एक कहानी - तलाक़ तलाक़ तलाक़.......!! - तर्कशील भारत

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Monday, November 19, 2018

एक कहानी - तलाक़ तलाक़ तलाक़.......!!


अनवर तीन साल बाद घर लौटने वाला था शादी के तीन महीने बाद ही वो कतर चला गया था इधर शबाना ने ये तीन साल कैसे काटे हैं वो ही जानती है 6 भाई बहनों में अनवर तीसरे नम्बर का है उसकी दो बहनें कुंवारी बैठी एक बड़ी बहन रिजवाना का तलाक हो चुका है वो मायके में ही रहती है दो छोटे भाई है जो अभी काम सीख रहे हैं इतने बड़े परिवार में शबाना के लिए दिन भर बहुत काम रहता है 18 साल की कम उम्र में ही उसने जिम्मेदारियों का भारी बोझ उठाना सीख लिया था रिजवाना के साथ थोड़ी बहुत हंसी ठिठोली की बातों को दरकिनार कर दिया जाए तो शबाना इस घर मे आखिरी बार खुल कर कब हंसी थी उसे याद नही.

वो हर जुमे का इंतजार करती है क्योंकि उस दिन अनवर से फोन पर लंबी बातें हो जाया करती हैं वैसे तो अनवर काफी सुलझा हुआ आदमी है लेकिन दीन धर्म के मामले में अपने वालदैन से भी ज्यादा कट्टरपंथी है वो केवल दसवीं तक ही पढ़ा है शायद पढ़ाई में ज्यादा दिलचष्पी नही रही होगी जब शबाना से शादी हुई थी तब वो पढ़ाई छोड़कर ड्राइवरी सीख रहा था शादी के 3 महीने के अंदर ही वह बाहर चला गया कतर में गाड़ी चलाकर वो 40 हजार रुपये तक घर भेज देता है जिससे घर की जरूरतें अच्छी तरह पूरी हो जाती है.

शबाना बारहवीं में थी जब उसकी शादी हुई लड़का ठीक ठाक था और घर मे वो चार बहनों में सबसे बड़ी थी इसलिए शादी जल्दबाजी में हुई शबाना को शादी की कोई जल्दी नही थी वो और पढ़ना चाहती थी लेकिन अम्मी को लगा कि उसकी शादी जल्दी हो जाएगी तो उसका बोझ कुछ कम होगा वैसे इस छोटे से कस्बे के हिसाब से 18 साल बहुत होते है लड़की की शादी के लिए.

स्कूली किताबों के अलावा भी शबाना बहुत कुछ पढ़ती थी शायद पढ़ने का ये जुनून उसे उसके अब्बू से विरासत में मिला था वो सरकारी स्कूल के टीचर थे जिंदगी में उन्होंने कुछ भी हासिल नही किया था इसलिए अम्मी दिन रात उन्हें कोसती रहती.

शबाना जब 6 साल की थी तभी उनका इंतकाल हो गया था उन्हें पढ़ने का जुनून था अब्बू ने जीवन मे कुछ इकट्ठा किया हो या नही लेकिन किताबों का अच्छा खासा ढेर जरूर इकट्ठा कर लिया था अब्बू की ढेरों किताबें उनकी अलमारी में आज भी रखी हुई थी अम्मी को जब भी उनकी याद आती वो अलमारी की किसी किताब में उन्हें महसूस कर लिया करती थी.

शबाना माँ से छुपाकर चुपके से अब्बू की कोई किताब निकाल लेती और उसे पूरा पढ़कर फिर चुपके से दूसरी किताब से बदल देती इस तरह उसने अपने अब्बू की लगभग सारी किताबें पढ़ डाली थी इन किताबों ने उसे एक जिंदा इंसान बना दिया था वो दुनिया को अलग नजरिये से देखने लगी थी वो दूसरी लड़कियों से बिल्कुल जुदा थी इसलिए उसकी कोई सहेली नही थी वो अपने अकेलेपन को अखबारों और किताबों से बांट लेती थी यही उसके सच्चे दोस्त थे जो उसे ज्ञान भी देते थे और उसे बोर भी नही करते थे.

