भारत की गरीबी का कारण "धर्म और धार्मिक व्यवस्था" - तर्कशील भारत

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Tuesday, April 3, 2018

भारत की गरीबी का कारण "धर्म और धार्मिक व्यवस्था"

भारत के केवल आठ राज्यों में इतनी गरीबी है जितनी की दुनिया के पचीस सबसे गरीब देशों में भी नहीं है ये वो गरीब देश हैं जो भारत के लगभग साथ ही आजाद हुए है भारत की लगभग आधी आबादी 50 रूपए रोज पर गुजरा करने को मजबूर है, देश में पचास किसान रोज आत्महत्या कर लेते है, पांच वर्ष से कम आयु के सात हजार बच्चे प्रतिदिन भूख और कुपोसन से लड़ते हुए मर जाते है, देश के 18 करोड़ लोग फुटपाथों पर और इतने ही लोग सड़ांध में जानवरों की जिंदगी जीने को विवश है, शिशु एवं स्त्री मृतुदर में भारत अपने पडोसी देसों की तुलना में खराब स्थिति में है 

गरीबी लगभग पूरी दुनिया मे है कोई भी देश वो बाहर से चाहे कितना भी सम्पन्न क्यों न दिखाई देता हो गरीबी वहां भी है नार्वे नीदरलैंड जापान स्कॉटलैंड जैसे मुल्कों को छोड़ कर पश्चिम के लगभग सभी सम्पन्न दिखाई देने वाले देशों में भी गरीबी है !

लेकिन भारत की भयंकर गरीबी की तुलना इन देशों की गरीबी से नही की जा सकती क्योंकि यहां की गरीबी घटते क्रम में है लेकिन भारत के हर कोने में गरीबी का भयंकर रूप दिखाई देता है चाहे शहर हो या गांव हर जगह भयंकर गरीबी पसरी हुई है ! 

बाहर के देशों में गरीबी का स्तर समय के साथ घटता हुआ दिखाई देता है क्योंकि इन देशों में यहां की सरकार के साथ साथ वहां के लोगों में गरीबी और गरीबों के प्रति संवेदना मौजूद है इसलिए वहां गरीबी घट रही है लेकिन भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश की गरीबी हर 20वे साल दोगुनी हो जाती है !

आखिर क्या वजह है कि देश की गरीबी बड़ी बड़ी सरकारी योजनाओं के बावजूद कम होती दिखाई नही देती 70 के दशक में इंद्रा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था लेकिन भारत से गरीबी नही हटी !

गरीबी के साथ देश मे चार और बड़ी समस्याएं है बेरोजगारी अशिक्षा भ्रस्टाचार और जनसंख्या गरीबी के साथ ये चारों समस्याएं आपस मे जुड़ी हुई हैं अगर गरीबी बढ़ेगी तो बेरोजगारी भी बढ़ेगी लोक यानी जनता में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ेगी तो तंत्र यानी प्रशाशन में भ्रष्टाचार बढ़ेगा भ्रष्ट तंत्र के कारण अशिक्षित समाज तैयार होगा और इस तरह पूरा लोकतंत्र बीमार हो जाएगा बेरोजगारी गरीबी भ्रष्टाचार और अशिक्षा की वजह से जनसंख्या बढ़ेगी और फिर ये चक्र एक दूसरे को तेजी से बढ़ाते हुए समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को अराजकता अत्याचार शोषण कुपोषण और अन्याय के दलदल में धकेलता चला जायेगा !

भारत मे यही हो रहा है 

भारत की गरीबी को इसके वर्तमान स्वरूप और स्थिति से नही समझा जा सकता अर्जुन सेन गुप्ता ने भारत की गरीबी के दो प्रमुख कारण बताए हैं उनके अनुसार देश के 77 प्रतिशत लोग गरीबी के सरकारी पैमाने से भी नीचले पायदान पर खड़े हैं उनके अनुसार इस भयंकर गरीबी का पहला कारण है 

1- भारत की एक बड़ी आबादी का सांस्कृतिक रूप से पिछड़ापन इसका अर्थ हुआ कि भारत की एक बड़ी आबादी के गरीब होने के पीछे एक लंबा इतिहास छुपा हुआ है !

दूसरा कारण जो उन्होंने बताया वो पहले वाले कारण को स्थाई रखने का ही विस्तार है उनके अनुसार सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा यह गरीब वर्ग परंपरागत रूप से सामाजिक भेदभाव का जबरदस्त शिकार भी रहा है !

अर्जुन सेन गुप्ता के बताए इन दोनों ही कारणों में भारत की गरीबी का रहस्य छुपा हुआ है !


लेकिन इस सच्चाई से मुंह मोड़ते हुए कुछ लोग देश की गरीबी का कुछ और ही कारण बताते हैं जैसे 

देश सदियों तक गुलाम था इसलिए आज गरीब है 

नेता भ्रष्ट थे इसलिए देश गरीब है 

इसी तरह के और भी अजीबोगरीब कारण बता कर गरीबी के मूल कारण को छुपाने की कोशिश की जाती है !

