रावण और शैतान /नायक या खलनायक ? - तर्कशील भारत

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Thursday, October 4, 2018

रावण और शैतान /नायक या खलनायक ?


जब से सभ्यता की शुरुआत हुई है तभी से इंसान ने नैतिकता और सदाचार की अवधारणा को गढ़ना शुरू किया शुरुआती समाज मे संसाधन कम थे उन्हें इकट्ठा करना मुश्किल काम था कुछ लोग मेहनत करके संसाधन जुटाते थे तो उस समाज मे कुछ ऐसे भी लोग थे जो बिना मेहनत के दूसरों के संसाधनों को चुरा लेते थे ऐसे में चोर और चोरी अनैतिक माना जाने लगा.

समय के साथ सभ्यताए और बढ़ीं उन्नत हुईं तो लोगों को व्यवस्थित रखने के लिए और भी नियमों की जरूरत पड़ी जो इन नियमों के साथ था वो नैतिक दृष्टिकोण से सही था और जो इन सामाजिक नियमों के खिलाफ काम करता था वो अनैतिक था.

जैसे जैसे सभ्यताएं बढ़ती गई सामाजिक नियम भी बढ़ते गए और इन सामाजिक नियमों को तोड़ने वाले लोग भी बढ़ते गए ऐसे लोगों को दंड के अलावा और कोई डर नही था इसलिए ये अराजक तत्व समाज के लिए घातक थे.

इसके बाद के दौर में सभ्यताओं ने सामाजिक नियमों को धार्मिक रूप देना शुरू किया जो सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध आचरण करेगा उसे यहां तो दंड मिलेगा ही मरने के बाद भी वो अपने किये गए कुकर्मों के दंड से बच नही पायेगा.

सभ्यताओं के विकास के अगले चरण में समाज को व्यवस्थित करने के लिए सामाजिक नियमों को और कठोर किया गया साथ ही स्वर्ग नरक अच्छाई बुराई ईश्वर भगवान और इनसे जुड़ी हजारों डराने वाली कहानियों को गढ़ा गया ताकि अनैतिक लोगों को डराया जा सके इसी दौर में नैतिकता परिभाषित हुई और अच्छाई और बुराई की अवधारणा धर्म का हिस्सा बन गई.

इस धार्मिक प्रबंध से अनैतिकता अपराध और बुराई तो कम हुई नही बल्कि कई धार्मिक गिरोह पैदा हो गए जो धर्म और ईश्वर के नाम पर अच्छाई और बुराई को परिभाषित करने लग गए.

अच्छाई और बुराई के नए धार्मिक मापदंड विकसित हुए सामाजिक व्यवस्था ईश्वर और धर्म पर आश्रित हो गईं न्याय की परिभाषा बदल गई ऐसे दौर में अच्छाई और बुराई के नये नये किरदार गढ़ लिये गये.

समय के अंतराल में धर्म की कहानियों में सैंकड़ों नये किरदार और शामिल हुए इन किरदारों में कुछ अच्छाई के प्रतीक मान लिए गए और कुछ बुराई के प्रतीक बना दिये गये इसके पीछे असली मकसद समाज को व्यवस्थित करना नही था बल्कि जनता को नैतिकता और अच्छाई के नाम पर इन धार्मिक गिरोहों का मानसिक गुलाम बनाने के मकसद से इन किरदारों को समाज मे स्थापित किया गया इन्ही किरदारों में दो ऐसे किरदार हैं जिन्हें आज भी बुराई का प्रतीक माना जाता है वैसे तो दोनों ही किरदार पूरी तरह काल्पनिक है फिर भी इन्हें इतना नीच और बुरा साबित किया गया है कि जान कर हैरानी होती है.

आज के वैज्ञानिक युग मे धार्मिक गिरोहों द्वारा लोगों की मानसिकता में स्थापित अच्छाई और बुराई के इन धार्मिक प्रतीकों की पड़ताल जरूरी है ताकि हम समझ सके कि धर्म के नाम पर तमाम धार्मिक गिरोहों ने किस तरह सही को गलत और गलत को सही साबित किया है और इन प्रतीकों द्वारा किस तरह शदब्दियों तक समाज को गुमराह किया है और आज भी कर रहे हैं.

ईसाई यहूदी और मुसलमानों के ईश्वरीय धर्म के मौलिक सिद्धांत लगभग एक जैसे हैं इसीलिए इनकी ज्यादातर धार्मिक कहानियां भी एक जैसी ही हैं जिसमे ईश्वर को अच्छाइयों का प्रतीक और शैतान को बुराइयों का प्रतीक बताया गया है.

