हाँ मैं बिहारी हूँ और चावल खाता हूँ..... - तर्कशील भारत

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Sunday, December 10, 2017

हाँ मैं बिहारी हूँ और चावल खाता हूँ.....

बाढ़ गरीबी और बेरोजगारी से परिवार को राहत पहुंचाने की आशा में 14 -15 वर्ष की आयु में हम जैसे ज्यादातर बिहारी गांव छोड़ने पर मजबूर होते हैं ! कमाने की चाह में ट्रेन में ठुसा कर शहरों में जैसे तैसे पहुंच ही जाते हैं और यहां अपने छोटे कंधों पर बड़े बोझ ढोने की तैयारी में पूरी लगन से जुट भी जाते हैं !
बाबुओ की गारी ठेकेदारों की मनमानी और मकानमालिकों के काले कानूनों को सहते हुए हम अपने परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करने की चाहत में शहरों को बनाते चले जाते हैं ! इसके बावजूद शहर की सभ्य संस्कृति में हम बिहारी मजदूरों के लिये तिरस्कार के सिवा कुछ नही ! 

मुम्बई में हम वहां की गंदी राजनीति का शिकार होकर पिटे जाते हैं तो देश की राजधानी दिल्ली में हमे  "ओये बिहारी" "साला बिहारी" या "ओये चावल" "साला चावल है" जैसे शब्दों से नवाजा जाता है !!

एक बिहारी मजदूर के इसी दर्द पर आधारित है यह चंद लाइनें !!

अगर आपके दिल के किसी कोने को मेरी ये पंक्तियां छूती हैं तो इसे दूसरे तक जरूर पहुंचाएं !!

हाँ मैं बिहारी हूँ और चावल खाता हूँ.....

बिहारी होना मेरी पहचान है और चावल खाना मेरी प्रवित्ति है !

मैं जो चावल खाता हूँ वो तुम्हारे आटे से सस्ती नही होती 
बल्कि मेरे चावल वाली थाली तुम्हारे रोटी वाले डिनर से महंगी होती है 
फिर भी तुम चावल पे हंसते हो तो सुन लो......

कंक्रीट की जिन इमारतों में तुम रहते हो 
उसे चावल खा कर हमने ही बनाया है 

कंक्रीट के बडे बडे जंगल
जिसे तुम शहर कहते हो 
उसे हमने ही उगाया है 

जिसके एक्सीलेटर पर चढ़कर
तुम अमेरिका में होने का अहसास करते हो न
वो शॉपिंग मॉल भी हमने ही बनाया है

जिन सड़कों पर तुम अपनी
मोटरकार चलाते हो न 
वो भी हमने ही तुम्हे दिया है 

जिन मल्टीप्लेक्स में जाकर
तुम हॉलीवुड या बॉलीवुड को निहारते हो न
उसे भी हमने ही सजाया है 

जिन दड़बेनुमा 
दो तीन चार कमरे की छोटी सी जगह को 
तुम अपना 
टू थ्री और फ़ॉर बीएचके नाम देते हो न
उतनी जगह में तो हमारे पशु हगते हैं 

तुम्हारे शहरों को गढ़ने का
हमे भी कोई शौक नही है
तुम्हारे लिये
कंक्रीट के जंगलों को उगाने की 
हमे जरूरत क्या है ?

लेकिन मजबूर हैं 
इसलिए तुम्हारे मजदूर हैं 

अगर बिहार में 
रोजगार होता

तो हम भी 
पलायन को मजबूर न होते
घर से इतनी दूर न होते 

तुम्हारे शहरों की तंग गलियों में
छठ न मनाते

तुम्हारे जेलनुमा 
छोटे और महंगे कमरों का 
इतना मोटा भाड़ा भी न देते 

हम बिहारी हैं 
इतने छोटे कमरों में तो 
हम मूतने भी न जाते 

तुम्हे हमारी सूरतें बुरी लगती हैं
तुम्हे हमारा रहन सहन पसंद नही 

हमारा खानपान तुम्हे अखरता है 
तो सुनो

तुम जाहिल हो 
कोट पेंट और सूट बूट वाले गंवार हो 

शहर के अखबारों में 
रोज बलात्कार के किस्से पढ़ते हो 

जरा बताओ तो 
आजतक कितने बिहारियों ने रेप किया है 

पिछले सभी अखबारों के 
पन्ने भी चाट लेना 
खूब अच्छी तरह देख लेना 
एक भी बिहारी 
बलात्कारी नही मिलेगा 

