मुरखलाल की मूर्खता (लघु-कथा) - तर्कशील भारत

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Tuesday, August 28, 2018

मुरखलाल की मूर्खता (लघु-कथा)


मुरखलाल को शादी में मोटरसाइकिल मिली सबसे पहले उसने पंडित जी से उसकी पूजा करवाई मोटरसाइकिल का खर्चा ससुर ने दिया था लेकिन पूजा का खर्च उसे उठाना पड़ा पूरे ढाई हजार जेब से चले गए फिर भी बड़ा खुश था चलाना सीख रहा था तीसरे दिन ठोक दी नई नवेली बाइक का नक्शा बदल गया.

अगले ही दिन

इंश्योरेंस कंपनी के दफ्तर में खड़े मुरखलाल को समझाना अब मुश्किल होता जा रहा था. मैनेजर ने मुरखलाल को अपने केबिन में बुलाया. उसे ठंडा पानी पिलाया फिर कहा, "देखो बेटा, तुम्हारी नई गाडी का एक्सिडेंट हुआ. तुमने इंश्योरेंस करवाया था. इंश्योरेंस का यह मतलब तो नहीं कि तुम्हारी गलती का पूरा भुगतान हम ही करें ? दहेज़ में मिले नोट से खरीदी गई बाइक को पहले चलाना तो सीख लेते ? इंश्योरेंस के कागजों में साफ साफ लिखा है कि दुर्घटना होने पर हुई क्षति का साठ प्रतिशत भुगतान ही हमारी कंपनी कर सकती है. तुम्हारे द्वारा भरा गया एक साल का प्रीमियम, जो कुल ग्यारह सौ रुपयों का है और तुम्हारी गाडी की मरम्मत का कुल खर्च दस हजार का है, जिसमे नियमानुसार हम छः हजार रुपये के भुगतान को तैयार हैं. इससे ज्यादा हम कुछ नहीं कर सकते है."

मैनेजर की बात से मुराखलाल पूरी तरह संतुष्ट नहीं था इसलिए मैनेजर ने उसे समझाने का एक दूसरा उपाय निकाला.

मैनेजर ने मुरखलाल से कहा,"चलो, तुम्हे पूरे दस हजार चाहिए. मैं तुम्हे चार हजार अपनी सैलरी से देता हूँ. अब तो ठीक है ? देखो, मैं यहाँ दिन भर मेहनत करता हूँ, तुम जैसे विद्वानों से सर खपाता हूँ, तब मुझे सैलरी मिलती है. इसी एक नौकरी के लिए माँ बाप ने खेत बेच कर मुझे पढ़ाया था. लेकिन जब तुमने गाडी खरीदी तब जिस ब्राह्मण से उस गाडी की पूजा करवाई थी वो कहाँ तक पढ़ा था ?"

मुराखलाल-"पता नहीं !"

मैनेजर,"चलो कोई बात नहीं. यह बताओ कि पूजा तुमने क्यों करवाई और कितना खर्चा किया?"

मुरखलाल-"मंगलकामना के लिए पंडित जी ने कहा था मंगल होगा और 1500 रूपये दक्षिणा लिए, बाकी नारियल-मिठाई वगैरह में हजार रूपए अलग से खर्च हुए."

मैनेजर-"कुल हुआ ढाई हजार !!! मतलब तुमने ढाई हजार में मंगल होने की पॉलिसी खरीदी और मंगल नहीं हुआ बल्कि अमंगल हो गया. तुम गए उस ब्राह्मण नामक धर्म के एजेंट के पास ?

यही रोब जो यहाँ हमारे सामने झाड़ रहे हो वही रोब उस पंडित पर क्यों नहीं दिखाते ? हिम्मत नहीं है ? ग्यारह सौ रूपए भरकर दस हजार का मुआवजा हमसे चाहते हो तब ढाई हजार रूपये लुटवा कर उस हरामखोर से पच्चीस हजार क्यों नहीं वसूल लेते ?हम तो ईमानदारी से काम करते हैं भाई. लोगों का इंश्योरेंस करके कंपनी हम जैसे हजारो वर्करों को रोजगार देती है सरकार को टैक्स भी देती है. लेकिन तुम जैसों का मंगल करने वाले ब्राह्मणदेवता 'मंगल' के नाम पर पूरे देश का अमंगल कर रहे हैं."

मुराखलाल अब समझ चुका था.

-शकील प्रेम

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