वो एक छोटे से कस्बेनुमा शहर में रहती थी जहां से कोई भी बड़ा शहर काफी दूर था उसके घर से सबसे नजदीकी शहर गोरखपुर था जहां उसके मामा रहते थे वो अपने मामा के यहां गोरखपुर बहुत पहले एक शादी में गई थी जिसकी यादें भी अब धुंधली हो चुकी हैं लेकिन वो आजतक गोरखपुर की एक चीज नही भूली थी कल्पना चावला की वो बड़ी सी तस्वीर जो उसने शहर के किसी चौराहे पर लगी देखी थी .उसने सुना भी था कि ये ख्वातीन अपने देश की एक मामूली परिवार की लड़की हैं जो जल्द ही नासा की ओर से आसमान की सैर करने वाली है .

गोरखपुर से लौट आने के बाद वर्षो तक कल्पना उसकी कल्पनाओं की नायिका रही वो सपने में कल्पना के साथ उड़ती रही वो खयालों में कल्पना के साथ कई सितारों की सैर भी कर चुकी थी लेकिन जल्द ही उसे पता चल गया कि ये केवल उसका ख्याली पुलाव भर ही है असलियत में वो कभी भी नही उड़ पाएगी उड़ना तो दूर की बात है वो कभी अपने घर की चारदीवारी से बाहर नही जा पाएगी.

उसके अरमान बहुत ऊंचे थे उसके इरादे भी बेहद मजबूत थे वो पंछियों की तरह उड़ना चाहती थी लेकिन वो ये भी अच्छी तरह जानती थी कि चाहकर भी वो ऐसा कुछ नही कर पाएगी वो कल्पना तो कर सकती थी लेकिन कल्पना बन नही सकती थी.

शबाना अपनी चार बहनों में सबसे बड़ी थी घर मे कोई मर्द नही था अब्बू के पेंशन में माँ जैसे तैसे घर चलाती थी परिवार की भलाई इसी में थी कि उसे हर हाल में अपने बेलगाम होते अरमानो को काबू में रखना था.

आखिरकार वो दिन भी आ गया जब अनवर बारात लेकर उसके दरवाजे पर खड़ा था वो थोड़ी खुश भी थी क्योंकि जल्द वो अपनी चारदीवारी से आज़ाद होने वाली थी वो ससुराल पहुंची कुछ दिनों तक सब ठीक था लेकिन जल्द ही उसे अहसास हो गया कि वो एक घेराबंदी से निकलकर दूसरे इंसानी बाड़े में कैद हो चुकी हैं जहां उसके अरमान उसकी सोच और उसकी कल्पनाओं पर सख्त पहरा है उसे परंपराओं को ढोना है जिम्मेदारियों को पूरा करना है और दूसरों की खुशी के लिए अपनी ख्वाहिशों को दफन करते रहना है तभी वो एक नेक ख्वातीन मानी जायेगी और वो पिछले तीन सालों से बहुत ही नेक ख़वातीन बनी हुई है.

आज वो बहुत खुश थी क्योंकि आज रात 8 बजे तक अनवर घर आने वाला था इसलिए वो सुबह चार बजे ही उठ गई और दिसंबर की कड़कती ठंड में भी उसने नहा लिया था आज वो दिन भर कुछ ज्यादा ही मशगूल रहने वाली थी पता नही कब फुरसत मिलती इसलिए उसने उठते ही ग़ुस्ल करना मुनासिब समझा हालांकि उसने नये कपड़े नही पहने क्योंकि उसने सोचा कि अनवर के आने के ठीक पहले वो कपड़े चेंज कर लेगी.

शाम के 6 बज चुके थे घर मे काफी चहल पहल शुरू हो चुकी थी कुछ मेहमान भी आये थे सबको इन्तेजार था अनवर के आने का. जो सुबह के 3 बजे ही दिल्ली लैंड कर चुका था दिल्ली से ट्रेन के रास्ते गोरखपुर स्टेशन भी पहुंच चुका था अब अनवर गोरखपुर से घर पहुंचने के रास्ते मे था.

शबाना की चहलकदमी को देखते हुए घर के सभी लोगों को महसूस हो गया था की अनवर के आने का सबसे ज्यादा इन्तेजार किसे है ?

