एवरेस्ट- साहस धैर्य और पराक्रम की हैरतअंगेज कहानी - तर्कशील भारत

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Monday, July 2, 2018

एवरेस्ट- साहस धैर्य और पराक्रम की हैरतअंगेज कहानी


हिमालय की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट जितनी विशाल है उसको जीतने की कहानी भी उतनी ही विस्मयकारी है जी हां दोस्तो आज हम लेकर आये हैं माउंट एवरेस्ट और उसे फतह करने वाले लोगों के साहस धैर्य और पराक्रम की हैरतअंगेज कहानी !!

माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 8848मीटर या 29029फिट है 

इस छोटी की खोज सबसे पहले ब्रिटिशर्स ने की थी 1830 से 1847 के बीच एवरेस्ट का सबसे पहला सर्वेक्षण जार्ज एवरेस्ट ने किया था आगे चलकर उन्ही के नाम पर इस छोटी का नाम एवरेस्ट रखा गया !

1847 से 1920 के बीच यूरोप के कई पर्वतारोहियों ने माउंट एवरेस्ट पर फतह की कोशिश की लेकिन कोई भी दल कामयाब नही हुआ !

लेकिन 1953 में डेढ़ सौ वर्षों के संघर्ष के बाद आखिरकार दो इंसानों ने इस अपराजेय पर्वत की चोटी पर अपने जीत का झंडा गाड़ दिया वो दो महान लोग थे एडमण्ड हिलेरी और 
तेनजिंग नोर्गे 

दुनिया की सबसे उची चोटी माउंट एवेरेस्ट पर सबसे पहले विजय हासिल करने वाले यही दो लोग थे विश्व इतिहास में इन दोनों का नाम कभी नही भुलाया जा सकता है |
 
देखा जाय तो शुरुआत में तेनजिंग नोर्गे अंग्रेजों के एवरेस्ट विजय अभियान में रोजी रोटी के लिए शामिल हुए थे लेकिन जल्द ही वे पर्वत पर चढ़ने की अपनी काबलियत के बल पर विदेशी पर्वतारोहियों की जरूरत बन गए 

Tenzing Norgay तेनजिंग के पिता याक से सामान एक जगह से दुसरी जगह ले जाकर अपना जीवन यापन करते थे | 15 लोगों के परिवार को पालना तेनजिंग के पिता के लिए बड़ा कठिन था जिसके कारण बड़ी मुशिकल से उन्हें दो वक़्त की रोटी मिल पाती थी इसलिए पिता ने छोटे तेनजिंग को भी अपने साथ काम पर लगा लिया बचपन से ही तेनजिंग को पहाड़ चढने का बड़ा शौक था इसलिए वो काठमांडू में हिमालय पर्वत को घंटो तक देखा करते थे | जब उन्हें महंत बनने के लिए मठ में भेजा गया तब वो वहा से भाग गये क्योंकि उन्हें पता था कि वो मठ के लिए नही बने थे | 19 साल की उम्र में वो दार्जीलिंग की शेरपा समुदाय के इलाके में बस गए 

उस समय शेरपाओ की रोजी रोटी पहाड़ो पर निर्भर करती थी क्योंकि अधिकतर शेरपा पहाड़ चढने वाले लोगो की मदद करते थे जिसके लिए उन्हें पैसे मिलते थे | तेनजिंग नोर्गे को भी अपना जीवन चलाने के लिए ऐसा ही काम करना पड़ा और वो पहाड़ चढने वाले लोगो के यहा काम करने लग गये शेरपा लोग पहाड़ चढने में माहिर होते है क्योंकि उनका जीवन भी उन्ही पहाडियों से शुरू होता है और उन्हें हर कठिनाई का अनुमान होता है इसलिए विदेशी पर्वतारोही उस समय बिना शेरपाओ के हिमालय पर एक कदम नही बढ़ा सकते थे | उस समय तक एवरेस्ट को नही जीता गया था और हर बार पर्वतारोहियों को असफलता हाथ लग रही थी |

