ये समाज नहीं इन्सानों का झुंड है.... - तर्कशील भारत

Header Ads Widget

Wednesday, October 31, 2018

ये समाज नहीं इन्सानों का झुंड है....

हर जीव की एक स्मरण शक्ति होती है

 मछली अगर एक बार इंसान के फेंके चारे से बच जाती है तो दुबारा उस कांटे में कभी नही फंसती क्योंकि वो उस घातक कांटे को अपने अंतर्मन में बिठा लेती है अगर आप किसी कुत्ते को चोट पहुंचाएंगे तो वो कुत्ता दुबारा आपके पास नही आएगा इसी तरह एक कहा....वत है कि दूध की जली बिल्ली छाछ को फूंक फूंक कर पीती है.


जानवरों में स्मरण शक्ति के साथ सामाजिक चेतना भी होती है एक बंदर को संकट में देखकर कई बन्दर उसकी सहायता के लिए आगे आ जाते हैं जानवरों में संवेदनाएँ भी होती हैं कई बार पशुओं को दूसरे पशुओं की सुरक्षा करते देखा भी जाता है

 इंसान की बात करें तो वो आज इन सभी जीवों में सबसे श्रेष्ठ इसीलिए बन पाया क्योंकि उसकी स्मरण शक्ति सभी जानवरों में सर्वोत्तम है इसी वजह से उसमे दूसरे जीवों की अपेक्षा सामाजिक चेतना का अधिक विकास हुआ और इंसानों में संवेदनाये पशुओं की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित हुई और इसी वजह से उसने विकास की जटिल प्रक्रिया से गुजरते हुए सभी जीवों में प्रमुखता हासिल की है.

लेकिन आज की परिस्थिति में इंसान जानवरों से भी निचले पायदान पर दिखाई देने लगा है  उसमें सामाजिक चेतनाओं का अभाव दिखाई दे रहा है उसकी संवेदनाएँ खत्म होती जा रही हैं और उसकी स्मरण शक्ति इतनी कमजोर हो चुकी है की वो कल हुई आपदा को भूल जाता है और अगले ही दिन फिर से उस आपदा का शिकार हो जाता है अभी हाल ही में आपने देखा कि अमृतसर में 120 लोग एक धार्मिक प्रयोजन देखने के दौरान भयंकर ट्रेन हादसे का शिकार होकर मारे गये.

इसमें दोष किसका है ? क्या इसमे सरकार का दोष है ? क्या सारा दोष ट्रेन का है ? आखिर इतने लोग मरे लेकिन अब तक दोषी कोई नही ऐसा क्यों ?

असल मे यहां दोष उन धार्मिक गिरोहों का है जो धर्म के नाम पर समाज को झुंड बनाने पर तुले हैं और यही कारण है कि हम अपने चारों ओर सिर्फ और सिर्फ भीड़ देख रहे हैं हम अभी समाज नही बन पाए बल्कि केवल इंसानों का झुंड बन कर रह गये हैं जिसे अलग अलग धार्मिक गिरोह धर्म के डंडे से हांक रहे हैं.
इस भीड़ में सामाजिक चेतना नही होती संवेदनाएँ नही होती और इस 
भीड़ में स्मरण शक्ति नही होती.

इसी वजह से समय समय पर इस भीड़ तंत्र का वीभत्स स्वरूप देखने को मिलता है सड़क पर कन्हैया नाम के आदमी का एक्सीडेंट हो गया उसके साथ उसकी बीबी और उसकी लड़की थी सड़क के बीचों बीच मदद के लिए ये परिवार कई घंटों तक तड़पता रहा और वहां से हजारों गाड़ियां गुजरती रही लेकिन लोगों के पास इतना भी वक्त नही था कि वे उस परिवार की मदद करते आखिरकार दो घंटे तड़पने के बाद कन्हैया की बीबी और उनकी बच्ची की मौत हो गई इस दौरान एक आदमी भी सामने नही आया जो इस परिवार की मदद करता क्योंकि किसी के पास वक्त नही था सब बिजी थे अपनी रोजी रोटी में अपने बीबी और बच्चों के लिए सभी सड़कों पर दौड़ रहे थे. इसी दौड़ में कन्हैया का परिवार भी शामिल था लेकिन वो इस अंधी दौड़ में कुचला गया क्योंकि यहां सिर्फ भीड़ थी जिसमे कोई सामाजिक चेतना नही होती कोई संवेदना नही होती और भीड़ में स्मरण शक्ति का भी अभाव होता है.