10 बजे थोड़ी फुरसत निकाल कर शबाना ने कपड़े बदल लिए थे और एक घंटे में कई बार आईने में खुद को निहार चुकी थी रात 11 बजे अनवर की टैक्सी घर के दरवाजे पर थी वहां लोगों का मजमा लग गया था कुछ लोग समान उतारने में लगे थे शबाना घर के मेन दरवाजे की आड़ में खड़ी थी बाहर खम्बे के बल्ब की मद्धिम रोशनी जल रही थी लेकिन शबाना के अंदर अब भी थोड़ा अंधेरा बाकी था जो कुछ ही पल में अनवर की एक झलक पाते ही अचानक गायब हो गया था वो खुशी से झूम उठी अनवर ने भी उसकी ओर नजर डाली हालांकि इन तीन सालों में दोनों व्हाट्सएप्प पर सेल्फी सेल्फी ही खेलते रहे थे लेकिन मिलने का ये पुरसुकून अहसास तीन साल बाद आज उन्हें मिला है.

सुबह के दो बज चुके थे अब भीड़ थोड़ी कम हुई थी सबने खाना खा लिया था शबाना को जागे हुए अब 22 घण्टे हो चुके थे फिर भी उसकी आँखों से नींद गायब थी वो बस अनवर के पास रहना चाहती थी उसे जी भर कर देखना चाहती है ढेर सारी बातें करना चाहती है हालांकि अभी तक अनवर ने उससे एक लफ्ज भी बोला नही था फिर भी वो उसके आस पास ही मंडरा रही थी.

आधे घण्टे में सब लोग सोने चले गए केवल शबाना अनवर अनवर की अम्मी और बड़ी बहन रिजवाना ही अब तक जागे हुए थे तभी अम्मी ने कहा कि शबाना अनवर थका हुआ है उसे कमरे में लेकर जाओ.

यही वो पल था जिसका शबाना को बेसब्री से इंतजार था वो अम्मी की बात सुनते ही बिजली की तरह उठी और अनवर की ओर देखते हुए बोली चलिए.

ये अनवर के लिए शबाना का तीन साल बाद आमने सामने वाला पहला संबोधन था.

अनवर उठा और सीधे कमरे में पहुंच गया इस कमरे को शबाना ने आज ही बहुत ही दिल से सजाया था वो कमरे में पहुंचते ही सीधे रजाई में घुस गया शबाना बेड के एक किनारे की ओर बैठ गई अनवर ने उसका हाथ पकड़ कर नजदीक आने को कहा और थोड़ी देर में शबाना रजाई के अंदर अनवर की बाहों में थी.

अगली सुबह शबाना को उठने में थोड़ी देर हुई उसने जल्दी जल्दी सारा काम निपटाया लगभग सभी मेहमान खा पी कर दोपहर तक विदा हो चुके थे अगले दो तीन दिनों तक ये सरगर्मियां चलती रही फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया लेकिन अभी तक वो अनवर से दिल की बातें नही कर पाई थी हालांकि इस बीच शबाना ने अनवर में बहुत बदलाव महसूस किया.

तीन साल पहले के अनवर में और आज के अनवर में काफी बदलाव था ये बदलाव मजहब को लेकर उसकी सोच में साफ साफ झलक रहा था बिना मूंछों की घनी दाढ़ी वाला अनवर अब बिल्कुल बदल गया था ये क्लीन शेव वाला वो अनवर नही था जो उसे ब्याह कर लाया था उसका बर्ताव भी पहले जैसा नही था वो जब से आया था पांचों वक्त का नमाज पड़ रहा था खाली समय मे इस्लाम की दकियानूसी बातों पर बेमतलब की बहस करता था घर की औरतों को नमाज और कुरान पढ़ने की हिदायत देता था और खुद सारा दिन इसी तरह की बेफिजूल की बातों में मशगूल रहता था हालांकि मजहब के बारे वो पहले से दकियानूसी खयाल रखता था लेकिन कभी उसको इतना कट्टर होते नही देखा था.

आज अनवर को आये हुए एक महीने से ज्यादा हो चुका है सुबह की चाय लेकर शबाना अनवर के पास खड़ी थी अनवर ने शबाना के हाथों से चाय लिया और उसकी ओर बिना देखे ही सवाल दाग दिया.

तुमने फ़ज़्र की नमाज पढ़ी ?

शबाना ने कहा "नही"

"क्यों" अनवर ने थोड़ा तल्ख लहजे में पूछा

शबाना ने भी उसी अंदाज में जवाब दिया.

