हमे निराशावादी नही होना चाहिये.... - तर्कशील भारत

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Saturday, November 17, 2018

हमे निराशावादी नही होना चाहिये....


मैं निराशावादी हूँ 
और हमेशा नकारात्मक ही सोचता हूँ 
शायद ये मेरी मनोवृत्ति भी हो सकती है
इसलिए आज मैं 
अपने लिए
सदा खुश होने का
एक जबरदस्त फार्मूला 
ढूंढ लाया हूँ

अगर आप भी मेरी तरह
नकारत्मक सोचते हैं
तब ये फार्मूला आप भी 
आजमा सकते हैं

अगर बीमारियां हैं
तो उन्हें दूर करने की
दवाएं भी हैं
गरीबी है 
तो उसे दूर करने की 
योजनाएं भी हैं
अगर निराशा है
तो कुछ आशाएं भी हैं
और नफ़रतें हैं तो 
तो कुछ संवेदनाये भी है

ये कुछ कारण है
जिसपर आपको और मुझे
गर्व होना चाहिए
और खुशी भी
इसलिए हमे
निराश नही होना चाहिए

मैं मानता हूं कि 
सब बुरा नही

समाज मे
कुछ बुराइयाँ हैं
तो
कुछ अच्छाइयां भी हैं
गम भरी उबासी के बीच
खुशी की शाहनाइयां भी हैं 
चारो ओर फैली
तन्हाइयों के बीच
हमेशा साथ चलने वाली
परछाइयाँ भी है
नीम बेहोशी के आलम में
चेतनाओं की जागृतियाँ भी हैं
इसलिए
हमे निराश होने की जरूरत नही

इसलिए मैं अपनी निराशा को त्यागता हूँ
आप भी अपनी निराशा को त्याग दीजिये

ऊंची इमारतों में
पनप रही खुशहाल संस्कृति 
आपके लिए 
खुशी का कारण हो सकती है
शायद मेरे लिए भी
और उन सबके लिए भी
जो इस विलासिता को 
भोग रहे है
लेकिन इस संस्कृति को 
पोसने में
कितनी विकृतियां पैदा हुई 
जानने की जरूरत नही
इससे निराशा आएगी

और हमे निराश नही होना चाहिए

वो गरीब मजदूर आज भी मजबूर है
जिन्होंने कंक्रीट के इन जंगलों को 
आकार दिया है
वो श्रमिक आज भी 
आश्रय की तलाश में हैं
जिन्होंने इन इमारतों को तैयार किया है
और वो कामगर आज भी
भटक रहे हैं जिन्होंने
इन महलों को साकार किया है

फिर भी हमे
निराश नही होना चाहिए

क्योंकि ये गरीब मजबूर मजदूरों की भीड़ नही होगी
तो कंक्रीट के इन 
विशाल जंगलों को 
उगाएगा कौन ?

ये गरीब मजबूर मजदूर लोग
नही होंगे तो
राष्ट्र का निर्माण कैसे होगा ?

गरीब मजबूर और मजदूर लोगों की ये भीड़ न होगी तो
बड़े बड़े फ़्लाईओवर 
सिग्नेचर ब्रिज
शॉपिंग मॉल हाउसिंग कॉम्लेक्स
सिनेमा हॉल मल्टीप्लेक्स
मेट्रो एयरपोर्ट और हाइवेज 
कौन बनाएगा ?

ये गरीब मजबूर और मजदूर नही होंगे तो
हमारे 
ईश्वर अल्लाह भगवान और गॉड
के आलीशान महलों को कौन बनाएगा ?

ये नही होंगे तो 
स्वर्ग जैसे विशाल आश्रम
मंदिर और मस्जिद 
कौन तामीर करेगा ?

ये गरीब मजबूर मजदूर नही होंगे
तब ईश्वर अल्लाह के नाम पर
लड़ेगा कौन ?

ये गरीब मजबूर मजदूर नही होंगे
तब ईश्वर अल्लाह के नाम पर
डरेगा कौन ?

