बिग बैंग से पहले क्या था ? - तर्कशील भारत

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Monday, September 10, 2018

बिग बैंग से पहले क्या था ?


सभ्यता की शुरुआत से ही इंसान के लिए सबसे बड़ा सवाल था कि सृष्टि कैसे बनी ? इसे किसने बनाया ? इसकी शुरुआत कैसे हुई ?

इन सवालों के जवाब किसी के पास नही थे लेकिन क्या आज विज्ञान ने सृष्टि के रहस्य की सभी परतें खोल दीं हैं ? क्या विज्ञान कभी ठीक ठीक ये पता लगा सकता है कि सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई ?

सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े प्राचीन मिथकों को तो विज्ञान पहले ही खारिज कर चुका है इस मामले में सभी पुरानी बातें गलत साबित हो चुकी हैं.

आधुनिक विज्ञान की उतपत्ति से पहले दुनिया को धरती के आखिरी छोर का रास्ता तक नही पता था उनके ज्ञान के अनुसार तो पृथ्वी चपटी थी इसलिए वे धरती के आखिरी छोर को ढूंढ रहे थे जब विज्ञान ने बताया कि पृथ्वी गोल है तब उन्हें पृथ्वी के गोल होने का पता चला.

लाखों वर्षों तक अंतरिक्ष को हम निहारते रहे और आगे चलकर कई लोगों ने सृष्टि के अबूझ रहस्यों पर पड़े अज्ञानता के पर्दे को हटाने की कोशिशें की

पिछली सदी में एस्ट्रोनॉमिकल साइंस बहुत आगे तक पहुंचा वैज्ञानिकों की मेहनत और जुनून की वजह से इंसान ने सृष्टि के बारे में बहुत कुछ जाना अंतरिक्ष मे घूमते धूमते धूमकेतू यात्राएं करती प्रकाश की किरणें अनेकों अनोखे ग्रह आकाशगंगाये निहारिका ब्लैकहोल सुपरनोवा क्लस्टर इन सब के अलावा निरंतर फैलता ब्रह्माण्ड.

विज्ञान ने हमें बिगबैंग के बारे में बताया और उसे समझाया भी लेकिन सच्चाई तो ये है कि बिग बैंग की ये थ्योरी ज्यादातर लोगों की समझ में नही आती.

इसे समझने के लिए सबसे पहले हमें ये जानना होगा कि बिगबैंग क्या है और ये अवधारणा आई कहाँ से ?

सबसे पहले डॉक्टर जार्ज लेमैत्रे (Georges Lemaître) ने सन 1927 में सृष्टि की उत्पत्ति के बारे में बिग-बैंग थ्योरी का सिद्धांत दिया उन्होंने बताया कि शुरुआत में ब्रह्मांड एक बहुत विशाल और भारी गोला था जिसमें एक बहुत जबरदस्त धमाका हुआ और इस धमाके से निकलने वाली ऊर्जा ने धीरे धीरे तारों और ग्रहों का रूप ले लिया. उनके इस सिद्धांत से सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ी कई जिज्ञासाएं शांत हो गई लेकिन बहुत से लोगों ने उनके इस सिद्धान्त का मजाक भी उड़ाया.

उनकी इस खोज के केवल दो साल के भीतर ही सन 1929 में एडविन ह्ब्बल Edwin Hubble ने Red Shift सिद्धांत के आधार पर पाया कि ब्रह्मांड फैल रहा है और ब्रह्मांड की आकाशगंगायें तेजी से एक दूसरे से दूर जा रही हैं। 

काफी समय तक वैज्ञानिक बिगबैंग के इस सिद्धांत पर दो भागों में बंटे रहे लेकिन उसके बाद कई सइंटिसिफिक रिसर्च के बाद वैज्ञानिक महाविस्फोट के इस सिद्धांत को सही मानने लगे 1965 के बाद Cosmic Microwave Radiation) की खोज के बाद इस सिद्धांत को सबसे ज्यादा मान्य सिद्धांत का दर्जा मिल गया। वर्तमान में खगोल विज्ञान का हर नियम इसी सिद्धांत पर आधारित है और अभी तक इस थिओरी को किसी ने भी चुनौती नही दी है.

निरंतर फैलते ब्रह्माण्ड का सीधा सा अर्थ यह था कि पहले आकाशगंगाये एक दूसरे के पास रही होंगी समय मे 10 अरब साल पीछे जाएं तो उस समय ये पूरा ब्रह्माण्ड केवल हमारी आकाशगंगा के बराबर था उससे भी एक अरब साल पहले ये हमारे सौरमंडल जितना बड़ा था और करीब 12 अरब साल पहले हमारा ब्रह्माण्ड मात्र हमारी पृथ्वी के बराबर था समय मे और पीछे जाए तो करीब 13 अरब 70 करोड़ साल पहले ये विराट ब्रह्माण्ड एक छोटे से परमाणु में समाया हुआ था और उससे भी पहले सब कुछ शून्य था कुछ भी नही था समय भी नही इसलिए हम उस आखिरी बिंदु से पीछे जा ही नही सकते जिन्हें आज हम देखते हैं महसूस करते है वो सब कुछ और उसका इतिहास उसी एक पल से शुरू होता है.