"मैं नमाज पढ़ना जरूरी नही समझती"

इससे पहले भी मैं नमाज नही पढ़ती थी लेकिन आपने कभी मुझसे ऐसे नही कहा.

शबाना के अचानक इस तरह के जवाब की उम्मीद अनवर को नही थी.

उसे गुस्सा आ गया उसने बोला

"इससे पहले मैंने तुम्हें नमाज पढ़ने के लिए इसलिए नही बोला था क्योंकि मैं खुद इस्लाम को सही तरीके से नही जानता था कतर में एक मेरे दोस्त है मौलाना अब्दुल गफूर साहब उन्होंने मुझे इस्लाम की असली हकीकत से रूबरू करवाया और उन्ही की वजह से मुझे नमाज पढ़ने और इस्लाम के अराकानों पर चलने की हिदायत मिली इसलिए शबाना कल से तुम्हे हर हाल में पांचों वक्त की नमाज पढ़ना ही पड़ेगा"

अनवर की इस बात से शबाना को तस्लीमा नसरीन की वो बात जहन में कौंध गई जिसमें उसने लिखा था कि "मजहब के बनाये सारे दकियानूसी कायदे एक औरत को मर्द का गुलाम बनाये रखने के लिए ही ईजाद किये गये हैं".

शबाना ने अनवर से साफ साफ कह दिया कि वो नमाज नही पढ़ेगी.

इतना सुनते ही अनवर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और गुस्से में उसने शबाना को एक जोरदार थप्पड़ लगा दिया.

शबाना ने अपनी जिंदगी में पहली बार किसी के हाथ से थप्पड़ खाया था इस एक चांटे ने उसे अंदर तक हिला दिया था लेकिन वो सहमी नही डरी नही उसका भी जी चाहा कि एक जोरदार थप्पड़ वो अनवर के गाल पर जड़ दे लेकिन फिलहाल उसने खुद को रोक दिया और कमरे से बाहर निकल आई.

शाम तक शबाना के गाल पर पड़े थप्पड़ की गूंज घर के सभी लोगों के कानों तक पहुंच चुकी थी सास ने बेटे का हौसलाअफजाई करते हुए कहा कि तूने ठीक किया अपने शौहर से ज़बान लड़ाने की उसकी इतनी हिम्मत कहा से हो गई.

हालांकि उसकी बड़ी ननद रिजवाना ने शबाना का पक्ष लिया और घर में सुलग रही गुस्से की आग को बुझाने की कोशिश भी की इसी कोशिश में उसने अपने भाई को समझाया कि ऐसा बर्ताव ठीक नही है तुम्हारे न रहने पर शबाना ने किस तरह घर को संभाला है वो तुम नही जानते वो एक पढ़ी लिखी लड़की है अगर नमाज नही पढ़ती तो इसमें गलत क्या है उसे वक्त कहाँ मिलता है ? अगले साल तक छोटे वाले भाइयों कि शादी हो जाएगी तब कही जाकर उसे फुरसत मिलेगी और तब वह नमाज भी पढ़ लेगी.

रिजवाना की वजह से कुछ दिनों के लिए घर शांत रहा लेकिन शबाना के अंदर बहुत कुछ टूट चुका था जिसे जोड़ने में अनवर ने कोई दिलचष्पी नही दिखाई बल्कि वो इस ताक में था कि वो शबाना के गरूर को कैसे तोड़े और उसे दीन के रास्ते पर जल्द से जल्द मुत्मइन कर दे.

शबाना ने भी कसम खा लिया था कि वो किसी भी सूरत में अपने उसूलों से समझौता नही करेगी.

कुछ दिन और बीते एक रात अनवर ने शबाना से कहा कि मुझे 3 बजे से पहले जगा देना तहज्जुद की नमाज पढ़नी है.

इस बात पर शबाना को गुस्सा आया उसने कहा कि नमाज की चिंता आपको है तो खुद ही समय पर उठ जाना मेरी आँख उस समय नही खुल पाएगी.

इस बात पर दोनों में काफी देर तक बहस हुई और फिर गुस्से में अनवर का हाथ एक बार फिर से उठ गया शोर सुनकर रिजवाना आ गई और बीच बचाव कर शबाना को अपने कमरे में ले गई इस बार भी शबाना अपने गुस्से को पी कर रह गई.