जबकि 
तुम्हारे शहरों में 
छोटी छोटी बच्चियों तक से 
बड़े बड़े कारनामे होते हैं 

इन कारनामों को अंजाम देने वाले 
तुम्हारे ही सभ्य समाज के लोग होते हैं 

बिहारी गरीब जरूर होता है
लेकिन वो 
नियत का इतना गिरा हुआ नही होता
बिहारी चावल जरूर खाता है 
लेकिन वो हरामखोर नही होता 

यही बिहारी की पहचान है

अरे मेरी गरीबी से चिढ़ने वालों
मेरे मजदूर होने पर हंसने वालों

नजर उठा कर देखो 
तुम्हारे खूबसूरत शहरों के बीचोबीच

तुम्हारे विकास के व्यस्त चौराहों के बीच
सैंकड़ो मासूम बच्चे 
हाथ मे नकली रोजगार लिए
तुम्हारे गाड़ियों के शीशे साफ करते हुए
तुमसे दो रुपये की भीख मांगते हैं

लेकिन तुम इतने प्रगतिशील और सभ्य हो
की उन्हें देखते ही
गाड़ी के शीशे चढ़ा लेते हो

मेरे बिहारी होने पर तुम हंसते हो
अब मैं तुम पर हँसता हूँ

हंसता हूँ नही बल्कि 
तुम्हारी इस संवेदनहीनता पर थूकता हूँ

गौर से देख लेना इन्हें भी
इन लालबत्तियों पर 
बिलखते इन मासूम बच्चों में 
एक भी बिहारी नही होगा

किसी मजदूर की 
मजबूरी का मजाक उड़ाने वाले
उसे बिहारी और चावल कह कर चिढ़ाने वाले
तुम जैसे जाहिलों से 
इन बेबस और लाचार बच्चों की 
अवहेलना के सिवा 
और क्या उम्मीद की जा सकती है !

तुम किसी मासूम बच्चे की 
बेबसी को नही समझ सकते
तो एक मजदूर की भावनाओ को 
क्या खाक समझोगे ?

तुम्हारे शहरों की सड़ांध भरी
चकाचौंध के पीछे का सच 
मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ

तुम्हारे अय्याशी के अड्डों को भी 
मैंने देखा है
जिसे तुमने बनाया है 

इन अड्डो पर तुम 
अपनी सभ्यता की 
केंचुली उतारने पहुंचते हो

और चन्द कागज के टुकड़ों में 
किसी बच्ची के जिस्म को
भूखे भेड़िये की तरह नोच खाते हो
मासूम कलियों को
अपने पुरुषवादी वहम से
रौंद डालते हो 

लेकिन कभी तुमने गौर किया है 
जिन औरतो के जिस्म से तुम अपनी
हवस की आग बुझाते हो 
उनमे एक भी बिहारन नही होगी

क्योंकि एक बिहारी 
अपना पसीना बेच सकता है 
लेकिन अपना जमीर कभी नही बेचता 

किसी अबला के जिस्म को 
तार तार करने वालों 

यही है तुम्हारी सभ्यता
यही है तुम्हारा वो असली रूप 
जिसे छुपा कर तुम सभ्य बनते हो

और बाहर से मजबूरी में आने वाले 
मजदूर को 
तुम बिहारी कहते हो 
चावल कहते हो 

किसी की गरीबी का 
मजाक उड़ाने का हक़ 
तुम्हे किसने दिया ?

क्या तुम्हारा कोई गांव नही
अगर तुम भी 
भारत के किसी हिस्से से आकर 
जुगाड़ से शहरी बन बैठे हो 

तो पहले जाकर अपने उस गांव को देखो
क्या वहाँ की गरीबी को तुमने खत्म कर दिया है ?

