ताजमहल किसने बनवाया ? Who Really Built The TAJMAHAL - तर्कशील भारत

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Friday, November 24, 2017

ताजमहल किसने बनवाया ? Who Really Built The TAJMAHAL

ताजमहल किसका है ?

क्या है सच्चाई ?
सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि ताजमहल पर राजनीति करने वाले कुछ लोगों की वजह से विदेशों में भी भारत की बहुत किरकिरी होती है क्योंकि ताजमहल भारत ही नही बल्कि पूरे विश्व की धरोहर है इसलिए ये इमारत वर्ल्ड हेरिटेज की सूची में सबसे ऊपर है !

ताजमहल किसी आजम खां के बाप की जागीर नही और किसी ओबैसी के दादा की कब्र नही ये भारत की पहचान है देश की अनमोल धरोहर है जिसे साम्प्रदायिक शक्तियों के घिनौने इरादों से बचाना सरकार का दायित्व है !

ताजमहल में नमाज पढ़ने का मतलब क्या है ? ताजमहल कोई मस्जिद नही जिसे नमाज पढ़नी है वो मस्जिद में पढ़े जिसे कुरान पढ़ना है वो अपने घर पढ़े ये किसी मुसलमान की बपौती नही किसी हिन्दू का मंदिर नही और किसी ईसाई का चर्च नही है ये खूबसूरत इमारत हमे देश के उन बहादुर मजदूरों की याद दिलाती है जिन्होंने बिस साल लगातार यहां अपना खून और पसीना बहाया !

ताजमहल हमारे लोकतांत्रिक देश के विविधता में एकता का प्रतीक एक विरासत है जिसे संजो कर रखना भारत के हर नागरिक की जिम्मेदारी है !

जो लोग देश की इस विरासत को कलंक कहते हैं वे लोग मानसिक रूप से बीमार हैं उनकी जगह संसद नही बल्कि पागलखाना है !

ताजमहल अपने निर्माण के साथ ही यह दुनिया के आकर्षण का केंद्र बन गया ! जीन बैप्टिस्ट टैवर्नियर उन शुरुआती यूरोपियन्स में से एक थे जिन्होंने ताजमहल को बनता देखा था इसके बाद के कालखंड में मुग़ल साम्राज्य कमजोर होता चला गया और देश पर ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज कायम हो गया ताजमहल के निर्माण के केवल सौ वर्षों बाद ही पूरे भारत पर राज करने वाली मुग़ल सल्तनत लाल किले की दीवारों के बीच सिमट कर रह गई !

इस बीच ताजमहल की सुध लेने वाला भी कोई नही बचा 1830 में लार्ड विलियम बेंटिक ने ताजमहल के पत्थरों को नीलाम करने का मन बना लिया लेकिन कम्पनी के आला अधिकारियों की इजाजत नही मिलने के कारण उन्हें अपना यह इरादा छोड़ देना पड़ गया !

1861 में आर्कियोलोगिकल सर्वे ऑफ इंडिया का गठन हुआ और अलेक्जेंडर कनिंघम इसके पहले अध्यक्ष बने इसके बाद ही भारत में इतिहास को समझने के लिए बड़े पैमाने पर ऐतिहासिक इमारतों की जांच शुरू की गई साथ ही उत्खनन का काम भी आरम्भ हुआ इसी प्रक्रिया में हड़प्पा मोहनजोदड़ों सहित देश के अलग अलग कोनो में बड़ी बड़ी खोजे हुई !

अंग्रेजों के समय ताजमहल का इतिहास उतना पुराना नही था उनके पास ढेरों दस्तावेज मौजूद थे जिससे उन्हें इस बात पर कोई संदेह नही था कि ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था ताजमहल के निर्माण से पूर्व आगरे में किसी तेजो महालय शिव मंदिर का कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नही है और न ही ताजमहल के पूर्व यानी 1630 से पहले आगरा आने वाले किसी भी अंग्रेज ने ऐसा कोई संस्मरण दिया है !

ताजमहल के बनने से पहले दूर दूर से आगरा आने वाले बड़े व्यापारियों के रिकॉर्ड भी उपलब्ध है जो दूरदराज से अपना माल लेकर आगरा पहुंचते थे और आगरे में अपना माल बिकने तक रुकते भी थे उनमें से कई व्यापारियों ने आगरे में बिताए अपने दिनों को याद करते हुए डायरी लिखी है उनके संस्मरणों में आगरे की छोटी छोटी जगहों का भी जिक्र है लेकिन तेजो महालय जैसे भव्य शिव मंदिर का कोई उल्लेख नही है !

