आस्था के आगे फेल हुए तर्क और विज्ञान | (कहानी) - तर्कशील भारत

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Thursday, September 6, 2018

आस्था के आगे फेल हुए तर्क और विज्ञान | (कहानी)

तीन दोस्त थे
एक विश्वाशी 
दूसरा तार्किक 
तीसरा वैज्ञानिक
मंजिल से 
केवल 10 किलोमीटर पहले
रेगिस्तान में उनकी
गाड़ी खराब हो गई
रेत के उस समंदर में
चारो ओर
रेत के सिवा कुछ नही था

आस्तिक दोस्त ने कहा
की हमे यही रुक कर
मदद का इंतजार करना चाहिए

तार्किक दोस्त ने कहा
मदद का 
इंतजार करने से अच्छा है
10 किलोमीटर पश्चिम की ओर
पैदल ही चला जाये.

लेकिन 
आस्तिक दोस्त का कहना था
हमे आज यही रुकना चाहिए
कोई न कोई तो मदद के लिए जरूर आएगा.

वैज्ञानिक दोस्त रेगिस्तान में
सफर के लिए तैयार था
उसकी जानकारी के अनुसार
जिस बियाबान में वे फंसे हैं
वहाँ कभी भी कोई नही आएगा.

तार्किक दोस्त
वैज्ञानिक की बात से 
सहमत था
उसने कहा
अगर गलती से दो चार दिन में
कोई आ भी गया
तो वो हमारी क्या और कैसे मदद करेगा ?

उसके इंतजार में 
हम वैसे भी 
इस गर्मी से सुख जाएंगे
भूख से मर जायेंगे.

हमे इस मुसीबत से खुद ही निकलना होगा

वैज्ञानिक दोस्त की सलाह पर
वे पैदल ही आगे बढ़े
कुछ दूर आगे चलने पर
आस्तिक दोस्त की आस्था
जवाब दे गई 
उसे लगा
वे भटक गए है
रास्ता भूल गए है
दिशा से भटक गए है.

तार्किक अपने अनुमान से
बिल्कुल सही था
और
वैज्ञानिक अपने ज्ञान से पूरी तरह आश्वस्त था
की पश्चिम की तरफ 
आगे बढ़ते रहने से
केवल कुछ घंटो में हम
शहर पहुंच जाएंगे.

तीनो को
प्यास भी तेज लगी थी 
कुछ दूर और आगे बढ़ने पर
आस्तिक को
दूर पानी का तालाब 
नजर आया
वो ठहर गया
उसे सामने पानी का स्रोत
साफ साफ दिख रहा था
उसकी आंखें 
इस नजारे को साफ साफ
देख पा रही थी.

वो खुशी से झूम उठा
उसकी इस खुशी से
दोनों दोस्त हैरान थे.

तार्किक दोस्त ने
उसे समझाया
की ये केवल एक भ्रम है
जो मौत के बराबर है
क्योंकि जल की तृष्णा में
हम कितना भी आगे
चले जाएं
पानी तो क्या 
पानी की एक बूंद भी 
नही मिलेगी.
और पानी ढूंढने के चक्कर मे
जिंदगी स्वाहा हो जाएगी.

इसलिए हमें 
पश्चिम की ओर
बढ़ते रहना चाहिए 
न कि 
झूठे तालाब के चक्कर मे
पूरब की ओर
ये मेरा अनुमान है
क्योंकि मैं इस इलाके से 
परिचित हूँ.

वैज्ञानिक ने कहा
की ये जल तृष्णा हमारे
दिमाग की उपज हो सकती है
हमें पानी के उस भ्रम में
नही पढ़ना चाहिए
वो हमारी 
नजरो का धोखा है.

तार्किक इस बात से 
पूरी तरह सहमत था
उसने कहा
मेरी समझ कहती है
इस मरुभूमि में
उत्तर की ओर
कोई जलाशय नही है
इस तरफ
रेत का विशाल समुद्र है
जो यहां से आगे
हजारों किलोमीटर में फैला है
हमे उस ओर 
कुछ नही मिलने वाला.

