क्या सभी बड़े वैज्ञानिक आस्तिक थे ? - तर्कशील भारत

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Wednesday, May 9, 2018

क्या सभी बड़े वैज्ञानिक आस्तिक थे ?

"धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बिना धर्म अंधा है"

आइंस्टीन का ये कथन दुनिया भर के तमाम धार्मिक गिरोहों के लिए अमृत वाक्य बन चुका है आइंस्टीन के इस अधूरे वाक्य के आधार पर सभी धार्मिक गिरोह दावा करते हैं कि बड़े बड़े वैज्ञानिक भी धर्म और ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हैं !

इन महान वैज्ञानिकों के बारे में ये लोग ऐसे ऐसे झूठे दावे करते हैं जिन्हें देखकर पढ़े लिखे लोग भी भ्रमित हो जाते हैं !

ऐसे ही हजारों झूठे दावों में एक दावा ये भी है कि सभी बड़े वैज्ञानिकों ने ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार किया है यानी सभी बड़े वैज्ञानिक आस्तिक थे !

इस क्रम में ये लोग गेलिलियो कोपरनिकस न्यूटन डार्विन और स्टीफेन हौकिंग तक को अपनी थोथी धार्मिक मानसिकता का हिस्सा बना कर विज्ञान को धर्म का गुलाम बनाने की कोशिश करते हैं !

जबकि ऐसा बिल्कुल नही है !
क्योंकि जिन बड़े बड़े वैज्ञानिकों को आस्तिकता की परिधि में फिट करने की कोशिश की जाती है वे सभी लोग विशुद्ध तौर पर नास्तिक ही थे !

इन महान वैज्ञानिकों के धार्मिक विचार क्या थे इस विषय पर बात करने से पहले हमें नास्तिकता के इतिहास को समझना होगा !

नास्तिकता ईश्वर के अस्तित्व का विरोध भर नही है बल्कि हर युग मे नास्तिकता की अवधारणा अलग अलग रही है !

पाणिनी ने अपने सूत्र में नास्तिकता की जो परिभाषा दी है उसके अनुसार ‘अस्ति नास्ति दिष्टं मतिः परलोक की सत्ता को न मानने वाला नास्तिक है’ !

जबकि वेदों को ही सभी ज्ञान का प्रामाणिक स्रोत माननेवाले स्मृतिकारों के अनुसार ‘नास्तिको वेदनिंदकः’ यानि जो वेद को नहीं मानते या उसकी निंदा करते हैं, वे नास्तिक हैं !

बाहर के देशों में नास्तिकता का इतिहास उतना परिपक्व नही रहा जितना कि भारतीय संदर्भ में देखने को मिलता है चार्वाक और लोकायत दर्शन ने नास्तिकता को एक जीवन शैली के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया इसी परंपरा में आगे ईसा पूर्व की  छठी सदी में वर्धमान और तथागत बुद्ध ने नास्तिकता को मानवीय मूल्यों के साथ पिरोकर उसमें नैतिकता सदाचार न्याय और समानता के गुणों से सजा कर अनीश्वरवाद को मानव विकास में उपयोगी समझा और प्रचलित धर्मों को खारिज करते हुए नास्तिकता पर आधारित एक वैकल्पिक और तर्कसंगत मार्ग तैयार किया !

बाहर के देशों में नास्तिकता और आस्तिकता के बीच का संघर्ष मध्यकाल से शुरू होता है और धर्म और विज्ञान का ये शुरुआती टकराव चर्च की स्थापित मान्यताओं को चुनौती मिलने से शुरू होता है !

हालांकि बाइबिल को चुनौती देने वाले शुरुआती वैज्ञानिक पूरी तरह ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देने वाले नास्तिक नही थे बल्कि उनकी खोजों का बाइबिल के सिद्धांतों के विरुद्ध होना ही उस दौर में उन्हें नास्तिक साबित करने के लिए काफी था वैसे ही जैसे किसी दौर में वेदों की निंदा करने वालों को नास्तिक माना जाता था !