नोर्गे को 1935 के एक “ब्रिटिश माउंट एवरेस्ट पर्वतारोही अभियान” के  लीडर एरिक शिप्टन के यहा पहली बार काम करने का मौका मिला जो एवरेस्ट पर चढाई करने वाले थे | पहले इस काम के लिए दो दुसरे शेरपाओ को चुना गया था लेकिन उनमे से एक पहाड़ी पर चढने के लिए जरूरी मेडिकल टेस्ट में फ़ैल हो गया था इसी कारण 20 साल के तेनजिंग का चुनाव हो गया  नोर्गे का काम पर्वतारोहण करने वाले लोगो का सामान बेस कैंप तक पहचाना था |

इस तरह Tenzing Norgay नोर्गे 1930 के दशक में तीन बार पर्वतारोहण करने वाले ब्रिटिश अफसरों के लिए बोझा ढोने का काम करते रहे धीरे धीरे उनका एवरेस्ट पर बेस कैंप में चढने उतरने का अच्छा अभ्यास हो गया 

1936 में तेनजिंग ने जॉन मोरिस के साथ भी काम किया था जो एल्प्स की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ाई कर चुके थे !

 1947 में भी तेनजिंग एक एवरेस्ट अभियान में शामिल हुए लेकिन 22.000 फीट की उचाई पर एक भयंकर तूफ़ान आ गया था जिसके कारण सभी पर्वतारोहीयो को वापस लौटना पडा था | इसी एवरेस्ट अभियान में Tenzing Norgay तेनजिंग ने उस समय के सरदार वांगडी नोरबू को बर्फ की खाई में गिरने से बचाया था जिसके कारण वांगडी ने सरदार का ख़िताब नोर्गे को दे दिया |

इस बड़े मिशन के फेल होने के केवल दो महीने के अंदर ही उन्हें एक स्विस अभियान के नेतृत्व के लिए चुन लिया गया जिसमे वो 22.769 फीट की उचाई पर केदारनाथ के मुख्य शिखर तक पहुच गए थे लेकिन मौसम खराब होने के कारण उन्हें इतनी ऊंचाई से लौट जाना पड़ा !

अब इस तरह के कई अभियानों में तेनजिंग को मौका मिल रहा था और तेनजिंग एक अनुभवी पर्वतारोही के रूप में जाने जाने लगे थे |

1950 और 1951 में अमेरिका और ब्रिटेन के दो असफल अभियानों के बाद तेनजिंग को 1952 के एक और स्विस एवरेस्ट अभियान में शामिल किया गया जिसका नेतृत्व Edouard Wyss-Dunant और Gabriel Chevalley कर रहे थे | पहली बार गंभीर प्रयास के कारण रेमंड लैबर्ट और Tenzing Norgay तेनजिंग नोर्ग 8,595 मीटर तक पहुचने में सफल हुए जो उस समय तक सबसे उची चोटी तक पहुचने का रिकॉर्ड था | इससे पहले कभी एवरेस्ट पर इतना उचा कोई नही चढ़ पाया था लेकिन यहां तक पहुंचने के बाद और मंजिल से मात्र 300 मीटर की दूरी से ही उन्हें लौटना पड़ा क्योंकि उनको शिखर का रास्ता नही मिला था |
 
उसके बाद अगले ही वर्ष फिर से दोनों 8600 मीटर की उचाई तक पहुच गये और इस अभियान के लिए उनको एवरेस्ट अभियानों की आजीवन सदस्यता मिल गयी थी जो उस समय पर्वतारोहियों के लिए सबसे बड़ा सम्मान हुआ करता था | इसके बाद एक ओर चढाई में वो 8100 मीटर की उचाई तक पहुचने के बाद खराब मौसम के कारण वापस लौट आये | 

इतनी उचाई पर तीन बार पहुचने के बाद भी अभी मंजिल तक नही पहुच पाए थे |

1953 में Tenzing Norgay तेनजिंग ने जॉन हंट के एवरेस्ट अभियान में हिस्सा लिया जो सात एवरेस्ट अभियानों का नेतृत्व कर चुके थे | अब इस टीम में उनकी मुलाक़ात एडमंड हिलेरी से हुयी | एडमंड हिलेरी भी एक माहिर पर्वतारोही थे जिनकी एवरेस्ट पर चढने से पहले काफी चर्चा हो रही थी | अब एवरेस्ट अभियान के लिए जॉन हंट के नेतृत्व में एडमंड हिलेरी , तेनजिंग और अन्य सदस्य रवाना हुए |
उस अभियान की शुरुवात में ही एक जगह पर एडमंड हिलेरी एक बर्फ की बड़ी दरार में फंस गये थे और उस समय उनके कमर की रस्सी तेनजिंग से बंधी हुयी थी | तेनजिंग ने बहादुरी दिखाते हुए कुल्हाड़ी को तुंरत बर्फ में गाड़ दिया और एडमंड को धीरे धीरे बाहर निकाला इस घटना का जिक्र करते हुए हिलेरी की आंखों में आंसू आ गए थे उन्होंने कहा था कि तेनजिंग की दिलेरी और सूझबूझ ने उसकी जान बचाई वर्ना बर्फ में हमेशा के लिए दफन हो चुका था !