दूसरी घटना में उड़ीसा के एक गांव में बारह साल की संतोषी कुमारी भूख से तड़प तड़प कर मर गई क्योंकि कोई रोजगार न होने के कारण उसका परिवार पूरी तरह सरकारी राशन पर आश्रित था लेकिन आधार लिंक न होने के कारण उसे राशन नही दिया गया वो स्कूल के मिड में मील से अपनी भूख मिटा सकती थी लेकिन दुर्गा पूजा के दौरान सरकारी स्कूल बंद थे और पूरा गांव दुर्गा पूजा में व्यस्त था किसी को उस गरीब के भूख से मतलब नही था वो भात भात कहती रही लेकिन उसे भात तो क्या किसी ने सुखी रोटी का एक टुकड़ा भी नही दिया लोगों की मानसिकता देखिये की जब मामला मीडिया तक पहुंचा तो गांव के लोगों ने संतोषी की माँ को गांव से निकाल दिया क्योंकि संतोषी के भूख से मरने से उनके गांव का नाम खराब हो रहा था ऐसा करने वाले भी भीड़ का हिस्सा थे और भीड़ में सामाजिक चेतना नही होती संवेदनाये नही होती और उसकी 
स्मरण शक्ति भी कमजोर होती है.

ये घटनाये तो मात्र एक उदाहरण है रोज ऐसे न जाने कितने कन्हैया और कितने ही संतोषी भीड़ की संवेदनहीनता का शिकार होते हैं.

क्योंकि हम जिसे समाज कहते हैं वो सिर्फ भीड़ है जो धर्म और जातियों के बाड़े में कैद है और इन अलग अलग बाड़ों में केवल झुंड रहता है हम जैसे इंसानों का झुंड जिसकी मानसिकता धार्मिक गिरोहों के नियंत्रण में होती है और ये सभी धार्मिक गिरोह मिलकर कभी भी इस झुंड को समाज नही बनने देना चाहते.

जड़ हो चुकी चेतनाओं मर चुकी संवेदनाओं और बिखर चुकी स्मरण शक्ति वाले इंसानों के झुंड के पास समय बिल्कुल नही है वो व्यस्त है बहुत ज्यादा बिजी है उसके पास किसी भूख से तड़पते बच्चे को देखने भर का भी समय नही है लेकिन उसकी ये व्यस्तता किसी असहाय की मदद करने के समय तक ही सीमित है वर्ना तीर्थ यात्राओं में वो कई दिनों तक अपना कीमती वक्त बर्बाद कर सकता है हज के नाम पर वो बिल्कुल फ्री है जमात में जाने के लिए उसके पास भरपूर टाइम है.


इंसानों के इस झुंड की याददाश्त बहुत कमजोर है उसे याद नही विस्थापन का वो भयंकर मंजर जहां धर्म के नाम पर खून की नदियां बहा दी गई थी उसे पिछले साल हज के दौरान कितने मरे थे याद नही विसर्जन के दौरान कितने दुबे याद नही होली के हुडंग में कितने मरे याद नही  केदारनाथ की घटना को वो भूल चुका है लेकिन ठहरिए याददाश्त इतनी भी कमजोर कहाँ है जनाब
हजारों साल पहले गणेश जी कब पैदा हुए थे जीसस क्रूस पर कब चढ़े थे और मुहम्मद को नबूवत कब मिली ये हमें अच्छी तरह याद है. 