बाइबिल की मान्यताओं को चुनौती देने वाले ऐसे नास्तिकों में सबसे बड़ा और सबसे शुरुआती नाम गेलिलियो गैलिली का था जिन्होंने अपनी दूरबीन के प्रयोगों से बाइबिल की इस अवधारणा को खारिज कर दिया था कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र है और इस अपराध के लिए उन्हें कारावास हो गई !

कोपरनिकस के शोधों से भी बाइबिल की मान्यताओं को चुनौती मिली तो उन्हें भी धर्मविरोधी घोसित कर देश से निकल जाने की सजा मिली !

ज्योरदानो ब्रूनो को बाइबिल और चर्च की अवहेलना की ऐसी घोर सजा दी गई जिससे की और कोई बाइबिल के विरुद्ध न जा सके उन्हें जिंदा जला दिया गया !

लेकिन सत्य का दम घोंटने की चर्च की मानसिकता को चुनौती देने वाले महान दार्शनिक वैज्ञानिक और शोधकर्ता डरे नही आगे बढ़ते चले गये !

ज्योरदानो ब्रूनो के हस्र के बाद बहुत से वैज्ञानिकों ने बीच का रास्ता निकाला वे खुले तौर पर नास्तिकता की अभिव्यक्ति से बचते रहे और कई बार उन्होंने खुद को आस्तिकता के करीब दिखाने की कोशिश भी की इसीलिए कई वैज्ञानिकों की बातों में विरोधाभास देखने को मिलता है !

इसीलिए बहुत से वैज्ञानिक खुले तौर पर बाइबिल की बखिया उधेड़ने से बचते रहे फिर भी उनके प्रयोगात्मक कार्यों से चर्च की सत्ता को चुनौती मिलती रही !

आइजेक न्यूटन ने ग्रेविटी का जो सिद्धांत दुनिया को दिया उससे भी चर्च को परेशानी हुई !

आज न्यूटन को धार्मिक गिरोह अपने थोथे धार्मिक खेमे में फिट करने की कोशिश करते है जबकि ऐसा नही हैं !

इतिहासकार स्टीफन डी. स्नोबेलेन जिन्होंने न्यूटन के शोध और उनके जीवन पर कई किताबें लिखी वे न्यूटन के बारे में कहते हैं "आइजैक न्यूटन पूरी तरह नास्तिक थे। लेकिन ... उन्होंने अपने निजी विश्वास की सार्वजनिक घोषणा कभी नहीं की- उन्होंने अपने विश्वास को इतनी अच्छी तरह से छुपाया कि आज भी विद्वान उनकी निजी मान्यताओं पर असमंजस की स्थिति में हैं "

फिर भी न्यूटन के विचारों के बारे में उनकी कुछ बाते जो सार्वजनिक हुई वो धर्म के प्रति उनके विद्रोह को दर्शाती हैं जैसे पवित्र आदेशों का पालन करने के लिए उनके द्वारा इनकार किया जाना, ओर जब वे मरने वाले थे तब उन्हें पवित्र संस्कार लेने के लिए कहा गया ओर उन्होंने इनकार कर दिया"

ये तो थी न्यूटन की बात जो स्नोबेलेन के शोध के अनुसार नास्तिक विचारों के थे !

अब बात करते हैं चार्ल्स डार्विन की जो विशुद्ध रूप से नास्तिक थे इस बात में कोई संदेह नही है फिर भी उनके कुछ शुरुआती विचारों से उन्हें आस्तिकता के पैमाने में फिट करने की नाजायज कोशिश की जाती है !