कुछ दिन और बीते शबाना और अनवर के रिश्ते अब पहले जैसे नही रह गए थे एक ही घर मे एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद दोनों अजनबी से हो गए थे शबाना ने शादी के बाद जो ख्वाब देखे थे वो बिखर गये थे उसके अरमानों को एक बार फिर से ग्रहण लग चुका था उसके मन के हर कोने में भविष्य के लिए नाउम्मीदी का अंधेरा छाने लगा था धीरे धीरे नाउम्मीदी का ये अंधेरा उसके मन के अंधेरे कोनों से निकल कर उसके चेहरे पर भी झलकने लगा था.

एक दिन शबाना को कुछ मौलाना टाइप लोग घर मे दिखाई दिए उसने रिजवाना से पूछा तो उसने बताया कि अनवर इन लोगों के साथ चालीस दिन के लिए जमात में जा रहा है.

इतना सुनते ही शबाना का जी चाहा की वो घर मे दिखने वाले इन मौलानाओं की दाढ़ी नोंच ले क्योंकि यही वे लोग हैं जिन्होंने उसके सीधे साधे अनवर को उससे छीन लिया था लेकिन उसे उसकी औकात पता थी वो चाहकर भी ऐसा कुछ नही कर सकती थी.

उसने रिजवाना से कहा कि वो अनवर से कहे कि जमात में जाने से पहले एक बार मुझसे मिल कर जाए लेकिन अनवर ने जाते समय शबाना से मिलना तो दूर एक बार उसे देखना भी मुनासिब न समझा और चला गया.

शबाना के लिए अनवर का यह बर्ताव उसके थप्पड़ों से भी ज्यादा नाकाबिलेबर्दाश्त था.

वो घण्टों सोचती रही रात को भी उसे नींद नही आई अगले दिन भी वो बिस्तर पर पड़ी रही रिजवाना ने उसे समझाने की कई कोशिशें कीं लेकिन वो नाकाम रही शबाना के लिए जैसे उसका सबकुछ उजड़ चुका था अब वो और इस घर मे नही रह सकती थी उसने अपनी माँ से फोन पर बात की लेकिन बड़ी चालाकी से उसने अपने आंसुओ को और अपने जज्बातों को काबू में रखा.

फोन पर अम्मी से कहा की "मुझे आप लोगों की बहुत याद आ रही है मैं कुछ महीने घर पर बिताना चाहती हूँ".

शबाना ने चाहे जितना भी छुपाने की कोशिश की लेकिन मां को अहसास हो गया था की शबाना को उसकी जरूरत है.

अगले दिन सुबह उठते ही सबसे पहले उसने रिजवाना से कहा कि मैं अपने घर जा रही हूं अब की बार रिजवाना ने उसे समझाने की कोशिश नही की बल्कि वो अपनी माँ को समझाने लगी कि उसे जाने की इजाजत दे दो अनवर आएगा तो वो उसे बुला लाएगा.

लेकिन शबाना के अचानक मायके जाने की खबर सास को नागवार गुजरी और उसने तल्ख लहजे में शबाना को कह दिया कि कोई बुलाने नही जाएगा तू अपनी मर्जी से जा रही है तो वही पड़ी रहना इधर का रुख गलती से भी मत करना.

सास से यही उम्मीद थी इतना सुनना था कि वो तेजी से अपना सामान पैक करने लगी अब उसे इस घर मे घुटन सी होने लगी थी ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी बियाबान में फंस गई है.

अगले एक घण्टे में वो बस में थी घर से निकलते समय उसने अपनी सास को सलाम करना भी मुनासिब नही समझा था.

उसे सास के तानों से ज्यादा अनवर की बेरुखी सता रही थी उस घर मे रिजवाना के अलावा कोई जिंदा नही था उसे अहसास हुआ कि वो इतने दिन मुर्दो के साथ रह रही थी.

5 बजे तक वो अपने घर मे थी उसे देखकर माँ खुश थी लेकिन अम्मी के दिल के किसी कोने में शबाना को लेकर एक डर भी छुपा हुआ था जिसे फिलहाल वो जाहिर नही होने देना चाहती थी.

कुछ दिनों के बाद अम्मी को सब कुछ मालूम हो गया लेकिन वो एक सुलझी हुई औरत थी उसे अपनी परवरिश पर भरोसा था साथ ही उसे अपनी इस बेटी पर हमेशा से नाज था उसने शबाना को दिलासा दिलाया कि सब ठीक हो जाएगा जब तक अनवर खुद यहां से तुम्हे नही ले जाता वहां जाने की कोई जरूरत नही है.

