पुष्यमित्र की प्रतिक्रांति..... - तर्कशील भारत

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Monday, September 10, 2018

पुष्यमित्र की प्रतिक्रांति.....

189 ईसापु. में पुष्यमित्र (महान बौद्ध सम्राट अशोक के वंशज) अंतिम मौर्य सम्राट वृहदत्त की हत्या कर पाटलिपुत्र की गद्दी पर बैठा ! मौर्य शासन काल (326 ईसापु.से 189 ईसापु.) में पाटलिपुत्र सत्ता का केंद्र था ! 

पुष्यमित्र के पाटलिपुत्र में वृहदत्त की हत्या के पश्चात देश के अलग अलग भागों में छोटी बड़ी कई रियासतों का उदय हो गया जो पहले वृहदत्त के अधीन थे यहाँ के गण प्रमुखों ने स्वयं को केंद्र से अलग कर अपने राज्य को  एक स्वतंत्र राज्य घोसित कर दिया इसमें प्रमुख थे महिसासुर (जिनके नाम पर आज भी मैसूर है) हरदोई के राजा हिरणकश्यप और हिरण्याक्ष राजा भैरो इत्यादि इन शूरवीर बौद्ध राजाओ ने पुष्यमित्र को सम्राट और उसके वैदिक धर्म को मानने से इनकार कर दिया.

पुष्य मित्र के लिए इनसे सीधी टक्कर आत्महत्या के सामान थी तब उसने अपने गुरुओ के मार्गदर्शन में अपने पूर्वजो के महान आदर्शो का पालन करते हुए धोखे षड्यंत्र और घृणा की ऐसी परंपरा का आरम्भ कर दिया जिसके द्वारा उसने और उसकी आने वाली नस्लों ने इस देश से बौद्धधम्म का नामों निशाँ ही मिटा कर रख दिया !

अपने कुकर्मो को अपने कथित अवतारों की आड़ में छुपा कर जनमानस के अंतःकरण में अपनी छवि को विशिष्ट बनाये रखा और विरोधियों की छवि को धूमिल करने का हर संभव जतन भी कर दिया जिसके लिए सैंकड़ो पोथियों की रचना करवाई गई रामायण भी ऐसी ही एक पोथी है !

 विरोधियों का पूरा इतिहास नष्ट कर उसे अपनी पोथियों में अपने समर्थन में अपने अनुसार पुनः लिखवाया गया.

हम जब अपना इतिहास ढूंढते है तो वह इनकी पोथियों में विकृत रूप में मिलता है जिसमे ये अवतार के रूप में लीलाएं करते दीखते है और हम राक्षस दैत्य दानव असुर और शुद्र के रूप में सदा बुरे और पिटते हुए दीखते हैं.

वाल्मीकि रामायण भी ऐसी ही एक पोथी है जिसमे पुष्यमित्र के बाद के किसी काल खंड में उसके किसी वंसज द्वारा (जो अयोध्या का राजा था) बौद्ध सम्राट रावण की षड्यंत्र पूर्वक हत्या की गई इसके साथ महर्षि शम्बूक की हत्या राजा बाली की हत्या आदिवासी माँ ताड़का और उसके पूरे परिवार की हत्यायें भी हुईं और इन हत्याओं का रहस्य अवतारों की लीलाओं में छुपा दिया गया.

इसी प्रकार इनकी सभी पोथियों में या साहित्यिक कबाडों में हमारे इतिहास के टुकड़े भी छुपे हुए है जिन्हें जोड़ कर हम अपने अतीत को देख सकते है उसे महसूस कर सकते है उसे जान सकते है.

डेढ़ सौ साल पहले तक पूरी दुनिया यही मानती थी कि बुद्ध इंडोनेशिया के हैं जबकि भारत के पौराणिक ग्रंथों में बुद्ध विष्णु के अवतार बताये गए थे आज पूरी दुनिया को पता है कि बुद्ध भारत की मूल श्रमण संस्कृति के महानायक हैं.

 इतिहास को खंडित करने की प्रक्रिया में दो काम किये गये पहला काम तो ये किया गया कि पुष्यमित्र की प्रतिक्रांति से पहले के महानायकों को विलेन बनाया गया और इस प्रतिक्रांति के बाद के महानायकों को पौराणिक ग्रंथों में नायक के रूप में चित्रित किया गया.

 जो अपना सही इतिहास नहीं जानता वो कभी इतिहास नहीं बना सकता.

वैसे आप मेरी बातों को सिरे से नकारने के लिए स्वतंत्र हैं.

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