 1400 सौ साल पहले हमारे नबी ने क्या कहा था हमे याद है हजारों साल पहले की रामलीला तो हम कतई नही भूले.


लेकिन हम आज़ादी के दर्द को भूल चुके है इसलिए फिर से गुलाम हो चुके है हम भूल चुके है पूर्वजों के संघर्ष को उनकी व्यथा को इसलिए अपनी मुश्किलों के लिए हमेशा हमें झूठे चौखटों की तलाश रहती है.

संघर्ष से बच कर शॉर्टकट रास्ता ढूंढना हमे खूब आता है इसलिए हम हमेशा चमत्कार की आस में रहते हैं और हमारी इसी मानसिकता की वजह से हजारों चमत्कारी बाबाओं महात्माओं और मुल्ला मौलवियों की फौज खड़ी हो चुकी है जिन्होंने झूठे भगवानों की महिमा गा गा कर हमें निकम्मा बना दिया है यही वो लोग हैं जो हमें धर्म के नाम पर तोड़ते है झूठी कहानियों के सहारे हमारा शोषण करते हैं और हमारी आस्था विश्वाश और हमारी मासूम भावनाओं पर पाखंडों का आडंबर खड़ा कर धर्म का व्यापार करते हैं और इस तरह हमे लूटते है और हमें सभ्य बनने से रोकते हैं.

इन्ही की वजह से हमारी सामाजिक चेतनाएं विलुप्त हो चुकी है संवेदनाएँ मरहूम हो चुकी हैं और हमारी याददाश्त क्षीण हो चुकी है इसी वजह से हम अभी तक समाज नही बन पाये और इनके द्वारा बनाये गए अलग अलग बाड़ों में कैद हो कर सिर्फ और सिर्फ झुंड बन कर रह गये हैं.

हमारे पास अपने पड़ोसी से मिलने के लिए वक्त नही है लेकिन धर्म के नाम पर हम हजारों किलोमीटर दूर की यात्राएं कर सकते हैं हमारे पास गाड़ी का शीशा खटखटाते मासूम बच्चे को देने के लिए कुछ नही लेकिन हमने धर्मस्थलों के खजाने को भर दिया है हमारे दिल मे बेघर लोगों के लिए कोई जगह नही लेकिन हमने अल्लाह और भगवानों के आलीशान महलों को खड़ा कर दिया है.

भूख से मरने वाली मासूम संतोषी भात भात कह कर मर गई लेकिन वहां कोई नही पहुंचा सब दुर्गा पूजा में व्यस्त रहे.

जागरण पूजा भजन कथा भंडारा संत्संग मिलाद कुरानखानी नमाज जुलूस जलसे और मंदिर मस्जिद में पैर रखने को जगह नही भगवानों की चौखट पर दर्शन को लगती लम्बी कतारें बताती हैं कि लोगों के पास वक्त बहुत है लेकिन चेतनाएं अब बची नही संवेदनाएँ खत्म हो चुकी हैं और याददाश्त भी कमजोर पड़ गई है कुल मिलाकर बात यह है कि इंसान के रूप में हमारे पास अब कोई शर्म बाकी बची नही है हम नन्गे हो चुके हैं पशुओं से भी नीचे गिर चुके हैं.


हमे रसूल की बातें तो याद हैं लेकिन दंगों के दर्द को हम भूल गये हमें एक सीता की पीड़ा तो दिखाई दे जाती है लेकिन तन बेचती करोड़ों मासूम बच्चियों के दर्द को हम नही देख पाते हमें पत्थरों में भगवान दिखाई देते हैं लेकिन अपने आस पास के उदास चेहरे हमे नजर नही आते हम गीता और कुरान की वर्षों पुरानी भाषा को तो पढ़ लेते हैं लेकिन किसी भूख से बेहाल मासूम चेहरे को हम नही पढ़ पाते यही वो समस्याएं है जो हमसे हमारी इंसानियत को छीन लेती हैं और हमे एक झुंड बनने को मजबूर करती हैं.