साथ ही आगरे में 500 साल से भी पहले से रहने वाले कई ऐसे वैश्य परिवार हैं जो आगरे में किसी तेजोमहालय शिव मंदिर की बात को कोरी गप्प करार देते है क्योंकि ताजमहल के पूर्व का इतिहास उनके पूर्वजों के व्यक्तिगत रिकॉर्ड में दर्ज है !

इन सभी सबूतों के बावजूद आज अचानक ऐसा कौनसा उत्खनन हो गया जिसके आधार पर ये दावा किया जा रहा है कि ताजमहल से पहले वहां पर तेजोमहालय था ?

कहा जाता है किसी झूठ को सौ बार बोलो तो लोग उसे सही समझने लगते है !

ताजमहल को तेजोमहालय साबित करने का सबसे पहला प्रयास पुरषोत्तम नागेश ओक ने किया उन्होंने एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था "ताजमहल एक शिव मंदिर" इस किताब में उन्होंने दावा किया था ताजमहल एक शिव मंदिर था हालांकि अपने दावे को सच साबित करने के लिए उन्होंने एक भी वैज्ञानिक प्रमाण नही दिया है फिर भी उनके इस झूठ पर आधारित दावे को खूब प्रचारित किया गया लगभग चार दशक तक लाखों करोड़ों बार ताजमहल के बारे में झूठ के इस पुलिंदे को किताब की शक्ल में लोगो तक पहुंचाया गया !

आज आलम यह है कि आप गूगल पर टाइप कीजिये ताजमहल हजारों लाखों की संख्या में ऐसे कोटेशन वहां मिल जाएंगे जो ओक की किताब को आधार मान कर ताजमहल को शिवमंदिर बताने पर उतावले हैं !

अब ओक के इस दावे को आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया एक झूठा प्रचार कहती है ! 

ओक ने अपनी किताब में तेजोमहालय के बारे में अपनी कल्पना के आधार पर बहुत से दावे किए हैं !

उनके इन दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नही है आइये उनके कुछ दावे की पड़ताल कर लेते हैं !

ओक साहब लिखते हैं कि किसी पवित्र स्थान पर चप्पल जूते उतार कर जाने की परंपरा मंदिरों में होती है किसी मकबरे की नही"
देश में ही ऐसे सैंकड़ों हजारों मकबरे हैं जहां लोग चप्पल जूते पहन कर नहीं जाते फिर ओक साहब ने ये झूठ किस आधार पर बोला पता नहीं !

आप बताइए कि क्या इस झूठे आधार पर ताजमहल के प्रामाणिक इतिहास को बदला जा सकता है ?

उनका दूसरा दावा है कि ताजमहल के गुम्बद पर जो लोहे का स्तम्भ गाड़ा गया है उसमें नारियल का चिन्ह है जो किसी मंदिर के शिखर पर ही स्थापित किया जाता है !

अब आइये उनके इस दावे की पड़ताल भी कर लेते हैं !

ताजमहल के गुम्बद पर जो स्तम्भ लगा है वो ताजमहल का असली स्तम्भ नही है !

ताजमहल के बनने के बाद से आजतक इसमे बहुत से बदलाव भी होते रहे हैं 1857 कि क्रांति के दौरान इस इमारत को बहुत क्षति पहुंचाई गई थी इस दौरान इसकी दीवारों में जड़े हुए बेशकीमती पत्थरों को अंग्रेजों ने निकलवा लिया था साथ ही इसके शिखर पर स्थित स्तम्भ को सोने का स्तम्भ समझकर उसे वहां से उखाड़ लिया गया था इसके बाद करीब 30 वर्षो तक ये भव्य इमारत युही ही उजड़ी हुई खड़ी रही सन 1892 में उस समय भारत के वायसराय जार्ज नैथिनीयल कर्जन ने asi को ताजमहल के जिर्णोदार की बड़ी परियोजना प्रदान की ! 

ताजमहल के निर्माण के बाद कि ये सबसे बड़ी निर्माण प्रक्रिया थी जो 1908 तक चली ! 

16 वर्षों तक चले मरम्मत के इस काम के कारण ताज का पूरा स्वरूप ही बदल गया इसी प्रक्रिया में ताज के बहुत से क्षतिग्रस्त पत्थरों के साथ साथ इसके गुम्बद पर नया लोहे का स्तम्भ लगाया गया ! इसी बदले हुए स्तम्भ को ओक साहब अपनी किताब में मंदिर का स्तम्भ बताते हैं !