इस घटना के बाद एडमंड और Tenzing Norgay तेनजिंग गहरे मित्र हो गये हालांकि दोनों एक दुसरे की भाषा नही समझते थे केवल इशारों से ही एक दूसरे की भावनाओं को समझते हुए आगे बढ़ते रहे !

इस एवरेस्ट अभियान में कुल 400 लोग शामिल हुए थे जिसमे केवल 362 लोगो को बोझा ढोने के लिया गया था ताकि एक जगह से दुसरी जगह खाने पीने टेंट का सामान पहुचा सके | उनको लगभग 4500 किलो सामान उपर तक पहचाना था जो इससे पहले कभी नही हुआ था | इस अभियान की सबसे बड़ी सच्चाई ये थी कि अगर बोझा ढोने वाले शेरपा ना होते तो एवरेस्ट पर फतेह पाना नामुनकिन होता है इसलिए शेरपाओ को Unsung Heroes of Everest कहा जाता है |

अभियान दल मार्च 1953 को बेस कैंप में पहुच गया और धीरे धीरे 7890 फीट की उचाई पर भी उन्होंने अपना कैंप लगा लिया | अब यहा से 26 मई को एवरेस्ट पर चढने के लिए Tom Bourdillon और Charles Evans को चुना गया क्योंकि ये दोनों बहुत अनुभवी पर्वतारोही थे ये दोनों आगे बढ़ते हुए South Summit तक पहुच चुके थे लेकिन धीरे धीरे चलने की वजह से टॉम का ऑक्सीजन खत्म हो गया और इवान का ऑक्सीजन सिस्टम ही फ़ैल हो गया था | मजबूरी में उन दोनों को वापस लौटना पड़ा वरना एवरेस्ट फतेह करने वालो में इनका नाम सबसे पहले आता !

जॉन हंट चाहते तो खुद भी एवरेस्ट पर फतेह पा सकते थे लेकिन वो पहले दुसरो को मौका देना चाहते थे इसलिए अब जॉन हंट ने दुसरे जोड़े के रूप में Tenzing Norgay तेनजिंग और नोर्गे को चुना  | अब तेज बर्फीली हवाओं के बीज वो दोनों दो दिन के अंदर South Col तक तो पहुच गये थे | 28 मई को उन दोनों के लिए सामान पहुचाने का काम अंग नीमा ,Alfred Gregory और  George Lowe क्योंकि जॉन हंट इतनी उचाई पर पहुचकर अब रिस्क नही लेना चाहते थे | 28 मई को 8500 मीटर की उचाई पर उन्होंने अपना टेंट लगाया और अपने साथियो को वापस नीचे भेज दिया |

Edmund and Tenzingअब वो रात उन दोनों के लिए सबसे भीषण रात थी क्योंकि तेज बर्फीली हवाए चल रही थी और हवाओं की आवाजों के अलावा कुछ नही सुनाई दे रहा था | अगले दिन सुबह जब उठे तो एडमंड के पैर बर्फ में जम गये थे क्योंकि उस रात उसके जुते गलती से बाहर रह गये थे दो घंटो अपने पैरो को रगड़ने के बाद वो उठ सके अब उन दोनों को अंतिम चढाई चढनी थी और उन दोनों के पास 14 किलो सामन लदा हुआ था लगभग 200 मीटर आगे चलने पर उनको एक खडी चट्टान का सामना करना पड़ा था जिसके लिए एडमंड हिलेरी ने अपना दिमाग लगाया क्योंकि अगर वो उस चट्टान में से नही जाते तो उन्हें दुसरे रास्ते से जाना पड़ता जो लम्बा रास्ता था |

