मुसलमानों की बदहाली की असली वजह इस्लाम - तर्कशील भारत

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Friday, December 7, 2018

मुसलमानों की बदहाली की असली वजह इस्लाम


देश में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक दशा जानने के लिए पिछली सरकार ने दिल्ली हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी. सच्चर साहब ने 403 पेज की भारी भरकम रिपोर्ट को 30 नवम्बर 2006 को लोकसभा में पेश किया गया था. इस रिपोर्ट से पहली बार मालूम हुआ कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति दलित और आदिवासी समाज से भी ज्यादा पिछड़ी है.

राजिंदर सच्चर साहब ने इस रिपोर्ट के द्वारा दुनिया को ये तो बता दिया कि देश मे मुसलमान बेहद गरीबी में जी रहे हैं लेकिन उन्होंने ये नही बताया कि मुसलमानों के इस पिछड़ेपन के लिए असली जिम्मेदार कौन हैं ?
मुसलमानों की इस भयंकर गरीबी का कारण क्या है ?
जब आप इस सवाल जवाब ढूंढने निकलेंगे तब आपको रटे रटाये कुछ जवाब सुनने को मिलेंगे.

जैसे .....
  •  अब तक कि सरकारों की उपेक्षा से मुसलमान गरीब हुए ?
  •  वो पहले से गरीब थे इसलिए और गरीब हो गए ?
  •  उन्हें अब तक ढंग के लीडर नही मिले ?
  •  वोट बैंक की गंदी राजनीति का शिकार होकर मुसलमान गरीब हुए ?

मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार बताए जाने वाले ये सभी कारण कुछ हद तक सही भी हो सकते हैं लेकिन ईमानदारी से विश्लेषण करने पर मुसलमानों की बदहाल स्थिति के लिए इनमे से कोई भी कारण सीधे तौर पर जिम्मेदार नही है बल्कि ये वो वजहें हैं जो गरीबी के असली कारण को ढंकने के लिए ईजाद की गई हैं.

अब सवाल है कि मुसलमानों की गरीबी का असली कारण क्या है तो इसका सही जवाब है उनका धर्म और उनके धर्मगुरुओं की विशाल फौज जो कभी भी इस समाज को जहालत के अंधकार से निकलने नही देते बल्कि वे पीढ़ी दर पीढ़ी इस समाज को गरीबी बदहाली और जहालत के अंधकार में और गहराई तक धकेलते चले जाते हैं.

देश मे तकरीबन 1 लाख से ज्यादा मदरसे हैं जिनमे कम से कम 2 लाख मुल्लाओं की फौज पल रही है जो दिन रात एक करके हर साल लगभग 30 लाख से ज्यादा मुस्लिम बच्चों को तालीम के नाम पर मुल्ला बनाने में लगे हैं इसके अलावा देश मे तकरीबन 3 लाख से ज्यादा मस्जिदे हैं अगर एक मस्जिद में एक मौलवी के गणित से भी हिसाब लगाएं तो 3 लाख मौलवी दिन रात इस समाज को दीन के नाम पर मूढ़ बनाने में लगे हुए हैं नमाज रोजा अल्लाह और कुरान की रट के अलावा इनके पास समाज को देने के लिए तो कुछ नही है लेकिन लेने के लिए बहुत कुछ है मुल्ला मौलवियों की ये पूरी जमात मुस्लिम समाज के चंदों पर ही तो पल रही है.

यही वो लोग हैं जिन्हें मुस्लिम लड़कियों के स्कूल जाने से दिक्कत है मुसलमानों की तरक्की से दिक्कत है किसी मुसलमान की आज़ाद सोच से ये लोग नफरत करते हैं गरीब मुसलमानों के टुकड़ों पर पलने वाले यही लोग 
मुस्लिम समाज के असली दुश्मन हैं लेकिन एक आम मुसलमान कभी इस बात को नही समझेगा और अपनी बर्बादी का ठीकरा हमेशा दूसरों के सर ही फोड़ता रहेगा.

