जातिवाद-एक मानसिक बीमारी - तर्कशील भारत

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Thursday, November 29, 2018

जातिवाद-एक मानसिक बीमारी


रघुराम के लड़के का सिपाही में सिलेक्शन हुआ घरवाले बहुत खुश थे उन्हें अपने होनहार लड़के पर गर्व था दौड़ में वो पूरे राज्य भर में 9वे स्थान पर आया था दो दिन पहले लड़के का जोइनिंग लेटर भी आ चुका था तब से रघु के परिवार में खुशी का माहौल था वो अलग बात थी कि घूस में जमीन चली गई थी लेकिन अब उसे इसका कोई मलाल नही था.

गांव की जिस बस्ती में रघु रहता था उस बस्ती के लिए ये बहुत बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि उनकी पूरी बस्ती में एक भी सरकारी नौकरी नही थी पहली बार उनकी जाती का कोई लड़का सिपाही बनने वाला था.

हालांकि उसी गांव के कई दबंग परिवार में बड़ी बड़ी नौकरियां थी कोई प्रोफेसर तो कोई दरोगा टीचर तो कई थे कुछ रेलवे में भी थे लेकिन इस दलित बस्ती में ये पहली नौकरी थी रघु ने इस खुशी में भोज किया जिसमे उसने बड़े लोगों को भी न्योता दिया जानकीदास को भी लेकिन कोई नही आया उसे इस बात से बहुत दुख हुआ.

वो अगले कई दिनों तक अपनी बस्ती के लोगों से कहता रहा

अरे ई बड़े लोग जब भी कोई काम कहते हैं हम बिना मोल भाव किये कर देत हैं लेकिन आज हमार बेटवा की नौकरी से इनकी सुलग गई है अब देखत हैं कौन काम करवावत है हम से.पहले मजूरी तय करो फिर कोई काम होए न तो कौनो काम न होई और न हमार बस्ती के कौनो आदमी अब कौनो काम करीहें इन लोग के.

रघु ने पूरी बस्ती को चेता दिया था कि उन लोगों का कोई भी काम हो तो नही करना है अगर करना ही पड़ जाए तो पहले मजदूरी तय करके ही करना है किसी से अब कोई लाग लपट नही रखना है.

रघु अपनी बस्ती में पहले से ही रौब रखता था अब तो वो एक सिपाही का बाप हो चुका था इसलिए बस्ती पर उसका रौब सीधे डबल हो गया था.

एक महीने के बाद 

सुबह सुबह रघु हाथ मे लोटा लिए खेत की ओर जा रहा था तभी उसके कानों में आवाज आई रघु चाचा 

रघु ने मुड़ कर देखा तो वो गंगू था जो उसकी ओर साइकिल लिए चला आ रहा था 

चाचा तुमसे जरूरी बात है 

इतना भी का जरूरी है मैदान करे देब की नाही

चाचा तुम मैदान कर आव हम तोहार घरे बईठल हईं.

ठीक तू च ल हम आवत हईं

एक घण्टे के बाद रघु हाथ मुंह धो धा के घर की चारपाई पर गंगू के साथ बैठा चाय पी रहा था 

हां अब बोला तोके का परेशानी रही

चाचा जानकीदास का जौन नया मकनवा बनत रही न हम उसमे बिजली का ठेका लिए रही बीस हजार में तय भइल रहे लेकिन अब काम पूरा होई गवा तो उ हमें 6 हजार थमा के बोले कि जा तोर इससे ज्यादा औकात नाही बा 

इतना सुनते ही रघु को गुस्सा आ गया वो बोला

की हम पहले ही चेताय दिए थे कि कौनो हमसे पूछे बिना इन लोगो का कोई काम न करीहें लेकिन हमार सुनता कौन है अब जाओ रोओ मरो हम का कर सकत हैं ? तुम हमसे पूछे होते तो उसका इतना मजाल नही होता.

चाचा हमसे गलती होय गई माफ कर देओ और हमरा पैसा दिवाय दे व अरे पूरा नही तो 2 हजार और उ दे दिहे तो हमर काम होई जाई दीवाली आने वाली है और घर मे भुजी भांग भी नही है चाचा 

ठीक है चाय पीले उका बाद चल हमरा साथ

जमुनादास के घर पर रघु ने काफी हंगामा खड़ा किया जमुनादास बोला ई गंगूआ हमर पूरा घर के नाश कई दिया है जब इसको काम नही आता तो काहे सकारा बल्ब का बटन दबाओ तो पंखा चलता है बाथरूम में कौनो viring नही बाकी सारा काम भी उल्टा सीधा किया है सब दुबारा करवाना पड़ेगा.

