धर्म की तरह विज्ञान भी शोषणवादी है ? - तर्कशील भारत

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Tuesday, May 1, 2018

धर्म की तरह विज्ञान भी शोषणवादी है ?


हम जैसे नास्तिक विज्ञान को मानते हैं और इसके लिए नास्तिकों के पास सबसे बड़ा तर्क होता है कि धर्म ने दुनिया को सिवा बदहाली और अराजकता के कुछ नही दिया सभी धर्मों के झूठे दिखावटी और बनावटी सामाजिक मूल्यों के अंदर शोषणवादी व्यवस्था कायम की गई है जिसके द्वारा हजारों वर्षों से दुनिया को धार्मिक जहालत के अंधकार में धकेला जाता रहा है और इस काम मे दुनिया भर में सैंकड़ों अलग अलग धार्मिक गिरोह सक्रिय हैं !

 इसके उलट वैज्ञानिक सिद्धांत सत्य शोध और साधना पर आधारित होने के कारण मानवता को प्रगति के पथ पर आगे ले जाते हैं इसी वजह से जो लोग धार्मिक गिरोहों के षड्यंत्रों को समझ जाते हैं वे लोग खुद को धर्म की सड़ी हुई बेड़ियों से आज़ाद कर नास्तिकता के वैज्ञानिक पथ पर समाज को सही दिशा देने में जुट जाते हैं !!

लेकिन सवाल ये है कि क्या वास्तव में शोषणवादी धर्मों की सभी मान्यताओं को खारिज करते हुए विज्ञान के सिद्धांतों को पर आधारित एक बेहतर समाज बनाया जा सकता है ?

इस सवाल का जवाब है नही कभी नही 

सबसे बड़ी बात तो ये की विज्ञान कभी भी धर्म की जगह नही ले सकता क्योंकि इंसान चाहे कितना ही विकसित क्यों न हो जाये उसे किसी न किसी रूप में धर्म की जरूरत रहेगी !

इंसान कभी मरना नही चाहता इसीलिये मृत्यु मनुष्य का सबसे डर है लेकिन विज्ञान के पास इंसान के इस डर का कोई इलाज नही साइंस के अनुसार मरना तय है और मृत्यु के बाद आपका कोई वजूद नही आपके सभी रासायनिक तत्व जिनसे मिलकर आप बने हो आपकी मृत्यु के बाद वे सभी तत्व बिखर जाएंगे !

लेकिन धर्म के पास मृत्यु नामक इंसान के इस सबसे बड़े डर का इलाज है वो मृत्यु के बाद के जीवन की झूठी तसल्ली देता है हसीन सपने दिखाता है और आपको यकीन दिलाता है कि आपका वजूद कभी खत्म होने वाला नही !

इस मामले में शोषणवादी धर्म जीत जाता है सत्यवादी विज्ञान हार जाता है !

मानव जीवन के कई और पहलू हैं जिनपर विज्ञान चारो खाने चित हो जाता है और वहां धर्म हावी हो जाता है !


नास्तिक लोग विज्ञान को चाहे जो भी समझते हो लेकिन सच्चाई यही है विज्ञान कभी भी मानवीय था ही नही सत्य शोध और साधना पर आधारित विज्ञान भी धर्म की तरह शोषणवादी ही है विज्ञान के सिद्धांतों का धर्म से चाहे कितना ही बैर हो लेकिन सच्चाई यही है कि विज्ञान पूंजीवादी व्यवस्था की कठपुतली मात्र है और इस मामले में ये धर्म से दो कदम आगे बढ़कर दुनिया मे अराजकता बदहाली भूख कुपोषण और गरीबी को बढ़ा रहा है !

मैं आपको इसका कुछ उदाहरण देता हूँ दुनिया भर में भयंकर गरीबी है लेकिन विज्ञान के पास इस गरीबी का कोई समाधान नही है दुनिया भर में करोड़ो लोग बेघर और विस्थापित हैं उनके पास सर छुपाने को एक अदद झोपड़ी तक नही और विज्ञान के पास इसका कोई समाधान नही लेकिन पूंजीवादी में संसाधनों की मची लूट में बड़ा हिस्सा हथियाने वाले लोगों के लिए विज्ञान के द्वारा अंतरिक्ष मे होटल बनाया गया है जिसका एक दिन का किराया 5 करोड़ रुपये होगा !

इस होटल में एक बार मे 12 लोग ही जा सकेंगे 2021 में शुरू होने वाले इस होटल की एडवांस बुकिंग शुरू हो चुकी है और अब तक इस होटल में रात गुजारने के लिए 22 लाख लोग आवेदन भी कर चुके हैं !

