"नौकरी नही मिलेगी तो जी कर क्या करेंगे ?" -और 4 नौजवान ट्रेन के आगे कूद गये - तर्कशील भारत

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Friday, November 23, 2018

"नौकरी नही मिलेगी तो जी कर क्या करेंगे ?" -और 4 नौजवान ट्रेन के आगे कूद गये

नौकरी नही मिलेगी तो जी कर क्या करेंगे
और 4 नौजवान ट्रेन के आगे कूद गये 3 की मौत हो गई.

ये चारों युवा लगभग उसी उम्र के हैं जिस उम्र में भगत सिंह सुखदेव राजगुरु अशफाकुल्लाह फांसी पर चढ़े थे नौकरी के लिए ट्रेन के आगे जान देने वाले इन युवाओं के लिए जिंदगी का मकसद बस एक अदद नौकरी थी.

आज से 90 साल पहले भी बेरोजगारी थी लेकिन भगत सिंह और उन जैसे तमाम नौजवानों के लिए उनकी लड़ाई एक अदद नौकरी नही थी वे अन्यायपूर्ण हुकूमत को उखाड़ फेंकना चाहते थे और एक ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें अनाज उगाने वाला भूखा न सोता हो भवनों को बनाने वाला मजदूर बेघर रहने को मजबूर न हों और जहां पेट के लिए तन का सौदा न हो.

उनकी लड़ाई सिर्फ मौजूदा अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी से मुक्ति पाने की नही थी बल्कि वे ऐसी आजादी के खिलाफ भी थे जिसमें पेट के लिए किसी को भीख मांगने पर मजबूर होना पड़े इसलिए भगत सिंह और उनके युवा साथी निकल पड़े थे अपने दम पर मुल्क की तक़दीर और तस्वीर को बदलने... वे हर हाल में सबकुछ बदल देना चाहते थे जुल्म और व्यथा की हस्ती को मिटा देना चाहते थे वे सदा के लिए गुलामी की जंजीरों को तोड़ देना चाहते थे वो भी जल्द से जल्द इसलिए 20 साल की छोटी सी उम्र में ही उन्होंने न्याय समानता और मानवता पर आधारित व्यवस्था के लिए क्रांति का बिगुल बजा दिया और फिर उन्होंने ऐसा धमाका किया कि बहरी सरकार के कानों के पर्दे फट गये उन्होंने सत्ता को झकझोर कर रख दिया था बहरे कानों में क्रांति की आवाज़ें गूंज उठी थी जो अब तक सोए थे वे भी जाग उठे थे और जो जागे हुए थे उन्होंने क्रांति के झंडे को थाम लिया था लेकिन जो युवा अभी तक सोए हुए थे उन्हें जगाने के लिए कुर्बानी जरूरी थी इसलिए भगत सिंह और उनके युवा साथी हंसते हंसते फांसी पर झूल गये और इस तरह इंसानियत के लिए मरने वाले वे नौजवान हमेशा के लिए अमर हो गये.

नौकरी के लिए आत्महत्या करने वाले इन 4 लड़कों के मरने पर मुझे इनसे कोई हमदर्दी नही है बल्कि ऐसी मानसिकता के और जितने भी युवा आज जिंदा हैं उन्हें जल्द से जल्द इसी तरह मर जाना चाहिए उन्हें जिंदा रहने का कोई हक भी नही है.

भगत सिंह ने कहा था कि जब तक एक आदमी भी भूखा है हम सब अपराधी हैं क्योंकि हम खा रहे हैं.

नौजवानों ने मिकलर ही दुनिया भर में बड़ी बड़ी क्रांतियां की हैं और उन क्रांतियों की भट्टियों से निकलकर ही आज कोई भी देश विकसित बन विश्व के धरातल पर चमक रहा है वहां भी समस्याएं विकराल थी बेरोजगारी गरीबी अन्याय शोषण और बदहाली का दंश दुनिया के तमाम देशों ने भी वैसे ही झेला है जैसे अपने देश मे एक बड़ी आबादी आज ये सब झेलने को मजबूर है लेकिन आज हमारे लिए सबसे बड़ा सवाल ये है कि इस परिदृश्य को बदलेगा कौन समाज किससे अपेक्षाएं करें ? 

जिन युवाओं को परिवर्तन की ओर कदम बढ़ाना था उनमे से कुछ मंदिर मस्जिद की चौखट पर पड़े हैं कुछ परिवार के खूंटे से बंधे हैं कुछ सत्ता के साथ खड़े हैं कुछ नौकरियों की लाइन में लगे हैं कुछ नेताओं के झंडे थामे हुए हैं कुछ धर्म का परचम बुलन्द कर रहे हैं और कुछ एक अदद नौकरी के लिए ट्रेन के आगे सुसाइड कर रहे हैं.

यही है आज का युवा जिसे मतलब नही की देश मे प्रतिदिन कितने किसान मर रहे हैं कितने बच्चे भूख और कुपोषण से मर रहे हैं कितनी मासूम बच्चियों का रेप हो रहा है प्रतिदिन कितने परिवार उजड़ रहे हैं कितने निर्दोष व्यवस्था की चक्की में पिस रहे हैं बचपन बर्बाद हो रहा है जवानी मुर्दा हो रही है और बुढापा निढाल हो रहा है संसाधन लूटे जा रहे हैं प्रसाधन सिमटते जा रहे है इंसानियत घटती जा रही है अमीरी गरीबी जनसंखया अन्याय शोषण अपराध और अराजकता तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं लेकिन आज के युवाओं को इस भयंकर बरबादी की कोई फिक्र नही.

इन्हें चिंता है मंदिर मस्जिद बनाने की इंसानियत खत्म हो जाये लेकिन इनका ईश्वर अल्लाह हर हाल में जिंदा रहना चाहिए सड़क पर तड़पते किसी इंसान की मदद के लिए इनके पास वक्त नही है लेकिन धर्म के नाम पर दंगा फसाद करने के लिए वक्त की कमी भी नही है इन्हें हर हाल में मंदिर मस्जिद भी चाहिए वर्ना ये खुद बना लेंगे इन्हें हर हाल में नौकरी भी चाहिए वर्ना ये ट्रेन के आगे कूद मरेंगे.


मैं इन नौजवानों से कहना चाहता हूं कि तुमने पैदा होकर अपनी माँ की पवित्र कोख को भी कलंकित कर दिया है धिक्कार है तुम जैसेे युवाओं के युवा होने पर....

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