सभ्य इन्सानों से बेहतर है जंगली जानवर - तर्कशील भारत

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Wednesday, October 24, 2018

सभ्य इन्सानों से बेहतर है जंगली जानवर

सभ्य इन्सानों से बेहतर है जंगली जानवर


जंगली जानवर से 
सामाजिक मनुष्य बनने की 
लंबी प्रक्रिया 
कब पूरी हुई 
मुझे पता ही नही चला.

अब मैं पूरी तरह 
सभ्य हो चुका हूँ
हाँ पूरी तरह.

क्योंकि 
मैं जंगल छोड़ चुका हूँ
अब मैं जंगली जानवर नही
इंसान बन चुका हूँ

मुझमें क्रूरता नही
संवेदनाये हैं
वहशियत नही
आशाएं हैं
नाउम्मीदी की जगह
अब उम्मीदे है
नफरत नही
सबक लिए प्रेम है 
क्योंकि
अब मैं जंगली नही
जंगल को छोड़ चुका हूँ
अब मैं हैवान नही
सामाजिक इंसान बन चुका हूं
अब मैं पूरी तरह
सभ्य हो चुका हूँ 
हाँ पूरी तरह.

मुझे सही और गलत का
फर्क मालूम है
क्योंकि
मेरे पास धर्म है
समझ है
विज्ञान है
लोकतंत्र है
सहयोग और बराबरी है
अब मैं पूरी तरह
सभ्य हो चुका हूँ 
हाँ पूरी तरह.

लेकिन
मैं जहां से निकल भागा
उस
जंगल में चारों ओर
आज भी
भयंकर अफरातफरी है
वहां 
असमानता और 
अन्याय के सिवा
कुछ भी तो नही.

उस जंगल में चारों ओर 
आज भी
भयंकर मारामारी है
वहां 
अराजकता और 
आतंक के सिवा 
कुछ भी तो नही.

वहां 
जानवरों के बीच
आज भी
गैरबराबरी की गहरी खाइयां हैं
अवहेलना और रुसवाईयाँ हैं
अकेलापन और तनहाइयाँ हैं
डराने वाली भयंकर परछाइयां हैं.

भोजन सृंखला में
कोई सबसे बड़ा है
तो कोई
सबसे निचले पायदान पर 
खड़ा है.

कोई नोच खाने को 
तैयार बैठा है
कोई सबकुछ 
खोकर बेकार बैठा है.

जंगल में 
कुछ मांसाहारी हैं
तो कुछ शाकाहारी हैं
कुछ शिकार है 
तो कुछ शिकारी हैं.

मैं जिस जंगल को 
छोड़ आया
उस जंगल मे 
आज भी
हर रोज
मौत का खेल चलता है
कोई मारता है कोई मरता है
कोई चीरता है कोई चरता है

जंगल का बस 
एक ही नियम है
जिंदा रहना है तो 
मरो या मारो
लड़ो या भागो
जो सहेगा वो मरेगा
जो जीतेगा वही जियेगा.

कमजोर के लिए 
जंगल मे कोई संवेदना नही
सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट 
बस यही जंगल का मूलमंत्र है
क्योंकि यहां लोकतंत्र नही
लूटतंत्र है
यहां धर्म नही 
अधर्म है
क्योंकि ये जंगल है 
यहां सिर्फ जानवर रहते हैं
पशु रहते है
हैवान रहते हैं
जो असभ्य हैं.