इन मदरसों और मस्जिदों के अलावा देश मे लगभग 10 हजार मजार भी हैं इन सभी धर्मस्थलों का वजूद पूरी तरह मुसलमानों के चंदे पर ही खड़ा होता है और आकार लेता रहता है देश मे हर साल 100 से ज्यादा नई मस्जिदे और 50 से ज्यादा नये मदारिस खड़े हो जाते हैं हर साल हज के नाम पर देश के गरीब मुसलमान 10 हजार करोड़ की महंगी जियारत कर लेते है सब्सिडी वाली जियारत का खर्च अलग. यही पिछड़ा और गरीब मुसलमान हर साल कुर्बानी के नाम पर 10 हजार करोड़ रुपये का जानवर जिबह करके हजम कर लेता है हर साल लगभग 10 हजार करोड़ का चढ़ावा इसी गरीब और पिछड़े मुसलमान की जेब से निकल कर देश के अलग अलग मजारों की चौखटों तक पहुंच जाता है.

वक्त के साथ छोटे मदरसे और मस्जिदें आलीशान होती जाती हैं इसी बीच नई इस्लामिक इमारतें भी तेजी से पनपती रहती हैं.

इस पूरी धार्मिक व्यवस्था को चलाने के लिए हर साल मुसलमान जो चंदा देते हैं वो इतना ज्यादा होता है कि हर साल 10 एम्स जैसे बड़े हॉस्पिटल तैयार हो सकते हैं हर साल 20 बड़ी यूनिवर्सटी बनाई जा सकती है हर साल सैंकड़ों कारखाने लगाए जा सकते हैं जिससे मुस्लिम समाज की बेरोजगारी अशिक्षा और गरीबी पूरी तरह खत्म हो सकती है अगर मुसलमान इस धार्मिक बर्बादी को रोक कर इसे अपने उत्थान पर लगा दे तो उसके माथे पर लगा गरीबीे का कलंक हमेशा के लिए मिट सकता है.

लेकिन मुसलमानों को इसका अंदाजा भी नही है कि किस तरह साल भर में इस्लाम के नाम पर उनके दिए गए चंदे से उन्ही की संतानों के लिए गरीबी और जहालत का भयंकर दलदल तैयार हो रहा है इसके लिए जिम्मेदार न तो सरकार है और न ही राजनीति बल्कि इस बर्बादी के असली गुनहगार खुद मुसलमान ही हैं.

इसी महीने की शुरुआत में बुलन्द शहर में 3 दिसंबर तक चले इजतेमे में मुसलमानों की विशाल भीड़ इकट्ठी हुई बुलंदशहर में हुए इज्तेमा के लिए 8 लाख स्क्वायर फुट में पंडाल बनाया गया

तीन दिन के लिए होने वाले इस धार्मिक आयोजन के नाम पर 10 लाख से अधिक मुसलमान इस शहर में पहुंच गए इज्तेमा में किसी भी तरह की कोई गड़बड़ी ना हो इसके लिए प्रशासन की ओर से 17 विभागों के कर्मचारी और अधिकारियों को काम पर लगाया गया सुरक्षा को देखते हुए बाहरी जिले से एक एडिशनल एसपी, 10 सीओ, 10 एसओ/एसएचओ, 40 इंस्पेक्टर, 150 सब इंस्पेक्टर, 520 कांस्टेबल, 150 हेड कांस्टेबल और तीन कंपनी पीएसी की लगाई गई.

देश के अलग अलग राज्यों से आने वाले लोगों के लिए रेलवे ने 12 स्पेशल ट्रेन की व्यवस्था की इसके लिए गांव के पास ही एक टेम्परेरी स्टेशन बनाया गया.