ये गरीब मजबूर मजदूर नही होंगे
तब ईश्वर अल्लाह के नाम पर
दान पेटियों को भरेगा कौन ?

ये न होंगे तब
स्मार्ट सिटी बुलेट ट्रेन डैम और रेल नेटवर्क
कौन तैयार करेगा ?

बड़ी बड़ी इमारतों को
बनाने वाले
और
दिन की दिहाड़ी पर
गुजारा करने वाले
गरीब मजदूर और मजबूर 
लोगों के लिए सरकारों ने भी
बड़ी बड़ी योजनाएं तैयार की हैं
इन बड़ी बड़ी योजनाओं का सालाना बजट 
लाखों करोड़ का होता है

कुछ रुपये की औकात वाले
इन गरीब मजदूरों को 
इससे ज्यादा
और क्या चाहिए

इन गरीब मजबूर और मजदूर लोगों के 
बच्चों के भविष्य के लिए
सरकारों ने
बड़े बड़े सरकारी स्कूल 
भी खड़े किए हैं.

इन स्कूलों की 
बड़ी बड़ी बिल्डिंगों के नीचे
छोटे छोटे बच्चे
शिक्षा के नाम पर
मिड डे मील भी
हासिल कर रहे हैं.

इन सस्ते सरकारी स्कूलों में
महंगे टीचर हैं
सरकार की मोटी तनख्वाह 
लेकर ये अमीर टीचर
बदले में
गरीबों के बच्चों को
शिक्षा छोड़कर
बाकी बहुत कुछ देते हैं

इन गरीब मजबूर और मजबूर लोगों को 
ये अच्छी तरह पता है कि
सरकारी स्कूल 
पढ़ाई के लिए नही होते 
बल्कि
इन सरकारी स्कूलों से
बड़ी तादात में
वर्तमान मासूम योग्यताओं का निष्पादन कर
भविष्य के लिए
बेहतर मजदूरों का 
निर्माण किया जाता है.

इन बच्चों के बस्तों में 
किताबें हैं या नही
माँ बाप को पता नही
और
बच्चो को 
इनकी जरूरत भी नही
हाँ इनके घरों में
गीता और कुरान जरूर है
ये इनको पता है.

इन बच्चों को 
अपने दादा का नाम 
याद भले ही न हो
लेकिन ये बच्चे अपने अपने
ईश्वर और खुदाओं को 
बखूबी जानते हैं
क्योंकि इन्हें 
tv अखबार 
परिवार समाज 
और स्कूल से
दुनिया का 
कोई इल्म मिले या न मिले
धर्म का ज्ञान तो
जरूर मिल जाता है
वो भी भरपूर.

इसलिए ये बच्चे बड़े होकर
कुछ बने या न बने
हिन्दू या मुसलमान
जरूर बन जाते हैं.

भविष्य की 
इस बर्बादी को देख कर 
जब निराशा घेरने लगे
तब 
प्राइवेट स्कूलों में
पल रहे टैलेंट को देख कर
खुश हो जाना चाहिए
बेशक 
इन स्कूलों की नर्सरियों में
केवल सक्षम प्रजाति के 
वे बच्चे ही
पनप सकते हैं जो कंक्रीट के जंगलों में उगते हैं क्योंकि
इन्हें सीचने में 
जो खाद पानी लगता है
वो बहुत महंगा होता है

कंक्रीट के जंगलों को
उगाने वाले गरीब मजबूर और मजदूर लोग
इतना महंगा खाद पानी
एफोर्ड नही कर सकते
इसलिए 
उन्हें सरकारी स्कूलों की
खैरात दे दी गई है 
जहां उन्हें कुछ भी देना नही पड़ता
और उनके बच्चों को
सरकार मुफ्त में
खिचड़ी भी खिलाती है.

