जातिगगत आरक्षण का विरोध क्यों ? - तर्कशील भारत

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Thursday, September 6, 2018

जातिगगत आरक्षण का विरोध क्यों ?


जातिगत आरक्षण का जन्म  जातियव्यवस्था के कारण हुआ इसलिए उसका आधार जातिगत ही होना चाहिए.

समाज में आर्थिक असमानता की खाई परंपरागत रही है आरक्षण इसी को पाटने का एक संवैधानिक प्रावधान है फिर भी यह असमानता की जातिगत संस्कृति को समाप्त करने के लिए पर्याप्त और सक्षम नहीं है. 

इसलिए संविधान ने इसकी अन्य न्यायसंगत व्यवस्था भी की है जिसमे सरकारों द्वारा गरीबी उन्मूलन के अनेकों कार्यक्रम चलाये जाते हैं.

इन कार्यक्रमों का आधार जातिगत नहीं होता बल्कि यह आर्थिक ही होता है.

आरक्षण कुल मिलाकर सेवा , शिक्षा और राजनीती के क्षेत्रों तक सिमित है असंगठित क्षेत्र के असीमित क्षेत्र में कोई आरक्षण नहीं है स्वास्थ सेना और मिडिया में कोई आरक्षण नहीं है.

फिर आरक्षण पर इतना बवाल क्यों ? 

अनुमानतः नौकरियों की कुल संख्या 3 करोड़ से ऊपर नहीं होगी इसमें से 50 प्रतिशत नौकरियां आरक्षित होती है जो 85 प्रतिशत शोषित वर्ग के लिए ऊंट के मुंह में जीरा के सामान हैं.

आरक्षण के आर्थिक पक्ष का समर्थन करने वाले लोग पहले यह बताएं की गरीबी उन्मूलन के हजारों कार्यक्रमों पर पिछले 70 वर्षों में विभिन्न सरकारों द्वारा खर्च किया गया लाखों अरब रुपया पानी की तरह बहाने के बावजूद देश की कितनी गरीबी ख़त्म हुई ? 

और गरीबी का ऐतिहासिक और सामाजिक पक्ष भी सामने रखें.

अर्जुन सेन गुप्ता भारत की भयंकर गरीबी का सांस्कृतिक पहलू सामने रखते हुए कहते हैं "देश की 77 प्रतिशत आबादी सांस्कृतिक रूप से पिछड़ी और गरीब हैं जो सामाजिक भेदभाव का जबरदस्त शिकार हुई है"

आरक्षण के आर्थिक आधार से गरीबी कैसे दूर हो सकती है ? जबकि गरीबी उन्मूलन के विभिन्न योजनाओं पर ही सरकार हर साल 6-7लाख करोड़ खर्च करती है फिर भी गरीबी जस की तस रहती है गरीबी उन्मूलन की ये सारी योजनाएं आर्थिक आधार पर चलती हैं इनमे कोई आरक्षण नही होता.

ऐसी स्थिति में कृपया बताएं कि आर्थिक आधार पर आरक्षण से देश की सांस्कृतिक रूप से पिछड़ी और सामाजिक भेदभाव की शिकार आबादी को क्या लाभ मिलेगा ?

और साथ ही यह भी जरूर बताएं की जातिगत आरक्षण से पिछले 70 वर्षों में देश का कितना नुक्सान हुआ ?

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