गंगू बोला कि नही रघु चाचा ई सरासर झूठ बोलत है हम पिछले 5 साल से इहे काम करत हईं गुजरात दिल्ली और पंजाब तक मे हम काम किये हैं पिछले महीने ही गुजरात से काम छोड़ कर भागे हैं काहे की उँहा यूपी बिहार के लोगन को खदेड़ा जात रहा हम गांव आये तो इहे हमसे कहे कि हमार फिटिंग का काम बाकी है चलो तुम कर देओ बिस हजार में तय भइल काम पूरा होई गया तो पैसा पचावे की खातिर ई खुद ही कनेक्शन उल्टा सीधा कर दिया है.

रघु ने गंगू की ओर से जमुना दास पर अपनी सारी भड़ास निकाल ली बात बनने की बजाय और बिगड़ गई मामला बातचीत से शुरू होकर हाथापाई तक पहुंच गया किसी तरह मास्टर जी के बीच बचाव के बाद दोनों अलग हुए इसके बाद भगवान दास ने एक फूटी कौड़ी और देने से इनकार कर दिया और बोला

तोर बेटा सिपाही बना है तो इतना घमण्ड और उ ससुरा कलक्टर बन गया होता तब क्या करता भगवान जाने. जा तुझे जो करना है कर ले एक फूटी कौड़ी भी अब और मैं इस गंगू को नही दूंगा.

रघु के लिए अब बात महज चंद रुपयों की नही रह गई थी बल्कि ये उसकी इज्जत का सवाल बन गया था उसे हर हाल में जानकीदास को सबक सिखाना था वो अपनी बस्ती के कुछ लोगों को लेकर सीधे थाने पहुंचा और हरिजन एक्ट में मारपीट का मामला दर्ज कराने की कोशिश की लेकिन दरोगा को पहले ही खबर मिल चुकी थी उसने रघु को समझाया और किसी तरह उसे वापस घर भेज दिया.

घर पहुंच कर उसे लगा कि दरोगा घूस खाकर जमुनादास की पैरवी कर रहा था अगले दिन रघु अपने साथ कुछ लोगों को लेकर सीधे डीएम के यहां पहुंचा 
डीएम से मुलाकात होने पर उसने कहा कि हमारे गांव के कुछ ऊंची जाति के लोगो ने हमारा जीवन दूभर किया हुआ है वो हमसे छुआछूत करते हैं और काम करवा कर पूरा पैसा नही देते मांगने जाओ तो मारते हैं.

डीएम ने आश्वाशन दिया कि कल हमारा उस तरफ का दौरा भी है इसलिए हम कल 12 बजे तक तुम्हारे गांव आएंगे तुम अभी जाओ.

रघु घर लौट आया लेकिन उसे डीएम की बात पर रत्ती भर भी यकीन नही था उसे लगा कि उसने उसे बेवकूफ बना कर भगा दिया है.

अगले दिन वो अपनी चारपाई पर बैठा बस्ती के कुछ लोगों के साथ बात कर रहा था तभी गंगू हड़बड़ाता हुआ उसके दरवाजे पर पहुंचा और चिल्लाकर बोला कि

डीएम साहेब आये हैं प्रधान के यहां बैठे हैं तोहे बुला रहे है दरोगा भी हैं साथ मे और उ जमुना दास को भी बुलावा भेजे हैं.

थोड़ी देर में प्रधान के घर लोगों का मजमा लगा हुआ था बाहर डीएम की गाड़ी के साथ चार पांच गाड़ी और लगी हुई थी

डीएम साहेब सामने कुर्सी पर बैठे थे दरोगा और प्रधान दोनों चारपाई पर बैठे थे सामने वाली चारपाई पर जमुनादास और कुछ लोग थे 

रघु ने दरोगा की ओर देखे बिना सीधे डीएम साहब को प्रणाम किया डीएम साहेब ने कहा कि बैठ जाओ वो चारपाई पर बैठ गया 

अब मामला शुरू हुआ डीएम साहेब की फटकार के बाद जमुनादास ने गंगू के बकाया पैसे दे दिए.

