देश की सबसे बड़ी समस्या पढे लिखे लोग हैं॰ - तर्कशील भारत

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Thursday, August 30, 2018

देश की सबसे बड़ी समस्या पढे लिखे लोग हैं॰


खूब पढ़ा लिखा होना अलग बात है और समझ होना बिल्कुल दूसरी बात खूब पढ़े लिखे लोगों को भी पांचों वक़्त की नमाज पढ़ते और मंदिर का घंटा बजाते हुए देखा है लेकिन दुनिया के बारे में जिनकी समझ दुरुस्त होती है वे लोग अपने लॉजिक से सृष्टि को समझते हैं चाहे वो ज्यादा पढ़े लिखे न हो फिर भी उन्हें कोई बरगला नही सकता वे अंधभक्त नही होते.

समझ का पढ़ाई लिखाई से कोई संबंध नही है बल्कि मौजूद शिक्षा प्रणाली तो गधों की भीड़ तैयार करती है जिसमे समझ के लिये कोई जगह नही.

अभी हाल ही में एक mbbs डॉक्टर एक तांत्रिक के चक्कर मे दो करोड़ रुपये ठगा बैठी आप उसे क्या कहेंगे ? 

पेरियार रामास्वामी केवल छठी पास थे दसरथ मांझी ने स्कूल का मुंह तक नही देखा था आप इन्हें क्या कहेंगे ?

हमारी शिक्षा व्यवस्था जबतक रोजगार और अक्षर ज्ञान तक सीमित रहेगी तब तक लोगों में समझ नही आएगी और इस शिक्षा प्रणाली से ऐसे नासमझों की भीड़ पैदा होगी जिन्हें आज हम अपने चारों ओर देख रहे हैं.

केरल आपदा आई गरीब अशिक्षित मछुआरे भगवान बन कर सामने आये उन्होंने सेना के जवानों के साथ मिलकर सैकड़ों की जान बचाई और पढ़े लिखे लोगों को हमने देखा कि वे शोशल साइटों पर कैसे अपने गधे होने का प्रमाण दे रहे थे ?

जो जितना ज्यादा पढ़ा लिखा था वो उतना ज्यादा अपने नासमझ होने का सबूत दे रहा था RBI के एक वरिष्ठ अधिकारी जो कुछ ज्यादा ही पढ़ लिख गए थे उन्होंने दावा की ये सबरीमाला में औरतों के प्रवेश का प्रकोप है. 

विदेश में बैठकर देश के विकास को गति देने वाले कुछ ज्यादा ही पढ़े लिखे लोग केरल में राहत सामग्री के साथ कॉन्डम भेजने बात कर रहे थे ये है हमारे देश के पढ़े लिखे लोगों की असलियत.

आप शिक्षित हैं इसका अर्थ ये नही की आप समझदार भी होंगे आप अगर देश की समस्याओं के मूल कारणों को लॉजिक से नही समझ पाते राजनैतिक षड्यंत्रों को नही समझ पाते धार्मिक षड्यंत्रों के प्रति जागरूक नही हैं तो चाहे आप कितनी ही डिग्रियां लेकर बैठे हो आपकी समझ जीरो है.

मान लीजिये आप एक ऐसी जगह हैं जहां आपके चारों ओर अंधकार है ऐसे में आपकी पढ़ाई लिखाई उस अंधेरे में एक टोर्च की तरह है आप उस टोर्च के सहारे रास्ते को देखते हुए आगे बढ़ जाएंगे लेकिन आसपास के माहौल और मंजिल की तार्किक समझ न होने के कारण आप भटक जाएंगे गलत रास्ते पर आगे बढ़ते रहेंगे वही जिसके पास टोर्च नही है लेकिन रास्ते और मंजिल की समझ है वो घोर अंधकार में भी बिना रोशनी के रास्ता ढूंढ लेगा और आपसे पहले मंजिल तक पहुंच जाएगा.

ज्ञान का अर्थ ही परिवर्तन है अगर आपमे ज्ञान है और उस ज्ञान से दूसरों का कोई लाभ ही नही तो ऐसा ज्ञान किस काम का फिर तो ये आपका भ्रम है कि आप ज्ञानी हैं.

धर्म अध्यात्म राजनीति और पूंजीपतियों के गठजोड़ से बनी हमारी विकृत सामाजिक व्यवस्था में अगर पढ़े लिखों की तादात बढ़ने से देश आगे बढ़ता तो आज देश की ऐसी हालत नही होती कि 77 प्रतिशत लोग 30 रुपये प्रतिदिन पर गुजारा करने को मजबूर होते रोज 50 किसान आत्महत्या करते रोज 100 बालात्कार और प्रतिदिन 5 हजार बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मरते.

देश की ये तस्वीर कौन बदलेगा ? अगर आप राजनीति से देश के उद्धार होने का ख्वाब देखते हैं तो आप कुछ ज्यादा ही पढ़लिख गए हैं क्योंकि ये संभव ही नही है क्योंकि किसी भी राजनेता अथवा राजनैतिक दल के मनोफेस्टो में देश का उद्धार नही है बल्कि सभी देश का विकास चाहते हैं और विकास का झुनझुना बजाते बजाते 70 साल बीत गए फिर भी देश विकसित नही हो पाया.

इसके कारण को समझिये लोकतंत्र में दो चीजें हैं एक लोक दूसरा तंत्र.