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1942 में ताजमहल को बल्लियों और फट्टियों से घेर कर सुरक्षा प्रदान की गई थी ये जर्मनी और जापान के बमों से बचाने के लिए बनाया गया था इसे लगाने और उतारने की प्रक्रिया में भी ताजमहल के गुम्बद को क्षति पहुंची थी जिसे बाद मे ठीक किया गया !

ओक का एक दावा यह भी है की ताज के गुम्बद से नीचे की ओर पानी की बूंदे टपकती है ओक का मानना है कि पहले शिवमंदिर होने के कारण कब्र के स्थान पर शिवलिंग स्थापित था जिसपर ऊपर से पानी की बूंदे टपकने की व्यवस्था की गई थी !

अब आइये इस दावे की पड़ताल भी कर लेते हैं !

दुनिया भर में ऐसा कोई भी मंदिर नही है जिसमे गुम्बन्द की ओर से नीचे शिवलिंग पर पानी की बूंदे टपकती हों !

साथ ही दुनिया मे ऐसा कोई मंदिर नही है जिसकी चार मीनारे हों !

1892 से 1908 के बीच हुए ताज के कायाकल्प के दौरान और गुम्बद की छड़ बदलने की प्रक्रिया में कुछ ऐसी खामी हो गई थी जिससे तेज बारिश के दौरान ऊपर लगे स्तम्भ की बुनियाद में पानी रिसते हुए नीचे टपकता था ये तभी होता था जब लगातार मूसलाधार बारिश होती थी बारिश से इसके पूरे गुम्बद में भी सीलन आ जाया करती थी जिसे बाद में ठीक किया गया !

यह भी एक तथ्य है कि गुम्बद की ओर से नीचे टपकते पानी की बूंदे आज तक किसी ने भी देखी नही थी फिर भी सीलन के कारण उसकी मरम्मत की गई और गुम्बद की इस सीलन को 1908 के बाद ही दर्ज किया गया था 1857 से पहले गुम्बद से नीचे की ओर पानी की बूंदे टपकने का और गुम्बद की सीलन का कोई रिकॉर्ड नही है इससे यह साबित होता है कि 1857 की क्रांति के दौरान हुई क्षति से ही गुम्बद से पानी की बूंदे टपकना शुरू हुआ था !

ओक का एक दावा ये था जो आज भी कुछ लोग तोते की तरह रटे हुए हैं देखिये की मुग़ल जहां से आए वहाँ आज भी मिट्टी के घर है अगर मुग़ल इतने ही रचनात्मक थे तो क्यूँ नहीं उन्होने अपने देश मे ऐसी इमारतें बनवाई ?

फरगना से बाबर आया था जिसे अब्राहम लोधी को हराने के लिए रिश्वत देकर बुलाया गया था 1526 में पानीपत के युद्ध मे अब्राहम लोधी को हराकर बाबर खुद लोधी की गद्दी पर बैठ गया और इस तरह भारत मे मुग़ल सल्तनत की नींव पड़ी जो 1857 तक कायम रही !

उज्बेकिस्तान के फरगना घाटी के शाशक उमर शेख मिर्जा का लड़का बाबर जिसे 1506 में शेर शाह सूरी ने हरा दिया था इसी बाबर द्वारा स्थापित मुग़ल सल्तनत की चौथी पीढ़ी का शाशक था शाहजहाँ जिसने ताजमहल सहित कई भव्य इमारतों का निर्माण करवाया था !

जैसा प्रचारित किया जा रहा है कि मुग़लों के अपने देश उज्बेकिस्तान में आज भी मिट्टी के टीले हैं तो श्री मान जी अपना जनरल नॉलेज ठीक कर लिजिए क्योंकि उज्बेकिस्तान में बाबर से भी पहले की करीब 120 ऐतिहासिक इमारते मौजूद हैं जिनमे से करीब 5 तो वर्ल्ड हेरिटेज की सूची में भी शामिल हैं !

धीरू भाई अम्बानी गुजरात के थे और उनके बेटे मुकेश अम्बानी ने मुम्बई में 51 अरब की लागत से भव्य इमारत बनवाया ! अब तीन चार सौ साल के बाद कोई कहे कि इस बिल्डिंग को मुकेश अम्बानी कैसे बनवा सकता है क्योंकि उसका बाप तो गुजरात के छोटे से गांव से आया था जहां आज भी कोई ऊंची बिल्डिंग नही !