ये सच है कि हजारों वर्षों तक ये देश गुलाम रहा है लेकिन जो लोग गरीबी का कारण गुलामी को मानते हैं वो गलतफहमी के शिकार हैं क्योंकि दुनिया के ज्यादातर देश गुलाम रहे हैं और भारत के साथ ही उन्हें भी औपनिवेशिक गुलामी से आज़ादी मिली लेकिन तरक्की की दौड़ में आज वे देश हमसे कही आगे हैं !

नेता भ्रष्ट थे तो जनता क्या कर रही थी उन्हें चुनने का अधिकार तो जनता के हाथ में था लोक सही हो तो तंत्र भी सही होगा और लोक भ्रस्ट हो तो तंत्र भी भ्रष्ट हो जाएगा क्योंकि व्यवस्था चलाने वाले लोग समाज से ही निकल कर व्यवस्था में पहुंचते हैं !

इस तरह देश की गरीबी के ये दोनों ही कारण गलत साबित होते हैं !

तो सही कारण क्या है इतनी भयंकरतम गरीबी के लिए दोषी कौन है ?

इस सवाल के पीछे का असली सच और वजह धर्म पर आधारित हमारी सामाजिक व्यवस्था में छिपा हुआ जिसकी पड़ताल जरूरी है !

धर्म और त्योहारों के नाम पर आप एक साल का डेटा उठाकर देख लीजिए आपको पता चल जाएगा कि किस तेजी से संसाधनों का फेरबदल होता है !

लेकिन संसाधनों का ये फेरबदल धार्मिकता के नाम पर नीचे से ऊपर की ओर होता है इसलिए समाज का 90 प्रतिशत वर्ग सदा गरीब बना रहता है और दस प्रतिशत वर्ग संसाधनों का मालिक बना रहता है !

यही वजह है कि देश मे अरबपतियों की संख्या बढ़ती चली जा रही है !

धर्म के नाम पर हर साल देश के कीमती संसाधन खरबों रुपया मैन पावर कैसे बर्बाद किया जाता है इसका उदाहरण मैं आपको देता हूँ !

जनवरी से लेकर दिसंबर तक हर महीने कोई न कोई धार्मिक त्योहार जरूर होता है लेकिन हम बात करेंगे बड़े त्योहारों की जो देश की बर्बादी के प्रमुख कारण हैं ! 

होली का त्योहार ऐसा ही एक त्योहार है जिसके नाम पर करोड़ों टन लकड़ियां स्वाहा कर दी जाती है 

होली के बाद नवरात्रि के नाम पर नौ दिनों में भंडारा जागरण और देवी पूजा के नाम पर संसाधनों की जबरदस्त बर्बादी तो होती ही है साथ ही नौरात्री के बाद बची हुई करोड़ो टन पूजा सामग्री नदियों और तालाबों को बर्बाद करती हैं फिर इन नदियों की सफाई के नाम पर देश की गरीब जनता के खून पसीने की कमाई से करोड़ो का बजट पास किया जाता है !

और हैरानी की बात है कि नौरात्री का ये त्योहार साल में दो बार आता है !

साल में लगभग 15 ऐसे बड़े त्योहार भी होते हैं जिनमे बड़े पैमाने पर देश की नदियों को बर्बाद किया जाता है गणेश चतुर्थी विश्वकर्मा पूजा छठ पूजा जैसे त्योहारो के बाद तो नदियो और समुद्री किनारों का बुरा हाल कर दिया जाता है !

इन सबके साथ आता है कुर्बानी का त्योहार जिसमे धर्म के नाम पर करोड़ों बेजुबान जानवरों की हत्याएं की जाती हैं ! देश मे मुसलमानों की आबादी 20 करोड़ के आसपास है अगर बीस करोड़ लोग मिलकर बकरीद के नाम पर एक दिन में एक करोड़ पशुओं को भी मारते हैं तो यह कितनी बड़ी बर्बादी है ?

हर साल होने वाले दस दिन के दशहरे में देश का कितना श्रम और संसाधन बर्बाद होता है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि केवल दिल्ली की 15 रामलीला कमेटी का दस दिनों का बजट 1050 करोड़ से ऊपर है !

दशहरे के आखिरी दिन रावण दहन के नाम पर संसाधनों में आग लगाकर जो प्रदूषण फैलाया जाता है उसे और भयानक स्तर पर दिवाली का त्योहार पहुंचा देता है एक दिन में अरबों रुपयों को पटाखे के नाम पर आग में झोंक दिया जाता है !

संसाधनों की यह भयंकर बर्बादी घोर गरीबी को जन्म देने के लिए काफी है !

काल्पनिक ईश्वर और उसकी नकली किताबों की झूठी कहानियों के नाम पर एक साल में लाखों करोड़ रुपयों को बर्बाद कर दिया जाता है इस धार्मिक बर्बादी में संसाधनों का जो जबरदस्त फेरबदल होता है उसके परिणाम स्वरूप समाज का शोषक वर्ग और ताक़तवर होता जाता है समाज का एक बड़ा वर्ग वंचित बना रह जाता है !