इसलिए हमे
निराश नही होना चाहिए

पीढ़ी दर पीढ़ी
गुलामी करती
गरीब मजदूर और मजबूर लोगों की ये भीड़
यूँही ही नही बनी है
बल्कि इसे तैयार करने में
हजारों वर्षों की
तपस्या लगी है
इन्हें गरीब मजदूर और मजबूर
बनाने रखने के लिए धर्म की अफीम दे दे कर
इन्हें मानसिक रूप से 
तैयार किया गया है.

किसी कौम को पीढ़ी दर पीढ़ी गरीब बनाये रखना 
इतना आसान भी नही था 
सैंकड़ों ग्रंथों को लिखना पड़ा हजारों आयतों को बनाना पड़ा इनकी स्मृतियों को मिटाना पड़ा और इनकी संस्कृतियों को इनसे छीनकर इन्हें झूठे धर्मों की
जंजीरों में बांधना पड़ा 
तब जाकर गरीब मजदूर और मजबूर लोगों की ये फौज 
आज हमारी गुलामी में जुटी है.

इसलिए हमें निराश नही होना चाहिए और आगे बढ़ते रहना चाहिए

जब भी हम
लालबत्ती पर
करतब दिखाकर
भीख मांगते
किसी मासूम बच्चे को देखें
तो निराश होने की जरूरत नही

उसी लालबत्ती पर 
खड़ी
किसी महंगी गाड़ी के 
अंदर बैठे
उस अमीर बच्चे को देखकर  
हमे
खुश हो जाना चाहिए 
जो कान्वेंट स्कूल के 
फंक्शन में अपना टेलेंट 
दिखाने जा रहा है.

जब भी हम झुग्गियों में 
सड़ती जिंदगियों को देखकर 
विचलित हो जाएं 
तब आलीशान बंगलों में
बसने वाले धनवान लोगों 
और उनके खुशहाल कुत्तों को देख कर हमे भी 
खुद को विकसित महसूस करना चाहिए क्योंकि यही वो लोग हैं 
जो देश को विकसित बनाते हैं.

जब भी हमे सड़क पर
भूख से बेहाल कोई 
चेहरा नजर आए 
हमे निराश बिल्कुल नही होना चाहिए
बल्कि उसी सड़क के किसी चौराहे पर लगी
किसी महापुरुष की आलीशान 
मुस्कुराती मूर्ति को देखकर 
हमारा सीना 
चौड़ा हो जाना चाहिए 
क्योंकि 
इन मूर्तियों की कीमत 
हजारों इंसानों से ज्यादा है.

जब भी 
गंदी झुग्गि बस्तियां हमारी भावनाओ को आहत करें
तब हमे
ऊंची अट्टालिका को देखकर 
खुश हो जाना चाहिए क्योंकि 
इन ऊंचे भवनों में 
वे लोग रहते हैं
जो देश की इकॉनमी को
गति देते हैं.

सरकारी अस्पतालों की
भीड़ में
इलाज के लिए तड़प रहे
किसी बीमार को देखकर 
उसकी पीड़ा से हमे
दर्द महसूस होने लगे
तब 
देश के उन आलीशान 
प्राइवेट हॉस्पिटलों पर
हमे गर्व होना चाहिए 
जहां विदेशी लोग भी 
इलाज के लिए आते हैं

नालों फुटपाथों और हाइवेज के किनारे जिंदगियों को घसीटते दिखाई देने वाले 
बेघर लाचार बेबस और बदहाल 
लोगों को देखकर
दुखी होने की जरूरत नही
क्योंकि ये अपने
पिछले जन्मों के पापों की
सजा भोग रहे हैं
जो इन्हें भोगना भी चाहिए

गरीबी महापाप है
इस हिसाब से भी 
ये सभी लोग
महापापी साबित होते हैं

ये जिंदों के शहर में मुर्दा है
या मुर्दों के शहर में जिंदा है 
पता नही

इन्हें देखकर हमे निराश होने की जरूरत भी नही

क्योंकि हमें 
उस ईश्वर की खोज भी तो करनी है
जो हमारी तक़दीर लिखता है
किसी को गरीब बनाता है
किसी को अमीर बनाता है