ये वो पल था जब स्पेस टाइम और मैटर का वजूद शुरू हुआ इस एक क्षण से पहले इन तीनों में से किसी का कोई अस्तित्व नही था.

लगभग 13 अरब 70 करोड़ वर्ष पहले हुए इस महाविस्फोट से energy release हुई और सेकंड के खरबवे हिस्से में ही ये एनर्जी खरबों गुना बड़ी हो गई इस तरह ये बढ़ती गई स्पेस और टाइम का निर्माण करती चली गई यह एनर्जी इतनी ताक़तवर थी उसके असर से आज तक ब्रह्मांड फैलता ही जा रहा है। इस धमाके के 3 लाख साल बाद पूरा छोटा सा यूनिवर्स हाइड्रोजन और हीलियम गैस के बादलों से भर गया. अगले लाख साल बाद अंतरिक्ष में सिर्फ फोटोन ही रह गये. इन फोटोन से तारों और आकाशगंगाओं का जन्म हुआ, और बाद में जाकर ग्रहों और हमारी पृथ्वी का जन्म हुआ. यही है महाविस्फोट यानी बिग-बैंग का सिद्धांत.

बिगबैंग के इस सिद्धांत को समझने के लिए आपको एस्ट्रोनॉमी की समझ होनी चाहिए और इन्हें वही समझ सकता है जिसका आई क्यू लेबल अच्छा हो.

बिगबैंग से पहले कुछ नही था तब सवाल उठता है कि कुछ भी बनाने के लिए रो मेटेरियल तो होना ही चाहिए अगर बिग बैंग से पहले कुछ भी नही था तो कुछ नही से ये सब कुछ कैसे बना ?

यहां हम एक विशाल पेड़ का उदाहरण लेते है मान लीजिए आपके बगीचे में एक विशाल पेड़ खड़ा है जो 13 साल 7 महीने पुराना है आज उस पेड़ का भार 20 टन है लेकिन 10 साल पहले ये पेड़ मात्र दो सौ किलो था और 13 साल पहले इसका वजन था 20 किलो उसके और 6 महीने पीछे चले जाइये अब इसका वजन 2 किलो से भी कम होना चाहिए 29 दिन और पीछे जाने पर ये मात्र दो ग्राम का रहा होगा और 23 घंटे और पीछे जाने पर ये किसी फल के बीज में समाहित होगा उससे पहले उसका कोई वजूद नही होगा.

यही है बिग बैंग का सिद्धांत.

हमारे चारों ओर की सभी वस्तुएं पदार्थ और तत्व इतिहास से जुड़े हुए हैं हर तत्व का विखंडन होता है और वो डिसऑर्डर रूप में फैलता है बीज से पौधा और फिर पेड़.

बिगबैंग से बनि एनर्जी और एनर्जी से बने हाइड्रोजन हाइड्रोजन के बादलों से बना सूरज और सूरज के मलबों से बने सौरमंडल के सभी ग्रह.

पृथ्वी पर मौजूद सभी तत्व आग जैसी धधकती पृथ्वी के ठंडी होने के बाद अरबो वर्षों में विकसित हुए पेड़ धातु और पानी से लेकर मिट्टी अनाज और कंप्यूटर तक आज जो कुछ भी हम देखते हैं वो सब कभी धरती पर तैरने वाले लावे का हिस्सा थे उससे भी अरबों साल पहले पहले वो सूरज का हिस्सा थे.

अब सवाल ये है कि अगर सभी तत्वों का इतिहास बिगबैंग से शुरू होता है तो बिगबैंग से पहले का इतिहास क्यों नही है ?

क्योंकि तब समय यानी टाइम का वजूद ही नही था तो उससे पूर्व का इतिहास कैसे संभव है ? 

क्या हमे बिग बैंग थेओरी को अपनी जिज्ञासाओं का अंत मानकर संतुष्ट हो जाना चाहिए ? मेरा मानना है नही.

मानवता के भविष्य में ऐसा कभी कोई दिन नही आएगा जब मनुष्य की जिज्ञासाए समाप्त हो जाएंगी.

बिग बैंग के इस ठहराव से आगे एक और थेओरी है जो हमारी जिज्ञासाओं को इससे आगे ले जाती हैं इस नई थिओरी का नाम है multivers.