उस चट्टान की दरार में से एडमंड हिलेरी ने रास्ता बनाया जिसके पीछे Tenzing Norgay तेनजिंग आगे बढ़े उस दिन के बाद से इस जगह को “हिलेरी स्टेप ” कहा जाने लगा अब वहा से आगे बढ़ना ज्यादा कठिन नही रहा और आखिरकार दोनों 29 मई 1953 को 11 बजकर 30 मिनट पर विश्व की सबसे उची चोटी माउंट एवरेस्ट पर पहुच गये जो 8848 मीटर की उचाई पर था 

उन दोनों के खुशी की सीमा नही रही और विशेष तौर पर तेनजिंग की , क्योंकि इतने वर्षो से एवरेस्ट शिखर के नजदीक पहुचने के बाद उस दिन पहली बार वो एवरेस्ट चोटी पर पहुच सके थे अब 15 मिनट तक वो उस चोटी पर रुके और वहा पर हिलेरी ने कुल्हाडी के साथ नोर्गे का प्रसिद्ध फोटो लिया जो हमेशा के लिए यादगार हो गया तेनजिंग और हिलेरी ने हिमालय के शिखर को जीत लिया था ये मात्र दो इंसानों की जीत नही थी बल्कि सम्पूर्ण मानवता की जीत थी दो इंसानों के इस प्रयास से प्रकृति पर इंसानियत की विजय गाथा की शुरूआत हो चुकी थी इंसान के बुलंद हौसले ने हिमालय को जीत लिया था दो लोगों के चार मामूली कदमों ने हिमालय की विशालता को छोटा कर दिया था इंसानी हिम्मत और पराक्रम की ये विजय गाथा अब थमने वाली कहां थी

इस घटना के केवल 24 साल के भीतर ही एवरेस्ट को जीतने वाले इंसानों के कदमों ने धरती से तीन लाख किलोमीटर दूर चाँद की जमीन को भी छू लिया मानव के इतिहास की ये दोनों घटनाएं इंसान के लिए एक मामूली कदम लेकिन इंसानियत के लिए एक बड़ी छलांग साबित हुई 

तेनजिंग के बेटे जेमलिंग ने एडमंड हिलेरी के बेटे पीटर हिलेरी के साथ मिलकर अपने अपने पिता की याद में माउंट एवरेस्ट पर चढने की 50वी वर्षगाँठ पर 2003 में साथ साथ एवरेस्ट पर चढ़े थे | तेनजिंग नोर्गे की 71 वर्ष की उम्र में 1986 में cerebral hemorrhage की वजह से भारत के पश्चिमी बंगाल में मृत्यु हो गयी |

आंकड़े बताते हैं कि एवरेस्ट पर दो सौ से ज़्यादा लाशें पड़ी हुई हैं. बरसों से इनका कोई नामलेवा नहीं ये वे लोग थे जिन्हें इस तेनजिंग और हिलेरी की तरह इस चोटी को जीतने का जुनून सवार था लेकिन वे लोग काल के गाल में समा गये और उनके साथ उनके सपने भी बर्फ के नीचे दफन हो गये !

मगर इंसान का इस चोटी को जीतने का जुनून आज भी कम नहीं हुआ है. कई बार तो चढ़ाई करने वाले इन लाशों पर पैर रखकर ऊपर चढ़ने या नीचे उतरने का सफ़र तय करते हैं. इतनी ऊंचाई से कोई भी लाश उठाकर लाना मुमकिन नहीं होता. और बर्फ़ीले माहौल में रहने की वजह से ये जल्दी से ख़त्म भी नहीं होतीं.

एवरेस्ट की चढ़ाई करने वालों को मालूम है कि इसकी चढ़ाई के रास्ते में कई लाशें बिखरी पड़ी हैं क्योंकि पहाड़, मौत की सज़ा देने के बाद भी इन लाशों को आसानी से नहीं छोड़ते. बरसों-बरस ये मुर्दा इंसान, बर्फ़ीली दरारों, चट्टानों के बीच यूँही पड़े रहेंगे और दुनिया को ये संदेश देते रहेंगे की जीवन का नाम सिर्फ जिंदा रहना नही है बल्कि जीवन का मतलब है जीतना !!

एवरेस्ट के रास्ते मे पड़ी ये लाशें यहां आने वालों से हमेशा कहती रहेंगी की जरूरी नही की हमेशा जीतने के लिए ही जियें कभी कभी जीतने की जिद में मरना भी जरूरी होता है !

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