वैसे धर्म के बारे में खुलकर बोलने से डार्विन ताउम्र बचते रहे. इसके बावजूद उनके लिखे कई पत्रों और उनकी कई किताबों में ईसाइयत के प्रति उनके विरोधी विचार साफ नज़र आते हैं. अपनी जीवनी में डार्विन ने लिखा था

 ‘जिन चमत्कारों का समर्थन ईसाइयत करती है उन पर यकीन करने के लिए किसी भी समझदार आदमी को प्रमाणों की आवश्यकता जरूर महसूस होगी. उस समय का इंसान हमारे मुकाबले कहीं ज्यादा सीधा और अनभिज्ञ था जब इन चमत्कारों के बारे में बताया गया था’. 

बाइबिल के बारे में डार्विन ने कहा था, ‘इस किताब में लिखे वर्णनों और चमत्कारों की कहानियों में भी मुझे विरोधाभास नज़र आता है. जैसे-जैसे इन विरोधाभासों का प्रभाव मुझ पर बढ़ता गया ईसायत पर से मेरा विश्वास भी उठता चला गया.’

एक दूसरे पत्र में वे लिखते हैं, ‘इन दो सालों (अक्टूबर 1836 से जनवरी 1839) के दौरान मुझे धर्म के बारे में ढंग से सोचने का मौका मिला. जब मैंने बीगल पर अपनी यात्रा की शुरूआत की थी मैं धर्म को लेकर घोर कट्टरवादी था. मुझे याद है कि जब मैं नैतिकता से जुड़े कई मुद्दों पर बाइबिल को किसी अकाट्य संदर्भ की तरह पेश करता था तो किस तरह जहाज के कई अधिकारी मुझ पर हंसा करते थे.’ 

वक्त के साथ डार्विन जैसे-जैसे अपना शोध आगे बढ़ाते गए, धर्म में उनका भरोसा कम होता चला गया. बताया जाता है कि डार्विन ने अपनी बेटी ‘ऐनी’ की मौत के बाद पूरी तरह से खुद को अपने शोध कार्यों में झोंक दिया था.

 इसी दौरान धीरे-धीरे बाइबिल और जीसस क्राइस्ट पर से उनका विश्वास उठता चला गया. 

24 नवंबर,1880 को लिखे एक ऐतिहासिक खत में उन्होंने कहा था. 

‘मुझे आपको यह बताने में खेद है कि मैं बाइबिल पर भरोसा नहीं करता. यही कारण है कि मुझे जीसस क्राइस्ट के ईश्वर की संतान होने पर भी विश्वास नहीं है.’ 

(2015 में न्यूयॉर्क में नीलामी के दौरान इस पत्र की बोली 197,000 यूएस डॉलर लगाई गई थी) 

डार्विन की किताब के प्रकाशन के बाद अमेरिका और पूरे यूरोप के स्कूल-कॉलेजों में डार्विन की थ्योरी पढ़ाने पर पाबंदी लगा दी गई थी. 

डार्विन के सिद्धांत पढ़ाने पर जीव विज्ञान के एक अध्यापक पर अमेरिका की एक अदालत में आधुनिक दुनिया के सबसे चर्चित केसों में से एक चलाया गया था जिसे मंकी ट्रायल के नाम से जाना जाता है. 

इसके बाद बात करते हैं सर केल्विन की जिन्होंने मेकेनिकल एनर्जी पर कई शोध पत्र दाखिल किया है और ये वैज्ञानिक कम और ईसाई ज्यादा थे इसीलिए उनकी ज्यादातर थ्योरियाँ गलत साबित हुई हैं !

इस वैज्ञानिक को सही मायने में आस्तिक वैज्ञानिक माना जा सकता है !
उनका कहना था 

मैंने जितना शोध किया, मुझे लगता गया कि विज्ञान में नास्तिकता की जगह नहीं है. अगर आप मज़बूती से सोचते हैं तो विज्ञान आपको भगवान में भरोसा रखने के लिए मजबूर करेगा."

केल्विन बाइबल पढ़ते थे और रोज़ाना चर्च जाते थे.

एक वैज्ञानिक के आस्तिक होने का नतीजा क्या होता है इस बात का उदाहरण इस बात से लगता है कि उनके कई सिद्धांत गलत साबित हुए थे उनके शोध के अनुसार पृथ्वी की आयु कुछ करोड़ साल थी साथ ही उन्होंने पृथ्वी के ठंडे होने के बारे में भी गलत अंदाजा लगाया था !