हम जिन दो धार्मिक विलेन की बात करेंगे उनमे से एक है शैतान जो यहूदी इस्लाम और ईसायत के नजरिये से बुराइयों का प्रतीक है और इसी लिए तीनों धर्मों में इस किरदार को बहुत ही नीच दुष्ट और बुरा माना जाता है मुसलमान तो हर साल हज के दौरान इसे पत्थर मारते हैं.

तो चलिए जानते है शैतान कौन था और वो क्यों क्यों बुरा था ?

शैतान की कहानी तब शुरू होती है जब खाली बैठे किसी खुदा ने आग से शैतान को बनाया और उसे अपनी इबादत का हुक्म दे दिया शैतान करोड़ों वर्षों तक खुदा की आज्ञा का पालन करते हुए खुदा की चापलूसी में लीन रहा समस्या तब पैदा हुई जब खुदा ने स्वर्ग बनाया और उस स्वर्ग में रहने के लिए मिट्टी से एडम को बनाया फिर एडम की दाईं पसली से एक औरत को बनाया जिसे ईव का नाम दे दिया दोनों के हवाले जन्नत सौंप दिया और उन्हें समझाया कि जन्नत की सभी चीजों का लुत्फ उठाओ लेकिन कभी भी इस पेड़ के नजदीक मत जाना न ही उसका फल खाना इसके बाद खुदा ने शैतान को बुलाकर उससे एडम के आगे सिर झुकाने को कहा यहां शैतान की मर चुकी अंतरात्मा जाग उठी उसने तर्क किया कि वो आग से बनाया गया है और एडम से पहले करोड़ों वर्षो तक वह खुदा की चापलूसी भी करता रहा है ऐसे में वो मिट्टी से बने एक साधारण आदमी के आगे क्यों झुकेगा ?

उसकी बुद्धि ने एडम के आगे सर झुकाने से इनकार कर दिया ईश्वर ने इसे अपना अपमान समझा और इसी घटना के बाद दोनों गुरु चेले एक दूसरे के विरोधी हो गए कुछ समय बाद शैतान ने एडम और ईव को बरगलाना शुरू कर दिया और उन दोनों ने शैतान के कहने पर जन्नत का वो प्रतिबंधित फल खा लिया जिससे खुदा ने दूर रहने की हिदायत दी थी.

इस तरह वे दोनों खुदा के गुस्से का शिकार हो गए और उन्हें जन्नत से निकाल कर पृथ्वी नामक ग्रह पर भेज दिया गया.

ये शैतान की कहानी आप खुद निर्णय कीजिये कि कौन गलत है ?

शैतान ने खुदा की बात मानकर करोड़ों साल उसकी गुलामी की बदले में उसे अपमान के सिवा क्या मिला ? उसने एडम को झूठ बोला जिससे उसे पृथ्वी पर आना पड़ा क्या सिर्फ इसलिए वो बुरा हो गया ?

तब खुदा बुरा क्यों नही जिसने शैतान को धोखा दिया उसे फरिश्तों में श्रेष्ठ बनाया था तो वो क्यों मिट्टी से बने किसी के आगे नतमस्तक होता ?

अभी हाल ही में हज करने गये हाजियों की मौत इसी शैतान को मारते समय हुई थी दुनिया भर के मुस्लमान मिलकर हर साल इसी शैतान को मारने के लिए जाते हैं.

सूरा बकर आयत 35 में अल्लाह कहता है "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी जन्नत में रहो और वहाँ जी भर बेरोक-टोक जहाँ से तुम दोनों का जी चाहे खाओ, लेकिन इस वृक्ष के पास न जाना, अन्यथा तुम ज़ालिम साबित हो जाओगे.

अन्ततः शैतान ने उन्हें वहाँ से बहका दिया, फिर उन दोनों को जन्नत से निकलवा कर छोड़ा.

अल्लाह ने जो काम करने को माना किया था उसी काम को शैतान ने आदम से करवा दिया
अब सवाल यह है की क्या शैतान अल्लाह से ज्यादा शक्तिशाली था ? और क्या खुदा को इस बात का ज्ञान नही था कि शैतान उसके द्वारा बनाये गए एडम को बरगलाने में कामयाब हो जाएगा ? जिस समय शैतान एडम से उस फल को खाने के लिए उकसा रहा था उस वक्त अल्लाह कहाँ था ? यहाँ भी दो प्रश्न है की अल्लाह वहां नही था तो अल्लाह सर्वव्याप नही हो सकता ? और अगर वह शैतान के इस धोके से अनजान था तो वो सर्वज्ञ भी नही हो सकता. 