अच्छा हुआ 
कि मैंने
जंगलीपन का बंधन 
तोड़ दिया
सदा के लिये
जंगल छोड़ दिया 

अब मैं जंगल में नही
समाज मे रहता हूँ
इसलिये पूरी तरह
सभ्य हो चुका हूं
हाँ पूरी तरह

आज मैं
जानवर नही
पशु नही
हैवान नही
इंसान बन चुका हूँ

लेकिन 
शायद ये मेरा भ्रम है
एक झूठ है 
एक पाखंड है
इस पाखण्ड को
मुझ जैसे
इंसानों ने ही गढ़ा है

क्योंकि 
जंगल से निकले
मुझ जैसे इंसानों ने
जिस समाज का निर्माण किया है
वो समाज नही
इंसानों का झुंड है 
जिसे मैंने समाज मान लिया

यहां भी वही नियम हैं
जो जंगल मे चलते हैं
इंसानों के इस सामाजिक जंगल मे
जंगल से भी बुरी स्थिति है

जंगल मे 
भारी अराजकता है
लेकिन कोई जानवर
सुसाइड नही करता
कोई जानवर
भूख से नही मरता
कोई पेट के लिए
तन नही बेचता

जानवरो में 
संवेदनाएं नही होती शायद
लेकिन
कभी कोई जानवर
अपनी प्रजाति के जीवों की 
हत्याएं नही करता

किसी भी एक प्रजाति के 
सभी जानवर अपने दायरे में बराबर की औकात रखते हैं
कोई भेदभाव नही
जंगल मे जो हासिल होगा
सबको मिलेगा
बराबर

इंसानी समाज मे
न्याय सबके लिए नही है
गैरबराबरी जंगल मे नही
इंसानों में है
जंगल मे
सब बराबर हैं
सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट का नियम
सबके लिए है

जंगल मे 
एक को जीने के लिए 
दूसरे को मारना पड़ता है
वहां शेर के बच्चे को भी
जीने के लिए 
संघर्ष करना पड़ता है
क्योंकि शेर अपने बच्चों के भविष्य के लिए
हिरण की लाशों को
अपनी संतानों के भविष्य के लिए
इकट्ठा नही करता

इस मामले में हम इंसान
जानवरों से बहुत पीछे हैं

इंसानो के बनाये सभ्य समाज मे
सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट की थ्योरी सबके लिए नही है

यहां जीने के लिए
दूसरों को लूटना पड़ता है
छीनना पड़ता है
सताना पड़ता है
इसे हम व्यापार कहते हैं

अपने बच्चे के भविष्य के लिए
शोषण का आधार खड़ा करना पड़ता है जिसे हम बाजार कहते हैं

जंगल मे 
नर और मादा बराबर हैं
दोनों की अपनी अपनी जिम्मेदारियां हैं जरूरतें है
नर कभी नारी का शोषण नही करता बल्कि 
जंगल मे 
नारी सृजन करती है
जंगल को बनाती है
वृद्धि करती है संवारती है
इसलिए 
जंगल नारी प्रधान होते हैं

लेकिन इंसानी समाज मे
नर और नारी की स्थितियां बिल्कुल अलग हैं
इंसानों के समाज मे
पुरुष सर्वोपरि है
नारी की स्थिति 
चिंताजनक है
बुरी है
और दयनीय है
हालांकि
यहां भी वो
सृजन करती है
संवारती है
बनाती है
वृद्धि करती है
लेकिन
फिर भी
वो अपवित्र है 
उसे कई अग्निपरिक्षाओं से गुजरना होता है
ईसके बावजूद
उसकी औकात
कुछ भी नही

वो रौंदी जाती है
भरे बाजार 
नंगी की जाती है
उसके जिस्म की 
मंडी लगती है
जंहा उसे 
नोंचा जाता है 
बेचा जाता है

जंगल मे 
बलात्कार नही होते
लेकिन इंसानी समाज मे 
बालात्कार 
एक पुरुषवादी परंपरा का
अभिन्न हिस्सा है

जंगल मे 
कोई धर्म नही है
बस एक ही नियम है
जीवन के लिये संघर्ष
और इस कठोर नियम से 
जंगल का कोई जानवर
अछूता नही
शेर हो भेड़ हो
हिरण हो या हाथी
सब इस नियम से बंधे हैं
किसी को कोई छूट नही
जीने के लिए कठोर संघर्ष
यही जंगल की सच्चाई है

इंसानी समाज में
जीवन के लिए संघर्ष तो है 
लेकिन ये नियम 
सबके लिए नही है
कुछ लोगो को
जीने के लिए संघर्ष नही
षड्यंत्र करने पड़ते हैं
बाकी लोगों को
जीने के लिए
कठोर संघर्ष करने पड़ते हैं.