अब बात करते हैं अल्बर्ट आइंस्टीन की 

उनका एक वक्तव्य तमाम धार्मिक गिरोहों के लिए संजीवनी बन गया 

“Science without religion is lame; religion without science is blind”

तो क्या वास्तव में आइंस्टीन ऐसा ही सोचते थे ?

ज्ञान की धारा अज्ञानता से ज्ञान की ओर बढ़ती है इसीलिए बहुत से महान नास्तिकों को आप देखेंगे कि उनका प्रारम्भ आस्तिकता से शुरू होकर नास्तिकता की ओर गया आइंस्टीन भी ऐसे ही एक महान वैज्ञानिक थे जो प्रारम्भ में आस्तिक ही थे और जैसे जैसे वे ज्ञान के उच्चतम स्तर को हासिल करते गए वो नास्तिकता की ओर बढ़ते चले गए !

उनके इस प्रचिलित वक्तव्य को समझने के लिए उस वक्तव्य की पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है ये पंक्ति उनके एक भाषण का हिस्सा है जो उन्होंने 9 सितंबर 1940 को न्यूयार्क में हुए यहूदियों के धार्मिक सेमिनार के लिए आइंस्टीन ने तैयार किया था !

ये वो दौर था जब पूरी दुनिया द्वितीय विश्वयुद्ध की भयंकर वेदना झेल रही थी और ऐसे में आइंस्टीन को यहूदी होने के कारण एक धार्मिक समारोह में वक्ता के रूप में बुलाया जाता है !
जहां उन्होंने ये बहुचर्चित भाषण दिया था !

ये पंक्ति उनके पूरे भाषण की आखिरी लाइन है !

उनकी इन लाइनों को पूरे संदर्भ के साथ ही देखा जाना चाहिए 
उन्होंने कहा था 

"हालांकि धर्म जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करने का जरिया हो सकता है और इसके लिये उसे विज्ञानं के मार्गदर्शन की जरुरत भी नहीं है फिर भी हमें यह समझना होगा की धर्म द्वारा जीवन के निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में विज्ञान का क्या योगदान होगा ? लेकिन विज्ञान और इसके सिद्धांतों के साथ वही खड़ा हो सकता है जो सच्चाई और समझ की आकांक्षा से पूरी तरह ओत प्रोत हो । और भावना का यह स्रोत धर्म से ही पैदा होता है। इसके लिए इस संभावना में भी विश्वास की जरुरत है कि सृष्टि के अस्तित्व के लिए मान्य नियम कितने तर्कसंगत हैं, मैं इस गहन विश्वास के बिना एक सच्चे वैज्ञानिक की कल्पना नहीं कर सकता। अगर अपनी इस अवधारणा को मैं एक पंक्ति में व्यक्त करूँ तो मैं कहूँगा की धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बिना धर्म अंधा है !

उनके इस वक्तव्य के बाद दुनिया भर में आइंस्टीन धार्मिक गिरोहों के हीरो बना दिए गए क्योंकि उनकी इस बात से धार्मिक गिरोहों की झूठी मान्यताएं और ईश्वर पर आधारित शोषणवादी व्यवस्था पर वैज्ञानिक मोहर जो लग चुकी थी !

अब वे धर्म से असंतुष्ट लोगों को ये समझा सकते थे कि देखो जब इतने बड़े साइंटिस्ट धर्म के बिना विज्ञान को लंगड़ा बता रहे हैं तो तुम्हारी क्या औकात है धर्म की घृणित और पाखंडपूर्ण व्यवस्था से विरोध मत करो !

धार्मिक गिरोहों के खुश होने के साथ साथ आइंस्टीन से उनके इस वक्तव्य के कारण बहुत से वैज्ञानिक नाराज हो गए और उन्होंने आइंस्टीन को वैज्ञानिक के लिबास में छुपा हुआ कट्टरपंथी तक कह दिया !