आस्तिक बोला
तुम नास्तिक हो
तुम्हे वो साक्षात तालाब 
दिखाई नही दे रहा
मैं तुम्हारी बातों में 
नही आने वाला
तुम लोगों को 
सिवा आलोचना के 
कुछ नही आता
तुम लोग 
तो उसे ही नही मानते
जो तुम्हारे सामने 
साफ साफ दिखाई दे रहा है.

तार्किक बोला
हमे पता है 
तुम सच बोल रहे हो
की तुम्हे पानी का 
खूबसूरत तालाब 
दिखाई दे रहा है
लेकिन हमें पता है की 
वहां जाने पर
वो तालाब वहाँ नही मिलेगा
क्योंकि वो वहां है ही नही.

ये केवल तृष्णा है
एक भ्रम है
धोखा है
झूठ है
दिमागी वहम है
इसके सिवा 
वहां कुछ नही है.

आस्तिक ने कहा
केवल 
तुम्हारे अनुमान के आधार पर
मैं ये कैसे मान लूं की 
वहां कुछ भी नही है ?

तार्किक ने कहा
जो तर्क से सिद्ध न हो
उसे मानना बेवकूफी है.

आस्था पर तर्क के इस प्रहार से
आस्तिक तिलमिलाया.

आस्तिक ने भी
तर्क शुरू किया
कहा
मेरा विश्वाश है वहां पानी है
तुम्हारा अनुमान है कि 
वहां कुछ नही है.

तो हम दोनों में 
कौन सही है 
ये कौन तय करेगा ?

तभी वैज्ञानिक को याद आया
की उसके पास ड्रोन है 
जिसमे कैमरा है

उसने उसे स्टार्ट किया 
और उत्तर की ओर भेज दिया
इधर स्क्रीन पर
तीनों देख रहे थे 
ड्रोन उस 
दिखाई देने वाले 
तालाब से भी 
कही आगे निकल चुका था.

चारों ओर सिवा रेत के
कुछ नही था 
पूरब में 
पानी का तालाब तो क्या
एक पौधा तक नही था.

हाँ ड्रोन ने 
ये जरूर देख लिया
की पश्चिम में 
कुछ ही दूरी पर
एक छोटा सा कस्बा है.

अब परीक्षण भी हो चुका था
की कही कुछ नही था
विश्वाश पर तर्क की जीत तो पहले ही हो चुकी थी.

अब परीक्षण से ये 
साबित भी हो गया
की उस सूखे वीराने में
कही कुछ न था.

उन्हें इस तृष्णा को त्याग कर
पश्चिम में आगे बढ़ते जाना था.

लेकिन आस्तिक को
ड्रोन से ज्यादा 
अपनी आस्था पर भरोसा था
उसने कहा
मैं उस तालाब की यात्रा पर 
पूरब की ओर जाता हूँ
क्योंकि मुझे जो दिख रहा है
वो झठ नही हो सकता.

तुम कितना भी तर्क कर लो
कितना भी परीक्षण कर लो
मुझे मेरे विश्वाश से नही हटा सकते
ये मेरा अधिकार भी है
तुम मुझे वहां जाने से 
नही रोक सकते
मेरी आस्था
तुम्हारे तर्क
और परीक्षण से 
ज्यादा मजबूत है.

वो दोनों को छोड़ कर
पूरब की ओर बढ़ गया
तार्किक और वैज्ञानिक
जानते थे कि वहां कुछ नही है
उन्होंने उसे तर्क से समझाया
विज्ञान से भी खूब समझाया
लेकिन वो नही माना.

आस्तिक की मजबूत आस्था के आगे तार्किक का तर्क और वैज्ञानिक का विज्ञान दोनों कमजोर पड़ गए थे.

आस्था जीत गई थी
तर्क और परीक्षण 
दोनों फेल हो गए थे.

उसे उसके हाल पर छोड़ने के अलावा दोनों के पास कोई चारा नही था.

इसलिए उसे 
पूरब की ओर जाता छोड़ 
वे दोनों
पश्चिम की ओर
आगे बढ़े
रेत के बादलों के छंटते ही
उन्हें सामने
अपनी मंजिल भी नजर आ गई.

इस घटना के 
कई दिन बीत चुके हैं
उस रेगिस्तान में
कई सर्च अभियान भेजे गये
लेकिन आस्तिक को 
आज तक ढूंढा नही जा सका.

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