डीएम साहब ने रघु से कहा कि अब से कोई भी मजदूरी रोके तो सीधे डीएम ऑफिस चले आना सबको ठीक कर दूंगा.

अब तो तुम्हे कोई शिकायत नही होनी चाहिए फिर भी और कोई शिकायत है तो अभी बता दो 

रघु ने कहा कि ये लोग हमसे छुआछूत करते हैं  हमारे यहां का भोज नही करते क्योंकि हम निचली जाती के हैं इसलिए.

ई जमुना दास से पूछो हमने बेटवा के नौकरी की खुशी में भोज किया था इनको न्योता भेजे ई नही आये काहे की हम छोट जात के रहली न इसलिए.

डीएम साहेब ने पूछा तुम किस जाति से हो ?

रघु ने जवाब दिया-मल्लाह

डीएम ने फिर पूछा कि तुम्हारी बस्ती में और कौन कौन जाती है ?

वो बोला कि हमारी बस्ती में केवल हमारी जाती के ही लोग रहते हैं चमार पासी और वाल्मीकि लोगों का टोला अलग है.

डीएम ने वाल्मीकि टोले से एक व्यक्ति को बुलाया और उससे पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है ?

जी हुजूर हमार नाम भुवन बा 

भुवन जाओ अपने घर से एक थाली में खिचड़ी बनवा लाओ 

भुवन ने आदेश का पालन किया थोड़ी देर में भुवन थाली हाथ मे लिए हाजिर था जो अब भी थोड़ी गर्म थी

सब लोग इस नजारे को हैरत भरी निगाहों से देख रहे थे.

डीएम ने प्रधान के यहां से चम्मच मंगवाया और पहले खुद दो तीन चम्मच खाया फिर दरोगा को बोला कि खाओ तो दरोगा भी दो चम्मच निगल लिया उसके बाद उसने जमुनादास से कहा कि लो भई तुम भी खाओ न चाहते हुए उसने भी एक चम्मच खा ही लिया अब बारी रघु की थी डीएम ने थाली उसके आगे बढ़ा दिया और बोला कि रघु लो तुम भी खाओ भुवन ने इतनी शानदार खिचड़ी बनाई है.

भुवन ये तुमने बनाई है क्या 

नही सरकार हमार मेहरारू बनाई जल्दी जल्दी में थोड़ा कच्चा रह गइल बा

अरे नही नही भुवन
ऐसी खिचड़ी तो मैंने जिंदगी में पहली बार खाई है लाजवाब है.

डीएम ने थाली रघु के सामने रख दी थी और दो चार चम्मच खिचड़ी और खा लिया था लेकिन रघु को जैसे सांप सूंघ गया था रघु के सामने खिचड़ी पड़ी रही लेकिन उसने उसे हाथ तक नही लगाया.

थोड़ी देर इंतजार करने के बाद डीएम साहेब ने रघु के सामने से थाली उठा ली और प्रधान के यहां से थोड़ा अचार मंगा कर खुद ही बची हुई खिचड़ी को डकार गए.

डीएम साहब जाने लगे तो उन्होंने जमुनादास से कहा की जातिवाद हमारे समाज की काली सच्चाई है जब तक तुम जैसे लोग अपने श्रेष्ठ होने का भ्रम पाले रखोगे तब तक ये सामाजिक कलंक बना रहेगा इसलिए जितनी जल्दी हो सके अपना जातीय दम्भ छोड़ कर इंसान बन जाओ

जाते जाते डीएम साहब ने रघु से कहा की जातिवाद खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की एक दिमागी बीमारी भी है जिससे पूरा समाज ग्रसित है तुम दूसरों के बदलने की अपेक्षा तब तक नही कर सकते जब तक तुम खुद इस बीमारी से न निकल जाओ इसलिए रघु आज के बाद कभी भी किसी से भी जातिवाद या छुआछूत की शिकायत मत करना पहले तुम खुद इस बीमारी से निजात पा जाओ उसके बाद ही किसी और से इसकी अपेक्षा करना.

जब तक तुम्हारा व्यवहार तुमसे नीचे के लोगों के प्रति जायज नही है तब तक तुम्हे अपने से ऊपर के लोगों पर उंगली उठाने का कोई हक नही है.

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