इस पूरे आयोजन का कुल खर्च 500 करोड़ से ऊपर है. इसमे सरकारी तंत्र का खर्च अलग है

बुलंदशहर के इस इजतेमे से सप्ताह भर पहले भोपाल के ईंटखेड़ी में भी इससे बड़ा इज्तेमा हुआ था भोपाल में हर साल होने वाला मुसलमानों का यह आयोजन दुनिया में सबसे बड़ा और सबसे पुराना माना जाता है
  1. 24 नवम्बर को यहां जो इज्तेमा हुआ इसमे लगभग 14 लाख लोग शामिल हुए 
  2. 50 एकड़ में बैठक
  3. 160 एकड़ में पार्किंग
  4. कुल खर्च 500 करोड़

दुनियाभर के गरीब इस्लामिक मुल्कों में हर साल मजहब के नाम पर इस तरह का इज्तेमा किया जाता है अब तक बांग्लादेश के टोंगी इलाके में सबसे ज्यादा मुसलमानों के इकट्ठा होने का रिकॉर्ड था 2017 में यहां करीब 80 लाख लोग इकठ्ठे हुए थे महाराष्ट्र के औरंगाबाद में इसी साल फरवरी में हुए इजतेमे में एक करोड़ लोगों ने हिस्सा लेकर नया रिकॉर्ड बना दिया है.

24 फरवरी 2018 को शुरू हुआ एतिहासिक इज्तेमा 26 फरवरी को दुआ के साथ समाप्त हुआ दुनिया के इस सबसे बड़े धार्मिक जमावड़े में नमाज़ की सफ की लंबाई 5 किलोमीटर थी एक करोड़ लोगो के रुकने की व्यवस्था की गई रोजाना 8 लाख रूपये का डीजल खर्च था. 
तीन दिनों तक चले इस इज्तेमा का कुल खर्च 2000 करोड़ था.

देश मे हुए केवल इसी साल के इन तीनों इज्तेमा का कुल खर्च 3 हजार करोड़ रुपये से ऊपर बैठता है इसमे सरकारी इंतेजाम में हुए खर्च का कोई ब्यौरा शामिल नही है इतना पैसा मुसलमानों ने इस्लाम के नाम पर केवल 9 दिनों में खर्च कर दिया और सच्चर साहब कहते थे कि मुसलमान गरीब है.

इस्लाम के नाम पर ही पाकिस्तान बना था आज देख लीजिए वहां के हालात क्या हैं जिन्हें भ्रम है कि इस्लाम एक महान मजहब है तो आसिया बीबी और मलाला यूसुफजई जैसी औरतें उनके मुंह पर थूकती हुई नजर आती हैं 

इतना जान लीजिए कि कोई भी किताब आसमानी किताब नही हो सकती ये सब बातें बेवकूफ बनाने के लिए बनाई गईं हैं इन बातों पर विश्वाश करने से ही आप इन धार्मिक गिरोहों के शिकार हो जाते हैं ध्यान रहे इनकी बातों में सिवा जहालत के कुछ भी नही है यकीन न हो तो खुद अपनी धार्मिक किताबो को पढ़िए पता चल जाएगा.

जिस अल्लाह के नाम पर मुल्लाओं का ये गिरोह आपको बेवकूफ बना रहा है वो अल्लाह ही आपकी सभी समस्याओं की जड़ है ये मैं नही कह रहा हूँ बल्कि कुरान में खुद अल्लाह ही ये बात कह रहा है देख लीजिए "हमने तुमसे पहले भी कितने ही रसूल भेजे तुम्हे तंगी और परेशानियों में डाला ताकि तुम मेरे आगे गिड़गिड़ाओ"

अब आप ही बताइए कि क्या ये भाषा किसी खुदा की हो सकती है ? 

वो आपके लिए तंगी और मुसीबतों का दलदल तैयार करता है फिर उसमें तुम्हे धकेलता है और जब तुम गरीबी के उस भयंकर दलदल में गिरकर कराहते हो तब वो तुमसे कहता है अब तुम मेरे आगे गिड़गिड़ाओ वाह रे खुदा कमाल का है तेरा धर्म और गजब हैं वो लोग जो तेरी चापलूसी का धंधा करते हैं.