मंगल पर अपना नाम भेजने के लिए भारत से 2 लाख लोगों ने आवेदन किया है और दुनिया भर से 28 लाख लोगों ने नासा से संपर्क किया है और एक आदमी के नाम को मंगल पर भेजने की फीस है 9 लाख रुपये !

ये है विज्ञान का कमाल !!

अभी और आगे देखिए 

पैसे चुकाकर शवों को सेक्स करते देखने का मौका!

जर्मनी के एक वैज्ञानिक ने एक ऐसी पहल की है, जिसके जरिए आप मरे हुए लोगों को सेक्स करते देख सकते हैं। अगर आप मृत लोगों को ऐसा देखना चाहते हैं तो फ्री में नहीं देख पाएंगे, बल्कि 20 डॉलर का खर्च करना पड़ेगा। अब तक ह्यूमन अनैटमी(शरीर रचना) में झांकने का काम सिर्फ मेडिकल स्टूडेंट्स सा प्रैक्टिशनर्स कर सकते थे लेकिन लॉस ऐंजिलिस के कैलिफॉर्निया साइंस सेंटर में कोई भी अडल्ट 20 डॉलर रुपये खर्च कर यह अनुभव प्राप्त कर सकता है। 

डेली बीस्ट में छपी खबर के मुताबिक, 'बॉडी वर्ल्ड्स: पल्स' नाम की दुनिया की सबसे बड़ी प्रदर्शनी में शवों को जीवंत पोज में रखा गया है। इस प्रदर्शनी में शरीर के करीब 200 ऑर्गन्स, बगैर चमड़ी वाले पूरे शरीर और पारदर्शी अंग सुरक्षित रखे गए हैं, जिन्हें प्लास्टिनेट किया गया है। प्लास्टिनेशन का काम प्लास्टिक इंजेक्शन प्रॉसेस के जरिए किया गया है जो पेटेंटेड है।  

 जहां-जहां इस प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है, मृत शरीर मोटी कमाई का जरिया बन गए हैं। 

72 वर्षीय वॉन हेगन्स ने 1975 में मानव शरीर की संरचना के नमूनों को सुरक्षित रखने के लिए टेक्नॉलजी इजाद की। 1993 में इन्होंने प्लास्टिनेशन के लिए इंस्टिट्यूट की स्थापना की और 1995 में अपने इस काम को कमर्शलाइज करना शुरू किया।

विज्ञान के इस आधुनिक युग मे मानवीय मूल्यों के लिए कोई जगह नही बची है इसीलिए कुछ लोग अपने परिजनों की लाशों को हेगन्स की कम्पनी को बेच देते हैं और हेगन्स नाम का ये वैज्ञानिक विज्ञान के नाम पर उन लाशों का शर्मनाक प्रदर्शन कर करोड़ों डॉलर का मुनाफा कमाता है 
 

हेगन्स की पत्नी प्रदर्शनी डिजाइन करती है !

और हैरानी की बात है कि सरकार ने इसे लीगलाइज भी कर दिया है क्योंकि मामला करोड़ो डॉलर की कमाई का है !

इसमे कोई दो राय नही की विज्ञान ने हमारा जीवन बेहतर बनाया है जटिल बीमारियों का इलाज ढूंढा है दुनिया की दूरियों को कम किया है और यूनिवर्स के रहस्यों पर से पर्दा उठाया है लेकिन आज भी रोजाना लाखों लोग बीमारियों से मर रहे हैं क्योंकि उनके पास इतनी पूंजी नही की वो अपने इलाज की महंगी कीमत चुका सकें हर साल लाखों लोग गोली बम और हवाई हमलों में मारे जाते हैं इन सबके लिए कौन जिम्मेवार है ? 


एक बेहतर समाज की परिकल्पना बेहतर सामाजिक मूल्यों के बिना नही हो सकती एक बेहतर सामाजिक व्यवस्था के निर्माण में विज्ञान की भूमिका बस इतनी होगी की वो इंसान के मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में इंसानी श्रम के साथ सहायक भूमिका अदा कर एक ऐसी व्यवस्था तैयार करे जिसमे प्रत्येक मनुष्य के पास रोटी कपड़ा रोजगार मकान शिक्षा और मनोरंजन का अवसर हो लेकिन ऐसे समाज को स्थाई रखने मे जिन मानवीय मूल्यों की जरूरत होगी विज्ञान वो कदापि नही दे सकता इसके लिए हमे फिर से एक नए और प्रतिकूल धर्म को गढ़ना ही पड़ेगा लेकिन समस्या ये है कि आगे चलकर यही धर्म आज के धर्मों की तरह ही शोषणवादी होकर समाज को छिन्न भिन्न कर देगा !

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