संघर्षशील लोग 
पीढ़ी दर पीढ़ी
केवल संघर्ष करते हैं
षड्यंत्रकारी लोग 
पीढ़ी दर पीढ़ी
केवल षड्यंत्र करते हैं

इस षड्यंत्र से
वे संसाधनों को हड़पते हैं
सत्ता और धर्म द्वारा
समाज के नियम तय करते हैं
ये धार्मिक नियम 
सिर्फ उनके फायदे के लिए 
होते हैं
इन धार्मिक नियमों को
संघर्षशील लोगों के जीवन का
अभिन्न हिस्सा बना दिया जाता है
जिसे वे ताउम्र ढोते रहते है

यही मेरा समाज है
जिस पर मुट्ठी भर 
षड्यंत्रकारी
इंसानों का राज है

यहां सिर्फ 
इंसानों द्वारा 
इंसानों का दमन है
इंसानों द्वारा इंसानों का
शोषण है 
इंसानों द्वारा इंसानों पर
अत्याचार है
और इंसानों द्वारा इंसानों पर
शाशन है

मैं ऐसे इंसानी समाज में रहता हूँ 

जहां संघर्ष के साथ
भयंकर शोषण है
प्रतिस्पर्धा के साथ
भयंकर लूट है
अवसर के साथ
पैरों में बेड़ियां हैं
संस्कारों के साथ
हर आदमी भ्रष्ट है
आज़ादी के नाम पर
अनेकों घेरबंदियाँ हैं
इंसानियत के नाम पर
जातियों के बेड़े हैं
धर्म के नाम पर
सिर्फ और सिर्फ
पाखंड है.

सभ्यता के नाम पर 
चारों ओर 
बस चीख पुकार है
शांति के नाम पर
हर तरफ अत्याचार है
भय भूख और भ्रस्टाचार है
धर्म के नाम 
जहालत का व्यापार है

इससे तो जंगल ही बेहतर है
जहां संघर्ष तो है
लेकिन शोषण नही
डर तो है 
लेकिन भय नही
भूख है
लेकिन भूख से 
कोई मरता नही
धर्म के नाम पर
कोई किसी से लड़ता नही

मैंने
जंगलीपन का बंधन 
तोड़ दिया
सदा के लिये
जंगल छोड़ दिया 

अब मैं जंगल में नही
समाज मे रहता हूँ
लेकिन मुझे ऐसे समाज पर
कोई गर्व नही
इंसानो के बनाये इस
सभ्य समाज से अच्छा तो
असभ्य जानवरों का
अव्यवस्थित जंगल ही है
जो हमारे समाज से
कहीं ज्यादा बेहतर है

इंसानों के बनाये
इस सभ्यता का हिस्सा होने पर
मुझे अब कोई फख्र नही
बल्कि शर्मिंदा हूँ
की मैं ऐसे समाज मे जिंदा हूँ
जहां संवेदनाएं मर चुकी है
इसलिये मैं 
ये दावे से नही कह सकता 
की मैं सभ्य हो चुका हूँ
बल्कि सच्चाई तो यह है 
की अभी भी
इंसान बनने की प्रक्रिया में हूँ....

जिस दिन
इंसानों का यह सभ्य समाज
असभ्य जानवरों के 
जंगली आवारा झुंडों से 
बेहतर हो जाएगा
उस दिन मैं भी खुद को
पूर्णतः इंसान मान लूंगा.

शकील प्रेम..

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