असल मे खुदा के नाम पर एक ऐसा षड्यंत्रकारी जाल बुना गया है जिसमे ये गिरोह सदियों से आपको उल्लू बनाकर मुफ्तखोरी करता आ रहा है अगर सच मे कोई खुदा है तो उसे उन मक्कार चापलूसों की जरूरत नही पड़नी चाहिए जो उसके नाम पर जोंक की तरह समाज का खून चूस रहे हैं.

धर्म के नाम पर लूटने वाले इन समाज के गद्दारों से हर हाल में आपको पीछा छुड़ाना ही पड़ेगा इसके लिए आपको इनकी साजिशों को समझकर इन्हें बेनकाब करना होगा वर्ना ये मजहबी गिरोह आपकी आने वाली नस्लों को भी हमेशा गिड़गिड़ाते हुए ही रख छोड़ेगा.

17 फरवरी 1600 को रोम के एक चौराहे पर धर्म के नाम पर ईसाइयों की एक भयंकर भीड़ जमा थी जिसने ज्योर्दानों ब्रूनो को सरेआम जिंदा जला दिया था उस समय धर्म के नाम पर अनेकों महान लोगों को इसी तरह मौत के घाट उतारा गया था जो धर्म और सत्ता के भयंकर षड्यंत्रों को समझ गए थे.

क्योंकि धर्म रक्षा के नाम पर चर्च और पादरियों ने ईसाइयों को हिंसक भीड़ में तब्दील कर दिया गया था धर्म और राजनीति के घिनौने घालमेल में ईसाइयों की कई नस्लें बर्बाद हो चुकी थी आखिरकार यूरोप के ईसाइयों का जनजागरण हुआ उन्होंने सबसे पहले पादरियों के बनाये सभी नियमों को जला डाले और बड़े बड़े चर्चों को मिट्टी में मिला दिया इस तरह यूरोप में विज्ञान का उदय हुआ विज्ञान के रास्ते पर चलकर ही यूरोप आज समृद्धि के शिखर तक पहुंचा है.

ये इक्कीसवीं सदी है और आज के इस युग मे भी भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश का मुसलमान वही है जहां कभी यूरोप का ईसाई था.

मुसलमानों की बर्बादी के जिम्मेदार मुल्लाओं का गिरोह रातों रात खडा नही हुआ है ये वही जमात है जो पिछले दिनों पाकिस्तान की सड़कों पर इस्लाम के नाम पर एक औरत को सूली पर चढ़ाने निकला था अगर किसी तरह आसिया बीबी नाम की वो औरत इस भीड़ के हाथ लग जाती तो उसका भी वही हस्र होता जो ईसाइयों ने ज्योर्दानों ब्रूनो के साथ किया था.

उस वक्त कहाँ थे वे लोग जो खुद को इंसानियत के पैरोकार समझते हैं एक औरत की नादानियों से हिल जाए ऐसा मजहब भरभरा कर गिर जाए तो ही अच्छा वर्ना न जाने कितने ही निर्दोष इंसानों को धर्म की नापाक आग में जलना पड़ेगा.

और ये भी न समझना कि मजहब की इस भयंकर आग से तुम बच जाओगे आज तुम इससे बच भी गए तो नफरतों की इस भयंकर आग की लपटें एक दिन तुम्हारी नस्लों तक भी जा पहुंचेगी तब उन्हें बचाने के लिए तुम नही रहोगे और न ही वो तुम्हारा खुदा ही उन्हें बचा पायेगा जिसके लिए आज इतनी बर्बादी और दुश्वारियों को झेल रहे हो क्योंकि जब इस्लाम के रहनुमाओं ने पाकिस्तान के एक स्कूल में मासूम बच्चों को हलाक किया था उस वक्त भी वो खुदा उन्हें बचा नही पाया था क्योंकि आपका यह अल्लाह तो अपने आगे हमेशा तुम्हे गिड़गिड़ाते देखना चाहता है ? अब भी नही समझे तब तुम्हारी नस्लें भी तुम्हारी ही तरह हमेशा गिडगिडाती रहेंगी.

