महिलाविरोधी धर्म - इस्लाम - तर्कशील भारत

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Tuesday, August 14, 2018

महिलाविरोधी धर्म - इस्लाम


आज के समय कोई भी व्यक्ति जो खुद को तर्कशील कहता हो वो कैसे किसी भी धर्म का बचाव कर सकता है ?

इस्लाम भी एक धर्म है जिसे एक व्यक्ति ने लोगों पर थोपा आगे चलकर ये धर्म बन गया जिसके सारे scipture वक्त में 1400 साल पीछे ले जाते हैं आज के बदलते दौर के हिसाब से ऐसे सभी धार्मिक साहित्यिक कबाड़ों के लिए दो ही जगह होनी चाहिए संग्रहालय या कबाड़खाना.

आप कितना भी कुतर्क कर लें कुरान को आसमानी किताब मुहब्बद को ईश्वर का भेजा रसूल और इस्लाम को मानवता का धर्म साबित नही कर पाएंगे.

महिलाओं के बारे में क़ुरान हदीस और रसूल की जो राय है क्या वो नाजायज नही हैं ? जो मुल्ला औरतों को पैर की जूती समझते हैं उन्हें पीटते हैं मारते हैं उनका ये कुकृत्य क्या सिर्फ उनके दिमाग की उपज है ? उन्हें इसके लिए प्रेरणा कहाँ से मिलती है ?

स्त्री खेत समान है(कुरान 2/223)

एक पुरुष का हिस्सा दो स्त्रियों के बराबर है (कुरान 4/11)

जो औरत व्यभिचार में ग्रस्त हो उसे मार दो(4/15)

औरतों को पीटो (4/34)

अल्लाह को सबसे ज्यादा पसंद है कि औरत घर के किसी कोने में पड़ी रहे..(इत्तेहाद जिल्द-5, पृष्ठ-405)

तालिबानी या दूसरे कट्टरपंथीयों की सोच औरतों के बारे में ऐसी ही है तो इसमें इस्लाम निर्दोष कैसे है ?

ये लोग तो अल्लाह के आदेश को ही फॉलो कर रहे हैं न ?

इस्लाम जैसे महिलाविरोधी धर्म की मुख़ालफ़त करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी लोगों की मानसिकता कट्टरपंथीयों से अलग नही होती फ़र्क़ इतना होता है कि ऐसे लोग उदारवाद का झूठा नकाब पहने होते हैं.

आप को मुस्लिम होने पर गर्व है अच्छी बात है ये आपकी आस्था है और आपको किसी भी धर्म मे आस्था रखने की पूरी आज़ादी भी है लेकिन इसका अर्थ ये नही की आप जो कहे वो मान लिया जाए इस्लाम कभी भी मानवीय नही रहा औरतों के मामले में तो बिल्कुल नही शायद इस्लाम के उदय के समय ये एक क्रांतिकारी धर्म रहा हो लेकिन आज ये सड़ चुका है और इसे जाकिर नाइक जैसे लोगों ने तो और ज्यादा वीभत्स बना दिया है क्योंकि जिस चीज में सुधार या बदलाव की गुंजाइश खत्म हो जाती है वो वीभत्स हो ही जाता है.

मुझे इस्लाम की पैरवी में खड़े "बुद्धिजीवियों" से और कुछ नही कहना है आपका पवित्र धर्म आपको मुबारक हो.

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