे इतिहास में बहुत पीछे छूट गए लेकिन ईश्वर नाम के सामाजिक बोझ को आज भी हम ढो रहे हैं ईशर महज एक विचार भर नही है बल्कि आज ये एक व्यापार है जिसके द्वारा दुनिया भर में फैले धार्मिक गिरोह लोगों को सदियों से बेवकूफ बनाते आ रहे हैं और ईश्वर का इस्तेमाल संसाधनों को हड़पने में कर रहे हैं इसलिए इन धार्मिक गिरोहों को सत्य शोध और परिवर्तन से नफरत है.

जिस दिन हम डार्विन के सिद्धांतों को ठीक से समझ जाएंगे और इस सत्य को मानव की संस्कृति का हिस्सा बना देंगे उसी दिन धर्म ईश्वर और इनके नाम पर पलने वाले तमाम धार्मिक परजीवियों का वजूद पूरी तरह खत्म जाएगा तब दुनिया से गरीबी शोषण और अराजकता का कलंक भी सदा के लिए मिट जाएगा और चारों ओर बस तीन ही चीजें दिखाई देंगी सत्य प्रेम और परिवर्तन...

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