हमारे आस पास हजारों मासूम बच्चे भीख मांग रहे हैं हजारों बूढ़े लोग बुढ़ापे के भयंकर बोझ को ढो रहे हैं गरीबी के आलम में न जाने कितने परिवार विस्थापित हो रहे हैं बर्बाद हो रहे हैं वहीं कोई परिवार 51 अरब के घर मे भी रहता है कोई नालों और फुटपाथों पर आसरे की तलाश में है कोई दौलत के ढेर पर बैठा है कोई कूड़े के ढेर में रोजी तलाश रहा है किसी के पास बेचने के लिए तन है कोई जमीर बेच रहा है कोई अपने बच्चों को बेच रहा है कोई देश को बेच रहा है.


क्या यही समाज है नही ये समाज नही हो सकता मैं इसे समाज नही कह सकता क्योंकि यहां चेतनाएं टूट चुकी हैं संवेदनाएं बिखर चुकी हैं और स्मृतियां मिटाई जा चुकी हैं इसलिए ये समाज नही सिर्फ और सिर्फ झुंड ही तो है.

इस झुंड में एक के बिगड़ने से दूसरा बनता है एक की संपन्नता के लिए कइयों को विपन्न होना पड़ता है एक कि खुशी यहां दूसरे का गम बन जाती है कोई मर रहा है कोई सड़ रहा है कोई टूट रहा है कोई लूट रहा है ये समाज नही हो सकता बल्कि ये केवल झुंड है मैं इसे सिर्फ और इंसानों का झुंड कहता हूँ.

जहां एक के भूखे रहने पर दूसरा खाना नही खा सकता जहां एक दुखी हो तो दूसरा रोता है जहां एक कि पीड़ा से दूसरे को दर्द होता है एक के घाव से दूसरे को कष्ट होता है मैं उसको समाज कहता हूँ.

लेकिन हमने और हम सबने मिलकर जो समाज बनाया है जिसे हम समाज कहते है और जिस समाज मे रहकर हम खुद के सभ्य होने का ढिंढोरा पीटते हैं वो समाज नही बल्कि भीड़ है केवल भीड़ इंसानों की भीड़ और इंसानों की इस भीड़ में कई अलग अलग झुंड हैं जातियों के झुंड धर्मों के झुंड फिरकों के झुंड नस्ल और गोत्र के झुंड धर्म और संप्रदाय के झुंड गरीबों और अमीरों के झुंड और इन सभी झुंडों में चेतनाएं लापता हैं संवेदनाएँ गुमशुदा हैं और स्मृतियां गायब हैं इसलिए इसे मैं इंसानों का सभ्य समाज नही कह सकता कभी नही हालांकि मैं भी इंसानों के इस अरबों की भीड़ के करोड़ों बाड़ों में रहने वाले लाखों इंसानी झुंडों का हिस्सा हो सकता हूँ.

एक दूसरे के प्रति परस्पर सहयोग विश्वाश और प्रेम पर ही किसी भी समाज की बुनियाद टिकी होती है इनके बिना कोई भी समाज समाज नही बल्कि झुंड ही होता है केवल झुंड और झुंड में चेतना नही होती संवेदनाये नही होती स्मरण शक्ति नही होती.

अगर चेतना होती तो वो अपनी दिशा और दशा में सुधार कर लेता संवेदनाएँ होती तो कोई भीड़ द्वारा नही कुचला जाता और समरण शक्ति होती तो शायद बार बार इंसानियत की धज्जियां नही उड़तीं.

इसलिए मुझे खेद है कि मैं उस झुंड का हिस्सा हूँ जहां चेतनाएं बिखर चुकी हैं संवेदनाये मर चुकी हैं और स्मृतियां समाप्त हो चुकी है.

No comments:

Post a Comment

Pages