अगर वहाँ आज भी गरीबी है 
तो धिक्कार है तुम्हारे शहरी होने पर

तुमने उनके लिए क्या किया ?

फिर तुम्हे किसी बिहारी पर 
हंसने का अधिकार किसने दिया ?

जाओ पहले अपने गांव को बेहतर करो
फिर किसी बिहारी की गरीबी का 
मजाक उड़ाना 

लेकिन तुम क्या खाक कुछ बदलोगे 
तुम्हारे पास बदलने के लिए कुछ है ही नही 

तुम इतने ही प्रगतिशील हो तो 
दुनिया को अपने ज्ञान से 
कुछ बना के दिखाओ
कुछ उड़ा के दिखाओ

लेकिन तुम सिर्फ किसी इंसान का 
मजाक उड़ा सकते हो
और किसी इंसान का 
मजाक बना सकते हो 

दुसरो पर हंस सकते हो
दुसरो को नीचा दिखाने की 
कसरत कर सकते हो बस

यही तुम्हारी असली औकात है 
देशी विदेशी कम्पनियों की 
चाकरी और दलाली करने के लिये
तुम पढ़े लिखे बने हो 
उनकी फैंकी जूठी हड्डियों को 
चाटने को ही तुम जॉब कहते हो

यही तुम्हारी असलियत है 

तुम्हे बिहारियों से नफरत है 

मुझे तुमसे और 
तुम्हारी इस मानसिकता से नफरत है

अगर तुममे हिम्मत है 
तो आओ हम सब मिलकर 
कुछ ऐसा करें कि 

कोई मजबूर न हो 
कोई मजदूर न हो

देश का कोई बच्चा 
हाथ मे कपड़ा लिए 
गाड़ियों के शीशे न खटखटाये

बल्कि हर बच्चे के हाथ मे
कलम हो कॉपी हो संस्कार हो
हर युवा के हाथ मे रोजगार हो 

लेकिन तुम ऐसा कभी नही सोचोगे
क्योंकि तुम्हारी मानसिकता में 
मानवता नाम की कोई चीज नही

मैं मजदूर हूँ लेकिन तुम एक गुलाम हो
इस मामले में मैं तुमसे बेहतर हूँ 

इसलिए मुझे गर्व है कि मैं बिहारी हूँ और चावल खाता हूँ

मेरे बिहारी होने का 
मुझे कोई मलाल नही 
बल्कि मुझे गर्व है 
कि मैं उस बिहार से हूँ 
जहां से बुद्ध जैसी हस्तियों ने
पूरी दुनिया को ज्ञान का दीपक दिया 

मैं उस बिहार से हूँ
जहां से सम्राट अशोक ने 
दुनिया को शांति का पाठ पढ़ाया

मैं उस बिहार से हूँ
जहां कभी दुनिया का 
सबसे बड़ा विश्वविद्यालय था

मैं उस बिहार से हूँ
जहां से गांधी ने 
अपना सत्याग्रह शुरू किया

मैं उस बिहार से हूँ
जहाँ शेर शाह जैसे बादशाह हुऐ
जिसने बाबर और हुमायु को धूल चटाई थी 

मैं उस बिहार से हूँ
जो कभी पूरे एशिया का राजनैतिक केंद्र था 

मैं उस बिहार से हूँ 
जहां आज भी संस्कार जिंदा है

मैं उस बिहार से हूँ जहां आज भी
व्यवहार जिंदा है 

मैं उस बिहार से हूँ
जहाँ आज भी प्यार जिंदा है

मैं उस बिहार से हूँ 
जहाँ शब्दों में भी मिठास है 

मैं उस बिहार से हूँ 
जहाँ हर आंखों में आस है 

एक दिन बिहार जरूर बदलेगा 
एक दिन बिहार जरूर बदलेगा

और जिस दिन बिहार बदल गया 
उस दिन तुम्हे चावल का असली भाव पता चल जाएगा !!

शकील प्रेम 

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