नास्तिक की भावनाएं भी आहत होती हैं - तर्कशील भारत

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Tuesday, September 18, 2018

नास्तिक की भावनाएं भी आहत होती हैं


मैं कहता हूँ जब आस्तिक लोग व्यर्थ के ढकोसलों को धर्म मानकर प्रकृति को बर्बाद करते हैं और समाज में धार्मिक पाखंडों द्वारा अवैज्ञानिकता पैदा करते हो उससे मेरे जैसे नास्तिकों की भावनाएं आहत होती है उसका क्या ?

आपकी भावनाएं जो साबितन गलत हैं वह आहत होंती हैं तो होने दीजिये वर्ना धर्म की बकवासों को सही साबित कीजिये ?

मुझे यह आज तक समझ नहीं आया की धार्मिक भावनाएं इतनी कमजोर क्यों होती है की सवालों से आहत होने लगती है ?

कोई अमुक व्यक्ति आया था उसने खुद को अवतार या पैगम्बर बताया और हम इस बात को मानते हुए आज तक उसके गुनाहों को धर्म मानकर ढोते रहें क्या यही मानवता है ?

कोई अमुक व्यक्ति कह गया की जानवरों की बली देना ईश्वर को पसंद है और हम लग गए जानवरों की नृशंस हत्या में क्या यही इंसानियत है ?

एक ही धर्म में कई अक़ीदे बने फिरके बने और उसी मजहब के नाम पर एक दूसरे को ख़त्म करने पर अमादा हो गए कहाँ है इंसानियत ?

आज धर्म के रूप में स्थापित जितने भी गिरोह है उनमे से ज्यादातर की शुरुआत क्रांति से हुई थी जो बाद में धर्म बने फिर गिरोह बना दिए गए.

आज तो इन गिरोहों के अंदर भी न जाने कितने गिरोह बन चुके हैं.

धर्म इंसान को जोड़ता है एक यह भ्रम है जो हम समझ ही नहीं पाते क्योंकि हम इसके मानसिक गुलाम होते हैं.

सोचो समझो तर्क करो मेरी नजर में जिंदगी के मायने यही है और मैं अपनी बात पर कायम रहूँगा.

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