मैं नही कहता कि आप अपने मजहब को त्याग दीजिये मुझे ऐसा कहने का कोई हक भी नही है मुझे बहुत दुख होता है जब मैं मजहब के नाम पर इंसानियत को तबाह होते देखता हूँ इसलिए मैं थोड़ा कठोर हो जाता हूँ हालांकि स्वाभाविक तौर पर मैं इतना कठोर भी नही हूँ मैं बस आपसे इतना कहना चाहता हूँ की आप इतना तो समझदार बन जाइए की मजहब के नाम कोई आपको भीड़ में तब्दील न कर पाए इतना तो समझ जाइये की आप जिस दुनिया मे जी रहे हैं वहाँ आपकी सुरक्षा न्याय और तरक्की के पैमाने मजहबी इल्म पर नही बल्कि व्यवहारिक ज्ञान पर आधारित हैं इसलिए आपको इतनी समझदारी तो होनी ही चाहिए कि धर्म और दुनियावी फलसफे में अंतर को समझ सकें.

आपके टुकड़ों पर पलने वालेे लोग धीरे धीरे आपसे आपकी इंसानियत को छीन रहे हैं और आपको धर्म के नाम पर हैवान बना रहे हैं लेकिन अफसोस कि आप उनके इस घिनौने मंसूबे को समझने के बजाए उन्हें सह दे रहे है उन्हें पोस रहे हैं इतना ही नही आप उन्हें अपनी आने वाली नस्लों को भी बर्बाद करने का मौका दे रहे हैं यही आपकी सबसे बड़ी गलती है.

मस्जिद मदरसा मजार दरगाह हज और मुल्ला मौलवियों उलेमाओं की फौज ये सबसे बड़ी वज़हें है जो मुसलमानों को आगे नही बढ़ने देते इसमे सरकारों का गुनाह ये है कि वे मुसलमानों के पिछड़ेपन के इन कारणों को और मजबूत करती हैं.

जब मुसलमान खुद ही अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने को तैयार हो तो उसके विरोध की राजनीति करने वाले लोगों का दोष क्या है वे भला आपकी बर्बादी को रोकेंगे क्यों ? इसलिए आपकी तरक्की के हर मोड़ पर आपका विरोध करने वाले लोग भी आपकी मूर्खता पर हमेशा आपका साथ देते हैं आखिर क्यों समझ गए तो बदलाव शुरू हो जाएगा देख लीजिए.

सरकारों की ओर से मदरसों को प्रोत्साहन दिया जाता है और हज सब्सिडी दी जाती है मुसलमानों को दिए जाने वाले इन दोनों सरकारी अनुदानों में मुल्क के गरीब लोगों का हजार करोड़ रुपया स्वाहा हो जाता है सरकारों के लिए ये मजबूरी भी है क्योंकि धर्म की घिनौनी राजनीति के द्वारा सत्ता में बने रहने के लिए सभी कौमों का पिछड़ा होना जरूरी है इसके लिए सभी सरकारें पूरी ईमानदारी से काम करती हैं धर्म की अफीम फीकी नही पड़नी चाहिए एक कौम बेवकूफ बनी रहेगी तो दूसरी कौम भी अपनी मूर्खता को धर्म समझ कर उससे चिपटी रहेगी और इस तरह अपनी अपनी मूर्खता में दोनों को हमेशा गर्व रहेगा और दोनों अपनी इस जहालत पर हमेशा इतराते भी रहेंगे दोनों की इसी धार्मिक खुजलाहट में दीर्घकालिक धार्मिक राजनीति का परचम हमेशा बुलंद बना रहेगा और इस दीर्घकालिक राजनीति की अलग अलग शाखों पर बैठे हरे पीले भगवा और लाल रंग के उल्लू हमेशा अपना उल्लू साधते रहेंगे.


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