तंत्र बनता है लोक से यानी कि लोगों से तो जैसी जनता वैसी प्रजा फिर तंत्र लोगों को वैसा ही रहने देता है जैसा कि वो हैं यानी जैसा राजा वैसी प्रजा.

लोगों की गलत अवधारणाओं पर आधारित मान्यताओं को तंत्र और मजबूत करता है और फिर ये सभी अवधारणाएं तंत्र का हिस्सा बन जाती हैं इससे होता यह है कि लोक हमेशा भ्रम में रहता है कि उसका उद्धार उसका धर्म करेगा और इस तरह तंत्र अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त होकर उन्मुक्त हो जाता है फिर उसे एक ही काम होता है लोक यानी लोगों को हमेशा भ्रमित रखना.

हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या हमारी बदहाली गरीबी नही है बल्कि सबसे बड़ी समस्या ये है कि यहां पढ़े लिखे लोग समझदार नहीं हैं.

आज देश मे एक बेहद बड़ी आबादी पढ़े लिखे लोगों की है
और विडंबना देखिये कि जो पढ़े लिखे हैं उनमें देश की समस्याओं को हल करने की समझ नही हैं और जिन्हें समझ है उनके पास संसाधन नही हैं मतलब जिसे रास्ते की समझ है उसके पास टोर्च नही है और जिसके पास टोर्च है उसे रास्ते की समझ नहीं है.

किसी भी विकसित देश का इतिहास उठाकर देख लीजिए वहां भी हमारे देश की तरह ही बदहाली थी लेकिन वहां के पढ़े लिखों लोग समझदार थे उन्होंने अपने ज्ञान से अपनी समझदारी से अपने देश की हर समस्या को समझा और उन्हें दूर किया.

आज इन देशों के धार्मिक स्थलों में मकड़ी के जाले लग चुके हैं क्योंकि वहां लोग समझदार हैं उन्हें पता है कि धर्म का इतिहास कितना कुरूप रहा है धर्म ने दुनिया को सिवा बर्बादी के कुछ नही दिया लेकिन इसके उलट हम पढलिख कर भी धर्म में अपना भविष्य तलाश कर रहे हैं यही हमारी सबसे बड़ी मूर्खता है.

भारत जैसे देश मे जहां 77 प्रतिशत आबादी को दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है देश मे 20 करोड़ लोग नालों और फुटपाथों पर जिंदगी गुजारने पर मजबूर हैं और इतने ही लोग सड़ांध भरी झुग्गियों में जीने को मजबूर हैं दूसरी ओर धार्मिक संस्थानों के पास इतना धन इकट्ठा है जिससे देश को दुबारा सोने की चिड़िया बनाया जा सकता है करोड़ों मंदिर मस्जिद धाम गुरुद्वारा मजार चर्च और मदरसे देश पर बोझ नही तो क्या हैं ?

 धर्म और ईश्वर के नाम पर खड़ा किये गए इस आडम्बर से देश का क्या भला हुआ है वे देश जहां धर्म की ये बीमारी नही है वहां लोग हमसे ज्यादा खुशहाल हैं आखिर क्यों ?

कुकुरमुत्ते की तरह उगे बाबा और उनके दिन रात चलते सतसंग जो आध्यात्म के नाम पर लोगों को मूढते हैं समाज के तार्किक दृष्टिकोण को पनपने से रोकते है इन सब के अलावा मुल्लाओं की फौज साधु मण्डली के लोग देश और समाज पर बोझ नही तो और क्या हैं ?

ऐसे हालात में देश के कुछ पढ़े लिखे लोग जो खुद को ज्यादा पढ़ा लिखा समझते हैं वे देश मे रहकर देश की समस्याओं से निपटने की कोशिश करने के बजाय देश छोड़ कर भाग रहे हैं.

 दुबई के महंगे फ्लैट्स में भारत के 50 प्रतिशत पढ़े लिखे लोग रहते हैं ऑस्ट्रेलिया केनेडा अमेरिका और यूरोप में भी भारतीय पढ़े लिखे लोग इसी तेजी से सेटल हो रहे हैं और
कुछ अनपढ़ लोग जो खुद को ज्यादा समझदार समझते हैं हिंसा के बल पर देश को बदलने का ख्वाब देख रहे हैं नक्सली बन रहे हैं.

दोनों ही स्थितियों में देश का विनाश ही होगा उद्धार नही.

अगर देश का सच मे उद्धार चाहिए तो पढ़े लिखे लोगों को समझदार बनना पड़ेगा देश की समस्याओं को तार्किक दृष्टिकोण से समझना होगा और सबको साथ लेकर आगे बढ़ना होगा तभी देश का उद्धार संभव है वर्ना आने वाले वक्त में ये देश सिर्फ बेवकूफों का देश बनकर रह जायेगा.

ये भी एक परम सत्य है कि जिस समाज मे धर्म के पाखंड से दिमाग को दूषित करने की प्रक्रिया जन्म लेते ही शुरू हो जाती हो परिवार समाज स्कूल tv अखबार सहित बुद्धिविकास के सभी दरवाजों पर धार्मिक गिरोहों का जबरदस्त पहरा हो ऐसे में खूब पढ़ लिखकर भी कोई इस मायाजाल से कभी निकल ही नही पायेगा.

ऐसी व्यवस्था में पढ़े लिखे समझदार लोग सिर्फ अपवाद ही होंगे.

आप पढ़े लिखे हैं या समझदार 
सोचियेगा जरूर.

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