तर्क शोध और परीक्षण द्वारा जानकारी को निरंतर आगे बढ़ाते रहना ही विज्ञान का काम है इसीलिए और हर ठहराव के बाद विज्ञान ने क्रांतिकारी खोजें की हैं और मानवता को ज्ञान की ऊंचाइयों तक पहुंचाया है.

मैंने इस पर बहुत सोचा तब मेरे दिमाग मे एक कहानी बनी इस कहानी से शायद हम समझ जाएंगे कि बिग बैंग बिना किसी पूर्व सूचना के अपने आप कैसे प्रकट हुआ ?

जब सभी तत्वों का इतिहास हो सकता है तो बिग बैंग का क्यों नही ?

ये कहानी है अमरूद के पेड़ पर लगे फल के अंदर छिपे कीड़े की जिसने बहुत कुछ जान लिया था.

अमरूद के कीड़े ने इतना जान लिया था कि वो जिस अमरूद में गुजर बसर कर रहा है वो एक विशाल पेड़ का एक मामूली फल है जिसमे ऐसे ही असंख्य अमरूद और हो सकते है उसने ये भी अनुमान लगाया कि अमरूद के उन सभी फलों में उसके जैसे और भी कीड़े हो सकते.

इतना जानने के बाद उसने आगे सोचना शुरू किया उसके मन मे प्रश्न आया कि आखिर ये अमरूद का पेड़ आया कहाँ से ?

फिर उसने अगली खोज की जो उसके साथ अन्य कीड़ो के लिए भी हैरानी की बात थी उसने अपने छोटे से दिमाग से ये अंदाजा लगाया की अमरूद का ये विशाल पेड़ कभी किसी दूसरे पेड़  के फल में था.

यानी इतना विशाल पेड़ कभी एक मामूली से फल में था और इतना ही नही इस पूरे बगीचे के सभी पेड़ इतिहास में किसी एक मामूली फल में ही थे ? 

और हैरानी की बात थी ये मामूली फल जिससे ये विशाल बगीचा बना है वो फल भी कभी एक मामूली बीज के अंदर था.

फिर वो बीज अंकुरित हुआ और इतना विशाल बगीचा बन गया जिसमें अनगिनत पेड़ हैं और उन पेड़ों पर असंख्य अमरूद हैं.

ये सब कैसे हुआ कहाँ से आया? 
क्या ये किसी महाफिस्फोट का हिस्सा तो नही ?

बीज के अंकुरण के इस सिद्धांत को उस कीड़े ने बीज बैंग का नाम दिया.

यहां उसके ज्ञान का अंत हो चुका था उसकी सोच खत्म हो गई थी उसकी विराट जिज्ञासाओं पर पूर्णविराम लग चुका था.

 इतनी बड़ी खोज एक मामूली कीड़े के मामूली दिमाग ने कर दी थी उसने ये जानकारी अपनी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा दी.

कीड़ों के हजारों वर्षों के विकास के बाद उनकी जानकारी बहुत उन्नत हो चुकी थी अब उनके पास बीज बैंग की सीमा से आगे का ज्ञान था.

पहले वो केवल इतना जानते थे कि ये पूरा विशाल बगीचा कभी एक मामूली और छोटे से अमरूद के अंदर था समय मे और पीछे जाने पर वो अमरूद जिससे ये विशाल बगीचा बना किसी बहुत छोटे से बीज से अंकुरित हुआ था और वो बीज शून्य से बना था यानी उससे पहले क्या था उन्हें इसकी ठीक ठीक जानकारी नही थी.

अब तक कि उनकी सभी जानकारी बीज बैंग पर आकर अटकी थी जहां से इस बगीचे के बनने की प्रक्रिया शुरू हुई थी यानी अंकुरण हुआ था बीज बैंग हुआ था.

अब इतने वर्षों में उन्होंने पता लगाया कि वो बीज जिससे ये विशाल बगीचा बना था किसी दूसरे फल का हिस्सा था और वो फल किसी दूसरे पेड़ का हिस्सा था वो पेड़ एक बगीचे का हिस्सा था और ऐसे बगीचे भी अनगिनत थे जो एक प्रदेश के अलग अलग कोने में थे फिर उसने आगे जाना कि ऐसे अनेकों प्रदेशों से एक देश बना है और ऐसे अनेकों देश एक महाद्वीप पर हैं और ऐसे कई महाद्वीप एक विशाल धरा पर हैं जिसे अर्थ कहते हैं.

इस ग्रह तक कि जानकारी अब उसके मामूली दिमाग की आखिरी सीमा थी ? 

उस कीड़े के लिए इतना ही जानना बहुत था क्योंकि इतनी जानकारी जुटाने में उसकी कई पीढियां खत्म हो गई थी और अब तो वो भी बूढा हो चला था.

वो कुछ और भी जान लेता लेकिन अमरूद का वो फल भी अब पक चुका था और टहनी से कभी भी नीचे गिर सकता था.

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