नारी अस्मिता का पाखंड - तर्कशील भारत

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Friday, August 24, 2018

नारी अस्मिता का पाखंड


सड़े हुए संस्कारों की आड़ में
सडांध भरे 
खोखले आदर्शो के नाम पर
घिनौनी परंपराओं के खोल में
अपनी मर्दवादी 
पाशविक मानसिकता को
चाहे जितना भी छुपा लो
चाहे जितना भी दबा लो
लेकिन तुम्हारी 
पुरुषवादी 
धार्मिक व्यवस्था में
नारी की अस्मिता 
हमेशा नंगी हुई है
और होती रहेगी.

"नार्यस्तु पूज्यन्ते" का कितना भी 
ढिंढोरा पीट लो
महिला अधिकारों की 
कितनी भी
बकैती कर लो
स्त्री शशक्तिकरण की
कितनी भी पैरवी कर लो
तुम्हारी 
घृणित नारीविरोधी सोच में
नारी सिर्फ एक देह है
उपभोग की सामग्री है
इससे ज्यादा 
उसकी कोई औकात नही.

औरत को दांव पर लगाकर
उसके कान नाक काटकर
उसकी अग्निपरीक्षा लेकर
उसे घर से निकालकर
अनेकों औरतों से 
यौन कुंठा मिटाकर
नाबालिग बच्चियों से
विवाह रचाकर

तुम्हारे खोखले 
आदर्श पुरुषों ने
क्या साबित किया है ?

यही न कि
नारी सिर्फ एक देह है
उपभोग की सामग्री है
इससे ज्यादा 
उसकी कोई औकात नही.

भरे दरबार मे
धर्म के रक्षकों के बीच
समाज के 
प्रतिष्ठित पुरुषों के बीच
जब एक नारी नंगी होती है
तो ये नँगापन 
उस नारी का नँगापन नही
उसके चरित्र का नँगापन नही
बल्कि
ये अंधे राजा के 
अंधे साम्राज्य का नँगापन है

फिर भी इसे धर्म कहते हो
और उस औरत के 
नंगेपन के दोषी को 
धर्मराज कहते हो
तो ये उस औरत का 
नँगापन नही बल्कि 
तुम्हारा दोगला पन है.

जब एक औरत 
भरे बाजार 
या भरे दरबार
नंगी होती है
या की जाती है 
तो असल मे
ये उस बेबस औरत का 
नँगापन नही बल्कि
उस समाज के 
सभी पुरुषों का 
नँगापन होता है
ये नग्नता 
सिर्फ 
एक औरत की नग्नता ही नही
आपके धर्म समाज न्याय
और राजनीति की 
दरिद्रता भी है

बदबूदार 
धार्मिक ग्रंथो की आड़ में
जड़ हो चुकी 
थोथी मान्यताओं के नाम पर
अपवित्र आयतों और
नापाक श्लोकों के मकड़जाल में
अपनी हैवानियत भरी 
पौरुषवादी सोच को
चाहे जितना भी छुपा लो
चाहे जितना भी दबा लो
लेकिन तुम्हारी
अराजकतावादी व्यवस्था में
स्त्री की आबरू
हमेशा नंगी हुई है
और होती रहेगी.
-एस प्रेम 

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