इस बीच वो न चाहते हुए भी लगातार कलेंडर देखती रही चालीस दिन कब बीत गए उसे पता ही नही चला अब उसके चेहरे पर थोड़ी बेचैनी दिखाई देने लगी थी अनवर का दिया हुआ फोन वो साथ लाई थी लेकिन उसमे नेटवर्क नही आता था न चाहते हुए भी उसने मां के फोन से अनवर का नम्बर मिला दिया कई बार मिस कॉल देने के बाद भी जब उधर से अनवर की कोई कॉल नही आई तब उसकी बेचैनी और बढ़ गई आखिरकार उसने रिजवाना को फोन लगा दिया.

रिजवाना ने उसे बताया कि अनवर काफी गुस्से में है वो बात नही करेगा और उसे बुलाने भी नही जाएगा साथ ही उसने ये भी बताया कि वो जल्द ही वापस कतर जाने वाला है.

ये सब शबाना के लिए बहुत दर्दनाक था फिर 
से उसकी नींदे उड़ गई थी उसे कई बार लगा कि वो घर की छत में लगे पंखे में लटक कर मर जाये लेकिन फिर उसे अहसास हुआ कि वो इतनी भी कमजोर नही है किसी और कि वजह से वह क्यों मरे ? उसका गुनाह क्या है ? 

अम्मी ने उसे समझाया कि इतना परेशान होने की जरूरत नही उसे एक बार अनवर से मिलना चाहिए.

उसने फैसला किया कि अनवर के विदेश जाने से पहले वो उससे एक बार जरूर मिलेगी.

अगले ही दिन वो रिजवाना को फोन मिलाने की सोच ही रही थी कि रिजवाना ने ही उधर से फोन कर दिया.

उसने बताया कि अगले हफ्ते 17 फरवरी को अनवर की टिकट कनफर्म हो गई है और वो फिर से तीन साल के लिए विदेश जा रहा है इतना सुनते ही शबाना ने कहा कि अगर अभी अनवर वहां हो तो एक बार फोन उन्हें दे दो रिजवाना ने अनवर से बात कराने की कोशिश की लेकिन अनवर ने गुस्से में फोन पटक दिया.

अगले ही दिन शबाना अनवर के दरवाजे पर थी रिजवाना उसे लेकर अंदर गई उसे देखते ही अनवर की माँ आग बबूला हो गई और गाली गलौज करने लगी मोहल्ले पड़ोस के कुछ लोग भी घर मे आ गए थे थोड़ी देर में अनवर भी निकल कर सामने आ गया और आते ही उसने कहा कि तेरे जैसी बेगैरत औरत को मुझे नही रखना है जिसे शौहर की इज्जत की कोई परवाह नही वो औरत सबको दोजख में ले जाती है मैं तुझे अभी इसी वक्त तलाक़ देता हूँ तलाक तलाक तलाक

इतना सुनते ही आस पास खामोशी सी छा गई सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगे थोड़ी देर की खामोशी के बाद शबाना ने सबके सामने अनवर के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और इस थप्पड़ की गूंज के शांत होने से पहले ही वो उसके घर से निकल पड़ी वहां खड़े किसी भी शख्स में इतनी हिम्मत नही थी कि वो शबाना को रोक सकें.

अनवर उसकी माँ और बाकी सभी रिश्तेदार देखते रह गए शबाना जा चुकी थी.

शाम तक वो अपने घर पहुंच गई और माँ को पकड़ कर खूब रोई उसे आज अहसास हुआ की उसके अब्बू नही थे ये आज उसके लिए एक सुकून की बात थी वो जिंदा होते तो उन्हें भी आज बहुत दुख होता इसलिए अच्छा हुआ कि वो आज जिंदा नही हैं.

शबाना की दो छोटी बहनें और थी जो अभी पढ़ रही थी एक बहन की पिछले साल ही शादी हुई थी जिसमें वो दिल खोल कर नाची थी.

धीरे धीरे अनवर की यादों को उसने अपनी जिंदगी से पूरी तरह मिटा दिया और घर मे ही एक ट्यूशन सेंटर खोल कर कस्बे के बच्चों को पढ़ाने लगी.