 आखिरकार 8 साल बाद उन्हें सफाई देनी पड़ी 
अपने एक वैज्ञानिक मित्र को दिए जवाब में उन्होंने लिखा है !

यह निश्चित रूप से एक झूठ था जो आपने मेरे धार्मिक विश्वासों के बारे में पढ़ा था, ये एक ऐसा झूठ बन चूका है जिसे जानबूझ कर दोहराया जा रहा है। मैं निजी तौर पर किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करता हूं अगर मेरे अंदर कुछ है जिसे धार्मिक कहा जा सकता है तो वह प्रकृति के लिये उस सीमा तक नितांत प्रशंसा है, जहां तक हमारा विज्ञान इसे प्रकट कर सकता है।

-डुकास, हेलेन (1 9 81)। अल्बर्ट आइंस्टीन द ह्यूमन साइड। प्रिंसटन: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, पी। 43. आइंस्टीन अभिलेखागार 59-454 और 59-495

आइंस्टीन ने वर्ष 1955 में अपनी मौत से एक साल पहले भी जर्मन भाषा में एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने ईश्वर, धर्म पर अपने विचार रखे थे।

वर्ष 1921 में भौतिक विज्ञान के लिए नोबल सम्मान पाने वाले आइंस्टीन ने इस पत्र में लिखा कि मेरे लिए 'ईश्वर' शब्द इंसानी कमजोरी की अभिव्यक्ति से ज्यादा कुछ भी नहीं है। 

इस पत्र में उन्होंने क्या लिखा है खुद देख लीजिए 
वे लिखते हैं 

मैंने बार-बार कहा है कि मेरी व्यक्तिगत राय में किसी ईश्वर का विचार एक बालक की जिज्ञासाओं जैसा है। आप मुझे नास्तिक कह सकते हैं, लेकिन मैं पेशेवर नास्तिकों की जमात से खुद को अलग रखता हूँ !

- गाय एच। रानर जूनियर के लिए पत्र (28 सितंबर 1 9 4 9)

उनकी इन बातों से यह स्पष्ट है कि वह किसी भी ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास नहीं करते थे और विषयुद्ध रूप से नास्तिक थे और नास्तिक ही मरे !

ये है वैज्ञानिकों के आस्तिक होने का सच !

ईश्वर और धर्म के विषय मे स्पष्ट राय रखने वाले स्टीफन हौकिंग ने बहुत ही स्पष्टता से ईश्वर और धर्म का खंडन किया है और उन्होंने अपनी इस बात को अपनी किताबो के साथ साथ सार्वजनिक स्थानों पर भी कई बार निडरता पूर्वक व्यक्त भी किया है फिर भी कई धार्मिक गिरोह उन्हें भी अपने घृणित धार्मिक पोपगेंडे में फिट करने की जुगत ढूंढने में लगे हैं और हो सकता है कि वे कामयाब भी हो जायें क्योंकि धार्मिक गिरोहों की गिरफ्त में फंसी हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें एक जागरूक और तर्कशील मानव बनाने की बजाय धर्म का अंधभक्त बनाती है !

इसीलिए तथाकथित पढ़े लिखे दिखाई देने वाले लोगों का बौद्धिक लेबल इतना गिरा होता है कि वे धार्मिक बकवासों को भी सत्य मानकर उन्हें आजीवन ढोते हैं !

इसी के परिणाम स्वरूप हमारे समाज मे इतनी अराजकता गरीबी भूख कुपोषण और भ्रष्टाचार का आलम दिखाई देता है क्योंकि अंधभक्तों की संख्या वृद्धि से झुंड बनता है समाज नही !

ज्ञान संवेदना और सहयोग की सामूहिक समझ से ही बेहतर समाज का निर्माण हो सकता है जो मौजूदा धार्मिक व्यवस्था से कदापि संभव नही !

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