नारी सशक्तिकरण का सच !! - तर्कशील भारत

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Wednesday, December 6, 2017

नारी सशक्तिकरण का सच !!

स्त्री और पुरुष दोनों बराबर हैं क्या सचमुच ऐसा है ?

विकासवाद के नियमों में जीवन के विभिन्न आयामों का नर और मादा के रूप में विखंडन जीवन के चिरस्थाई सफल आस्तित्व के लिए आवश्यक था इसलिए जीवन के शुरूआती अणुओ ने खुद को नर और मादा में बदल लिया !

सभी जीवों में नर और मादा मिल कर विकासवाद के अनिश्चित भविष्य में अपनी प्रजाति के शशक्त आस्तित्व के लिए संघर्षरत होती हैं यही विकासवाद हैं प्रकृति ने दोनों को अलग अलग लेकिन बराबर शक्तियां प्रदान की हुई हैं इसमें कोई किसी से कम नहीं है नर की अपनी सीमायें हैं तो मादा की अपनी लेकिन दोनों की क्षमताएं बराबर होते हुए भी अलग अलग हैं !

शेर शिकार नहीं करते , ये काम शेरनियां करती है वही लकड़बग्घों में इसके उलट नर शिकार करते है और मादाएं बच्चों को संभालती है यहाँ दोनों प्रजातियों में नर और मादा का काम किसी से भी कम या ज्यादा नहीं है लेकिन फिर भी काम अलग अलग है !

इसी प्रकार मनुष्य में स्त्री और पुरुषों का महत्त्व किसी से भी कम या ज्यादा नहीं है फिर भी प्रकृति ने दोनों को अलग अलग स्वरूपों में विकसित किया है क्यों ?

क्योंकि स्त्री पुरुषों से किसी क्षेत्र में कमतर नहीं फिर भी दोनों के कार्य एक जैसे नहीं हो सकते यदि ऐसा होता तब शारीरिक बनावट में अंतर क्यों होता ?

स्त्री लड़ाकू विमान उडा सकती है लेकिन इस काम में निपुणता पुरुष ही हासिल कर सकता है क्योंकि इस कार्य में निर्णय लेने की जो त्वरित क्षमता चाहिए वह स्त्री की अपेक्षा पुरुष में ज्यादा है मतलब यह कार्य स्त्री के मुकाबले पुरुष ज्यादा बेहतर कर सकता है मानव मस्तिष्क पर शोध करने वाले जर्मन मनोवैज्ञानिक कोर्निक स्मिथ का मानना है की "मानव के स्त्री और पुरुष दोनों मस्तिष्क में अंतर ही दोनों के स्वभाव की भारी विसमताएँ पैदा करता है "

यह अंतर ही दोनों के कार्य का विभाजन करता है पुरुष एक अच्छा पाइलट साबित हो सकता है लेकिन जरुरी नहीं की वह एक अच्छा शिक्षक भी साबित हो , यह भी हो सकता है की एक बहुत बड़ा व्यवसाई प्राथमिक कक्षा के बच्चों को पढ़ाने के काबिल न हो और घर की चारदिवारी में चौका बेलन करने वाली एक स्त्री , पूरी एक यूनिवर्सिटी को डीन की भूमिका में सफलतापूर्वक चलाने में अपनी दक्षता दिखा दे !!

विदेशों में स्त्री और पुरुषों के इस मनोविज्ञान को बखूबी समझा गया है और दोनों का कार्य विभाजन दोनों के इस मनोविज्ञान को सामने रख कर ही किया जाता है !

पूँजीवाद के इस दौर में नारीवाद के नाम पर हजारों करोड़ का बिजनेस चालू है लड़कियों को आत्मनिर्भर होना चाहिए उनमे आत्मविश्वाश होना चाहिए इसलिए उन्हें फलां चीज पहननी चाहिए फलां पाउडर लगाना चाहिए कौन से जूते कौन सी नेलपोलिश आज के दौर में यह सब विज्ञापन तय कर रहे है !

अमेरिका में स्त्री शशक्तिकरण के नाम पर उन्हें सिगरेट पीने के लिए उकसाया गया इसके विज्ञापन पर एक वर्ष में 16800 करोड़ डॉलर का विज्ञापन वहां की मिडिया को मिला जिससे लाखों करोड़ डॉलर का मुनाफा सिगरेट और शराब की कंपनियों ने उठाया !

पूँजी वाद की अंधी दौड़ में महिला शशक्तिकरण के नाम पर पूँजी बनाने का घिनौना खेल चल रहा है जिसे अज्ञानतावष नारी अपना शशक्तिकरण समझने की भूल कर रही है नारी देह का बाजारीकरण उसे कभी शशक्त नहीं बना सकता बल्कि शशक्तिकरण के नाम पर नारी को बाजारू जरूर बना रहा है !

नारी का शशक्तिकरण तभी संभव है जब वह अपने ऊपर थोपी गई वर्षों पुरानी पुरुषवादी धार्मिक परम्पराओं मान्यताओं और संस्कृतियों की बेड़ियों को अपनी शिक्षा और ज्ञान से काट डाले !!

-शकील प्रेम 

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