एक साल के अंदर ही उसका छोटा सा ट्यूशन सेंटर बड़े से इंस्टिट्यूट में बदलने लगा इस काम मे उसकी दोनों छोटी बहने जी जान से जुट गई थी सिर्फ पांच बच्चों को ट्यूशन देने से शुरू हुआ ये कोचिंग सेंटर अगले दो साल के अंदर ही 5000 बच्चों का बड़ा इंस्टीट्यूट बन गया था जिसका नाम था शबाना इंस्टिट्यूट.

आज इस संस्थान का नाम हर जुबान पर था आस पास के इलाके के लोग अच्छे रिजल्ट के लिए इस संस्थान में अपने बच्चे को भेजना चाहते थे शबाना इंस्टिट्यूट में गरीब बच्चों के लिए पूरी तरह मुफ्त तालीम थी इसके बावजूद हर साल इसका दायरा बढ़ता जा रहा था.

शबाना का एक सपना था कि वो गोरखपुर में भी अपने इदारे की एक ब्रांच खोले ये गोरखपुर से उसका लगाव था या वो यूँही अपने काम को आगे बढ़ाना चाहती थी ये बात वो खुद नही जानती थी.

एक दिन वो अपने ऑफिस में थी कि पियोन ने कहा कि कोई ख़वातीन आपसे मिलने आईं है आप कहें तो अंदर भेजूं ?

शबाना ने कहा कि ठीक है भेजो

थोड़ी देर में उसके सामने जो चेहरा था उसे देखते ही वो जैसे उछल पड़ी वो मायूस सी चेहरे वाली औरत रिजवाना थी.

उसने ऑफिस बन्द किया और रिजवाना को साथ लेकर घर पहुंची दोपहर का खाना दोनों ने साथ खाया शबाना को पता चला कि पिछले साल ही अनवर विदेश से वापस आ गया और अम्मी के कहने पर उसने दूसरी शादी भी कर ली नई दुल्हन ने कुछ ही समय मे अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया इसी बीच अम्मी का इंतेक़ाल हो गया और अम्मी की वफात के एक साल के भीतर ही अनवर ने अपनी बीबी के कहने पर रिजवाना को घर से निकाल दिया वो बेचारी कुछ दिनों तक खाला के यहाँ रही बाद में अकेले किराए पर रहने लगी इस दौरान रिजवाना के बच्चों की एक साल की पढ़ाई बर्बाद हो गई इसी बीच उसे पता चला शबाना इंस्टिट्यूट के बारे में तो वो अपने बच्चों के भविष्य की खातिर उसके पास चली आई.

कभी रिजवाना ने शबाना को अपने दिल मे पनाह दी थी बदले में आज शबाना ने उसे अपने घर मे जगह दे दी है साथ ही उसके बच्चों के बेहतर तालीम की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर उठा ली है.

शबाना इंस्टिट्यूट के शुरू हुए पांच पूरे होने की खुशी में आज एक बड़ा प्रोग्राम है जिसमे कई बड़े लोग शिरकत करने वाले हैं आज शबाना बहुत मशरूफ है सुबह से उसके फोन की घण्टी लगातर उसे और मशरूफ कर रही है उसके साथ उसकी दोनों बहनें और रिजवाना भी काफी बिजी हैं इसी बीच एक बार फिर से उसके फोन की घण्टी बजती है अनजान नम्बर को देखते हुए वो फोन अपनी छोटी बहन निशा को पकड़ा देती है थोड़ी देर में निशा उसके पास दौड़ी हुई आती है और फोन उसे पकड़ाते हुए कहती है कि ये फोन आपके लिए ही है आप बात कीजिये.

शबाना जल्दबाजी में फोन कान से सटाकर कहती है आप कौन ?

दूसरी ओर से एक रूखी सी आवाज आती है अनवर

इतना सुनते ही वो फोन काट देती है इस आवाज को सुनते ही उसकी मसरूफियत खत्म हो जाती है वो सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ जाती है पियोन एक गिलास पानी देता है वो एक बार मे ही पूरा गिलास गटक लेती है तभी फोन की घण्टी दोबारा बजती है इस बार वो फोन नही उठाती थोड़ी देर में फिर घण्टी बजती है इस बार वो फोन उठा लेती है और गुस्से में पूछती है क्यों फोन किया ?