इसीलिए शोषक वर्ग ऐसी शोषणवादी धार्मिक व्यवस्था को स्थाई बनाये रखने के लिए बड़ा जतन करता है लोगों में धार्मिकता बनी रहे इसके लिए धर्म की कट्टरता पर जोर देता है !

इसका परिणाम यह होता है कि धर्म के नशे में धुत्त लोगों की भीड़ हमेशा भीड़ बनी रहती है और भेड़ों की भीड़ से कभी समाज नही बनता बल्कि समाज बनता है संवेदना ज्ञान सही और गलत की सामूहिक समझ और बेहतर भविष्य के निर्माण की ओर वैज्ञानिक दृश्टिकोण से ...इनमे से कोई भी तत्व आपको भेड़ों की इस भीड़ में दिखाई नही देगा !

यही वजह है कि घोर गरीबी और अराजकता भरे माहौल में इंसानों की ये भीड़ भेड़ की तरह जीने की आदि हो चुकी है भेड़ो की इस भीड़ को फ़र्क़ नही पड़ता कि कोई भूख से मरे या कोई कुपोषण से ....

देश पर विदेशी कर्ज बढ़ रहा है आज के समय हमारे देश पर 32 लाख करोड़ का विदेशी कर्ज लदा हुआ है जो हर साल 3 से 4 लाख करोड़ की दर से बढ़ता चला जा रहा है इस भारी कर्ज का एक महीने का ब्याज ही 22 हजार करोड़ रुपए होता है !

देश पर हर साल चढ़ने वाले इस भारी कर्ज का कारण है ईमानदारी से टैक्स नही भरने की लोगों की प्रवित्ति और राजनेताओं उद्योगपतियों का भ्रष्टाचार !

देश को टैक्स देने में बेईमानी करने वाली जनता धर्म के प्रति कितनी ईमानदार है इस बात का अंदाजा आपको एक साल में देश के छोटे बड़े मंदिरों मजारों और दूसरे धर्मस्थलों पर चढ़ाये गए बेशुमार दौलत से हो जाएगा एक अनुमान के मुताबिक देश के छोटे बड़े पचास लाख मंदिर धार्मिक स्थल धार्मिक ट्रस्ट और 80 हजार मजारों पर एक साल में जितना चढ़ावा चढ़ता है वो देश पर लदे कुल कर्जे का दोगुना होता है मतलब अगर एक साल के लिए ये धार्मिक बर्बादी रुक जाए तो देश का पूरा कर्ज तो साफ होगा ही साथ ही करोड़ो बेघर गरीब बेसहारा लोगों की तक़दीर भी सदा के लिए बदल सकती है लेकिन जनता को धार्मिक लॉलीपॉप चुसाने वाला शोषक वर्ग कभी ऐसा होने नहीं देगा !

एक उदाहरण देखिए



सरकार ने गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए एक कोष बनाया था जिसका उद्द्येश्य था की समाज के सक्षम लोग गरीब और बेसहारा लोगों के उत्थान के लिए इस कोष में दान करें लेकिन आपको हैरानी होगी कि 5 साल में लोगों ने इस कोष में केवल 1680 रुपये दिए जबकि इस कोष के प्रचार प्रसार में ही सरकार के 1 करोड़ 22 लाख रुपये खर्च हुए थे !

ये है हमारे धार्मिक समाज की गरीबों के प्रति संवेदना दूसरी ओर अहमदाबाद के उमिया माता के मंदिर में केवल 7 घंटे में लोग 5 करोड़ रुपये चढ़ावे में दान कर देते हैं !

ये है हमारा भारतीय धार्मिक समाज जहां संवेदनशीलता केवल झूठे खुदाओं और नकली भगवानो के प्रति ही है इंसानियत प्रकृति और समाज के प्रति जनता की इस उदासीनता और बेरुखी की वजह क्या है ?

यहां गौर करने वाली बात ये है कि एक साल में धर्म के नाम पर लाखों करोड़ रुपयों के इस खेल से फायदा किसका होता है ?

सामाजिक धार्मिक व्यवस्था द्वारा धर्म के नाम पर सामूहिक रूप से की जाने वाली बर्बादी और राजनैतिक भ्रष्टाचार के कारण गरीबी कम होने के बजाय हर साल लगातार बढ़ती है गरीबी से पैदा होती है बेरोजगारी और गरीबी और बेरोजगारी मिलकर समाज मे अशिक्षा का माहौल पैदा करते है जिससे जनसंख्या बेतहाशा रूप से बढ़ती है ये मुख्य समस्याएं मिलकर समाज को अराजकता अन्याय शोषण और अपराध के घिनौने दलदल में धकेलती चली जाती हैं !

ऐसा समाज धीरे धीरे उपेक्षा और संवेदनहीनता के उस स्तर तक पहुंच जाता है जहां से केवल दो ही रास्ते बचते हैं एक अंतहीन गुलामी या फिर क्रांति ...

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