वेदों का इतिहास - तर्कशील भारत

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Monday, August 27, 2018

वेदों का इतिहास

भारत मे छपाई का इतिहास 1556 से शुरू होता है लेकिन कागज पर लेख या पुस्तकों की छपाई 1749 से 1822 के बीच ही शुरू हुई 1822 के बाद बाइबिल और अन्य धार्मिक पुस्तकों की छपाई का दौर शुरू हुआ इस तरह ये धारणा खारिज हो जाती है की मनुष्य की उत्पत्ति के समय वेद नामक पुस्तक उसे किसी ईश्वर ने प्रदान की ?

तीर भाला गदा मंत्र श्राप और बच्चों के मनोरंजन की कहानियां इनके अलावा और कुछ हो वेदों में तो खंगाल लीजियेगा.

असल मे वेदों में विज्ञान का प्रोपगैंडा दयानन्द सरस्वती ने आरम्भ किया जब पूरी दुनिया विज्ञान के सहारे आगे बढ़ रही थी आधुनिक विज्ञान की शुरुआत हो चुकी थी लोग पुराणों और मिथकों की काल्पनिक दुनिया से बाहर निकल कर नई दुनिया मे विज्ञान के साथ जीने की खुशफहमी पाल रहे थे पूरी दुनिया मे धर्म की बुनियादें हिलाई जा रही थी मान्यताये ध्वस्त हो रही परम्पराओ को तोड़ा जा रहा था ऐसे दौर में धार्मिक गिरोहों के लिए विज्ञान की इस आंधी से धर्म को किसी भी तरह बचा लेने की चुनौती थी वर्ना सब खत्म.

उन्नीसवीं सदी असल मे विज्ञान और धर्म के सीधे टकराव का दौर था
आप गौर करेंगे तो इसी दौर में इस्लाम भी छटपटाया हुआ था गुलाम अहमद कादियानी अहमद रजा बरेलवी जैसे लोग इस्लाम की नई कवायदें जोड़ने में लगे हुए थे ईसाई अलग से प्रोटेस्टेंट और ऑर्थोडॉक्स में ईसायत की गिरी हुई इमारत को फिर से खड़ा करने में लगे हुए थे.

ऐसे में भारतीय पुरोहितों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि धर्म को कैसे बचाएं विज्ञान की इस आंधी में क्या बचाया जा सकता है ?

उन्होंने मूलशंकर तिवारी उर्फ दयानंद सरस्वती के नेतृत्व में आर्यसमाज के नाम पर एक अलग धड़ा तैयार किया जिसमें पुराणों मिथकों और मूर्तिपूजा की मान्यताओं को झूठा करार दिया गया लेकिन बड़ी चतुराई से वेद उपनिषद और स्मृतिग्रंथों को बचा लिया गया ताकि बाद में इनके नाम पर धार्मिक प्रोपगेंडे को फिर से स्थापित किया जा सके.

भारत ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है इससे जरूरी सवाल ये होना चाहिए कि भारत ने भारत को क्या दिया है ?

आज देश मे भयंकर विदेशी कर्ज के अलावा चारों ओर जातिवाद गरीबी अशिक्षा भय भूख भ्रस्टाचार सामाजिक असमानता आर्थिक असमानता घृणा और अराजकता का माहौल फैला हुआ है
कहाँ है वेदों का महान ज्ञान ? या उस समय ये ज्ञान कहाँ था जब देश बार बार विदेशी हमलावरों द्वारा लूटा जाता रहा.

सोचियेगा जरूर......

-शकील प्रेम

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