दरिंदगी की शिकार होती
किसी मासूम बच्ची की चीख
भले ही उसे न सुनाई दे
लेकिन 
घंटी और अजान के शोर को वो सुन लेता है
अन्याय और शोषण की भयानक वेदनाएं उस तक कभी नही पहुंचती 
लेकिन चढ़ावे का माल उस तक जरूर पहुंच जाता है

किसी के दर्द पीड़ा और आंसुओं से उसे कोई दुख नही होता 
लेकिन
भक्ति और नमाज से वो खुश जरूर हो जाता है

ये वही खुदा है जो
गरीब और मेहनतकश 
लोगों को
बर्बाद रखता है 
और
पाखंडियों धूर्तों मक्कारों और चापलूसों को आबाद करता है.

ये सब उसी ईश्वर का खेल है
जो किसी को पीढ़ी दर पीढ़ी
पीड़ा देता है
किसी को पीढ़ी दर पीढ़ी
केवल सुख देता है
इसलिए
ईश्वर की मर्जी से
पीढ़ी दर पीढ़ी 
खाक छानते लोगों की परवाह 
हम भला क्यों करें

इससे निराशा होगी
और इन तुच्छ प्राणियों के लिए
हम क्यों टेंसन लें
ये मरते हैं तो मरने दो
लड़ते है तो लड़ते दो
और सड़ते हैं तो सड़ने दो

हमे इनके लिए निराश नही होना चाहिए

हिंदी अखबारों की सुर्खिया 
जब डराने लगे
तब अंग्रेजी अखबारों की
इंटरटेनमेंट न्यूज़ पढ़ कर 
खुश हो जाना चाहिए.

जब भी 
मर रहे किसानों से 
हमे पीड़ा होने लगे
हमे स्पोर्ट्स में 
इंडिया की जीत का 
जश्न मनाना चाहिए

गिरता रुपया बढ़ती कीमतें
सड़ते अनाज और घटती इंसानियत वाले उतार चढ़ाव के इस अनिश्चित दौर में 
अगर कुछ स्थाई है 
तो वह है
जिंदगी का संघर्ष

और इस संघर्ष में
हम निराश हो गए
तो वे लोग हमसे आगे निकल जाएंगे
जो आज हमसे पीछे हैं
इसलिए हमें 
निराशा त्याग कर
लगातार भागते रहना है
पूंजीवाद की अंधी दौड़ में
सबसे तेज सबसे आगे भी
पहुंचना हैं

रोटी कपड़ा और मकान 
से भी कही आगे...

थ्री फोर bhk बंगला गाड़ी
शेयर मार्केट बैंक बैलेंस 
सोसाइटी 
इससे भी कही आगे...

इतना आगे पहुंचने के लिए
हमे पीछे मुड़कर नही देखना है

कोई मरता है तो मरने दो
कोई लड़ता है तो लड़ने दो
कोई सड़ता है तो सड़ने दो

कोई भूख से मरे या दंगों में
ये उनकी किस्मत है
हमारा क्या दोष
इसलिए
हमें इनसे 
कोई वास्ता नही होना चाहिए
हमे निराशावादी नही होना चाहिए

यही है मातमी माहौल में भी
सदा खुश रहने का
सबसे कारगर फार्मूला
जिसे अपनाकर
हमे कभी कोई
दुख नही होगा
बल्कि हमारे चेहरे पर
हमेशा एक
मुस्कुराहट बनी रहेगी
इससे हमारी
निराशा तो खत्म होगी ही
हमे खुश देखकर 
हमारा परिवार भी सुखी हो जाएगा 
और परिवार का सुख ही
हमारी सबसे बड़ी
खुशी है 
कोई मरता है तो मरने दीजिये
क्या फर्क पड़ता है
हमें निराशावादी नही होनी चाहिए

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