अनवर कहता है कि मैं तुमसे मिलना चाहता हूं अभी.सुबह से बाहर खड़ा हूँ लेकिन कोई मिलने नही दे रहा.

कुछ देर सोचने के बाद वो पियोन से कहती है कि मेन गेट पर कोई अनवर नाम का आदमी खड़ा है उसे बुला लाओ.

अगले दस मिनट में अनवर शबाना के सामने वाली कुर्सी पर बैठा था बिल्कुल खामोश सर झुकाए जैसे टीचर के सामने कोई फेल हो चुका शागिर्द बैठा हो शबाना के लिए ये पल ऐसा था जैसे उसके सामने कब्र से कोई मुर्दा जिंदा हो गया हो.

वो कुछ बोलती इससे पहले ही रिजवाना वहाँ आ चुकी थी और गुस्से में उसने अनवर के मुंह पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया जो काम शबाना को करना चाहिए था वो रिजवाना ने कर दिया था अब जाके शबाना के गाल पर पड़े दो थप्पड़ों का हिसाब बराबर हुआ था.

शबाना ने रिजवाना को रोक दिया था क्योंकि वो इस्लाम की एक चीज को पसंद करती थी कि ब्याज हराम है वर्ना शबाना को पड़े थप्पड़ों का सूद भी वसूल हो जाता.

शबाना आज के दिन बहुत बिजी थी इसीलिए उसने पियोन को कह कर अनवर को गेस्ट हाउस में ठहरा दिया.

दो दिन के बाद उसने अनवर को ऑफिस में बुलाया और उससे पूछा कि अब मुझसे तुम्हे क्या चाहिए ?

अनवर ने बताया कि उसने जो शादी की थी उस औरत ने उसे तलाक़ दे दिया और कोर्ट ने मुआवजे में उसकी सारी जमा पूंजी उस औरत को दिलवा दी दोनों छोटे भाइयों की शादियां हो गई उन्होंने मिलकर घर का बंटवारा कर दिया अनवर के हिस्से का जो कुछ भी था वो दूसरी वाली के तलाक के मुआवजे में चला गया.

अब वो बिल्कुल बेसहारा है उसे किसी सहारे की सख्त जरूरत है.

वक्त ने जैसे पूरा इंसाफ कर दिया था हर वो चीज आज पलट गई थी जो कभी शबाना का मुकद्दर हुआ करती थी वो सोच रही थी कि किसे कोसे और किसे शाबाशी दे उसके पास जीवन भर कोसने के लिए जो आदमी था वो उसके सामने खुद को कोसने की हालत में बैठा था.फिर भी आज वो खुद को शाबाशी तो जरूर दे ही सकती थी कि वो अपने उसूलों पर कायम रही खुद को कभी झुकने नही दिया और उसके ऊपर आज किसी का कोई एहसान भी बाकी नही बचा.

तालाब के ठहरे हुए पानी मे उफान की गुंजाइश नही होती इसलिए तालाब कितना ही बड़ा छोटा या गहरा हो उसकी लहरें कभी बगावत नही कर पातीं समुद्र की लहरें भी वर्षों तक जिन किनारों को अपना दायरा समझती हैं चक्रवात के समय भी वह अपने किनारे की बंदिशों से आगे नही बढ़ पातीं.

लेकिन सुनामी आने पर वही लहरें अपनी राह की सभी रुकावटों को मिटा देती है किनारों को साफ कर देती हैं और बंदिशों को तोड़ देती हैं ये लहरें हर उस चीज को तबाह कर देती हैं जो उसे रोकने की हिमाकत करते हैं शबाना भी सुनामी की उस लहर की तरह थी जिसने अपने किनारों को तोड़ दिया था.

दस साल बीत चुके है और शबाना इंस्टिट्यूट आज सुर्खियों में है क्योंकि इसी इंस्टिट्यूट की एक लड़की ने नासा के एक एग्जाम में टॉप किया है जो आने वाले वक्त में अंतरिक्ष की सैर पर जाएगी.

आज शबाना खुश थी ये सोचकर कि मर्दवादी सोच और मजहब की बेफिजूल रवायतों पर एक औरत के बुलन्द इरादों और बेमिसाल हौसलों की एक नई इबारत वह लिख चुकी है और एक औरत की इस विजयगाथा की नायिका वह खुद है.

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