क्या अल्लाह नही जानता था की शैतान आदम से उसी काम को करवाएगा जिस काम को करने के लिए उसने मना किया है ?

जब एडम और उसकी महिला मित्र ने उस फल को खा लिया तो उनकी गुप्तांग एक-दूसरे के सामने खुल गईं और वे अपने ऊपर बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर रखने लगे तब उनके रब ने उनसे कहा.

"मैंने तुम दोनों को इस वृक्ष से रोका था और तुमसे कहा था कि शैतान तुम्हारा खुला शत्रु है"

अगर शैतान उनका खुला शत्रु था तो वो उसे शत्रु बनने पर मजबूर भी तो खुदा ने ही किया था.

और वह बृक्ष कौनसा है जिसके खाते ही वे एक दुसरे को नंगा देखने लगे ? 

शैतान ऐसा करेगा क्या यह पहले से तय था ? अगर पहले से सबकुछ तय था तो इसमें शैतान का क्या दोष ? फिर हर साल उसे पत्थर क्यों मारा जाता है ?

मेरी नजर में शैतान का कुसूर बस इतना था कि उसने तर्क किया इसके अलावा उसका कोई दोष नही बल्कि उसने जो भी किया उसका असली जिम्मेदार तो अल्लाह ही साबित होता है.

चलिए अब बात करते हैं दूसरे किरदार की जो भारतीय मिथकों में सबसे बड़ा खलनायक माना जाता है इसे सभी बुराइयों का प्रतीक बताया गया है इसलिए इस किरदार को हर साल जला कर बुराई पर अच्छाई की जीत की घोषणा कर दी जाती है.

जी हां मैं बात कर रहा हूँ रावण की
रावण एक ऐसा चरित्र है जिसे आज तक भुलाया नहीं जा सका या यूँ कहे की जानबूझकर उसे हमारे अन्तःकरण में बिठाया जाता रहा है.

सबसे पहले जानते हैं कि रावण कौन था और उसकी गलती क्या थी ?

माना जाता है कि रावण विश्वश्रवा का पुत्र था लेकिन ये बात पूरी तरह सही नही है हम रावण के बारे में जितना भी जानते है वो सब बातें वाल्मिकी और तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों पर आधारित है लेकिन देश भर में इन दो रामायणों के अलावा करीब 56 प्रकार के ग्रंथ और हैं जिनमे रावण के चरित्र की बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाई देती है.

रावण किसी विश्वश्रवा की संतान नहीं था बल्कि श्रमण संस्कृति के गुरु अंगनाथ का पुत्र था अन्ग्नाथ का विवाह कुबेर की पुत्री कैकसी से हुआ था जिससे इनकी तीन संतानें उत्पन्न हुई थी.

रावण कुम्भकरण और सूर्पनखा.

अन्ग्नाथ की मृत्यु या हत्या विष द्वारा हुई थी जिसके पीछे कुबेर की सत्ता हथियाने का षड्यंत्र काम कर रहा था.

अंगनाथ की मृत्यूप्रांत कुबेर ने विश्वश्रवा से अपनी पुत्री का विवाह करवा दिया क्यूंकि इसी ने कैकसी से अपनी शादी का प्रयोजन कुबेर से किया था.

कुबेर के मना करने पर उसने भरी सभा में कुबेर को शाप दिया था की मेरे आलावा यदि तेरी पुत्री का विवाह कहीं और हुआ तो वो विधवा हो जाएगी.

लेकिन महाराज कुबेर इनके झांसे में नहीं आया और उसने अंगनाथ को अपनी पुत्री अर्पित कर दी.

अपने अपमान और भरी सभा में शाप के नाम पर डींग मारने को सही साबित करने के लिए उसने 5 वर्ष तक उचित समय की प्रतीक्षा की और एक दिन धोखे से जहर देकर अंगनाथ की हत्या करवा दी और बात फैला दी की श्राप के फलस्वरूप सांप ने काट लिया.

इसके बाद तीन बच्चों की माता कैकसी का विवाह कुबेर ने विश्वश्रवा से कर दिया.

विवाह के कुछ वर्षों बाद ही विभीषण का जन्म हुआ जिसकी माता कैकसी थी और पिता विश्वश्रवा थे लेकिन बाद में चारों बच्चों के पिता विश्वश्रवा मान लिए गये.

विभीषण और रावण के चरित्र की भारी विषमताएं भी साबित करती है की दोनों सगे भाई नहीं हो सकते थे...

दोनों के रूप और चरित्र में भारी अंतर था.

सगा भाई कुम्भकरण अपनी बहन के अपमान का बदला लेने वाले भाई रावण की ओर से लड़कर रणभूमि में शहीद हो गया. 

और सौतेले भाई विभीषण ने दुश्मनों से मिलकर भाई को मरवा दिया.

क्या कोई सगा भाई अपनी बहन के नाक कान काटने वालो का साथ दे सकता है ?

रावण का दोष क्या था ?

सीता का अपहरण....

यदि इसी एक दोष के कारण वो इतना बड़ा खलनायक हो सकता है......?

....तो फिर कृष्ण क्यूँ नहीं जिसने रुकमनी का अपहरण किया था ?

अर्जुन क्यूँ नहीं जिसने सुभद्रा का अपहरण किया था ?

और भीष्म क्यूँ नहीं जिसने काशिराज की तीन तीन पुत्रियो का अपहरण किया था ?

रावण ने अपनी बहन के अपमान के बदले के रूप में सीता का अपहरण किया था जो कि स्वाभाविक था.

फिर रावण बुरा क्यूँ ?

क्या वो क्रोधी था इसलिए बुरा हो गया ?

किसी की बहन के कोई नाक और कान काट दे ऐसे में उसका भाई क्रोद्ध नहीं करेगा तो क्या करेगा ?

क्या रावण का क्रोद्ध अस्वाभाविक माना जाये ? क्या उसे क्रोद्ध न कर के आत्मसमर्पण कर देना चाहिए था ? 

यदि क्रोद्ध किसी की निंदा का कारण है तो फिर दुर्वाषा की निंदा क्यूँ नहीं ?

उन्हें क्यूँ नहीं जलाया जाता हर साल ?

दुर्वासा के विषय में कालिदास अपने "अभिज्ञानशाकुंतलम" (अंक -4) में लिखते है...

"सुलभकोपो-महर्षि" जिसका अर्थ है ::~ बात बात पर क्रोधित होने वाला ऋषि 

बात बात पर लक्ष्मण भी क्रोधित हो जाया करते थे.

जब ये घोर क्रोधी चरित्र निंदनीय नहीं तो फिर रावण ही बुरा क्यूँ ?

क्या वो घमंडी था इसलिए बुरा था ? घमंडी होने से यदि कोई इतना निंदा का पात्र हो सकता है तो फिर परशुराम निंदनीय क्यों नहीं ? रावण ही बुरा क्यूँ ?

हम बताते है....

रावण एक न्यायप्रिय और समानतावादी सिद्धांतो का पालन करने वाला जनप्रिय राजा था.

कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं होने के बावजूद भी प्राचीन श्रमण संस्कृति के साहित्यिक कथानकों में महाराजा रावण की उपस्थिति  और प्राचीन काल से जनमानस के अंतःकरण में बैठी महाराजाधिराज रावण की छवि ऐसी नही है कि उन्हें हर साल बुराइयों का प्रतीक बता कर जलाया जाये.

अगर थोड़ा सा विवेक का इस्तेमाल करें तो दोनों किरदारों में ऐसा कुछ नही है जिससे ये इतने बड़े खलनायक साबित होते हो कि हर साल उन्हें पत्थरों से मारा जाए या आग से जलाया जाए ये मानवता नही है क्योंकि नैतिकता और न्याय के दृष्टिकोण से दोनों ही चरित्र निर्दोष साबित होते हैं.

धार्मिक गिरोह इस तरह के काल्पनिक चरित्रों का निर्माण कर धर्म की अंधी जनता को विवेकहीनता के सबसे निचले पायदान पर धकेलने की कोशिश करते है ताकि जनता कभी समझदारी की उस लक्ष्मणरेखा को पार न करे जहां से धार्मिक गिरोहों का पाखंड खत्म हो जाता है और बुद्धिवाद शुरू होता है.

ऐसा हो गया तो समझो सभी धार्मिक गिरोह खत्म हो जाएंगे तब दुनिया मे न्याय समानता और मानवता की वास्तविक परिकल्पना का शुभारंभ हो जाएगा.

इसलिए हमें हर हाल में धार्मिक गिरोहों के इस दुष्चक्र को समझना होगा ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को धर्म के इस भ्रमजाल से बचा सकें.

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