ऐसी ही हास्यास्पद और बेसिरपैर की बातों को ओक साहब ने ताजमहल को तेजोमहालय साबित करने के लिए दलील के रूप में सुप्रीम कोर्ट में पेश किया था सुप्रीम कोर्ट में asi के वकीलों ने ओक साहब के एक एक झूठ को सबूतों के साथ नंगा कर दिया था और सन 2000 में ओक साहब की ओर से दाखिल ताजमहल को तेजोमहालय साबित करने की उनकी याचिका को खारिज कर दिया ! और कोर्ट ने कहा की उनके दिमाग में ताज को लेकर कोई कीड़ा है।

लेकिन अब फिर से उनका वो भूत बोतल से बाहर आ चुका है !

ताजमहल के बारे में एक और झूठ जो बहुत समय से फैलाया जा रहा है कि ताजमहल बनने के बाद शाहजहाँ ने इसके मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे ताकि दूसरा ताजमहल न बन सके !

आइये थोड़ी इस बात की जांच भी कर लेते हैं !

कोई भी बिल्डिंग या स्ट्रक्चर का निर्माण बेशक मजदूर ही करते हैं लेकिन ये मजदूर सिर्फ मजदूर ही होते हैं वे सिर्फ ठेकेदार और इंजीनयर के निर्देशों का पालन करते हुए काम करते हैं !

एक बिल्डिंग के निर्माण में काम करने वाले सारे मजदूर मिलकर भी वैसी दूसरी बिल्डिंग नही बना सकते !

लेकिन उस बिल्डिंग के आर्किटेक्ट या इंजीनियर्स चाहे तो वैसी कई बिल्डिंग दुबारा बना सकते हैं !

शाहजहाँ को हाथ कटवाना ही था तो वो उन आर्किटेक्ट और इंजिनिअर्स का हाथ कटवा देता जिन्होंने ताजमहल का नक्शा तैयार किया था या जिनकी देखरेख में इसका निर्माण पूरा हुआ था !

सोचने वाली बात यह भी है कि इंजीनियर्स निर्माण के दौरान एक ईंट भी खुद से नही जोड़ते तो उनके हाथ कटवा देने का कोई औचित्य ही नही बनता इससे ये बात भी झूठी साबित होती है कि ताजमहल के बीस हजार मजदूरों के हाथ काट दिए गए थे !

भारत विभिदताओ का देश है यहां हजारो सालो से लोग बाहर से आकर बसते रहे हैं सर्वप्रथम करीब 76 हजार वर्ष पहले एक अफ्रीकी यूरोपियन कबीले ने भारत को बसाया उसके बाद के कालखंडों में भी हजारों वर्सो तक यूरोप और एशिया से आने वाले कई छोटे बड़े कबीले यहां बस्ते रहे !

करीब 3800 वर्ष पहले यहां ईरान से आये आर्य नामक कबीले के लोग भी भारत की इस विविधता में समा गये ! 

इसके बाद भी यहां कई कबीले आये और भारत का हिसा बन गए 2100 वर्ष पहले शक जनजाति के लोग आए और उन्होंने भारत मे अपना साम्राज्य स्थापित किया शक संवत उन्ही की देन है शक कबीले के बाद हूण कबीले के लोग आकर बसे उनके बाद कुषाण यहां आए जिन्होंने अपना साम्राज्य कायम किया और मथुरा को राजधानी बनाया कुषाणों ने बौद्ध धम्म अपनाया सम्राट कनिष्क इसी कुषाण कबीले के शाशक थे !

ये सभी आक्रमणकारी थे जो आक्रमण के इरादे से आये लेकिन भारत के सुंदर और उपजाऊ भौगोलिक स्थिति के कारण यही के होकर रह गए !

इसी तरह बाद में भी अनेकों काबिले यहाँ आते गए और भारत की विविधता में विलीन हो कर पूरी तरह भारतीय होकर यही बस गए !

ठीक ऐसे ही बाबर भी यहां लूटने के इरादे से आया लेकिन यहां से वापस जा नही पाया !

कोई भी शाशक या कबीला पूरी तरह गलत नही होता बल्कि इन कबीलों से निकले कुछ लोग गलत हो सकते हैं इसी तरह पूरा मुग़ल वंश गलत नही था बल्कि इस वंश के दो शाशक बाबर और औरंगजेब गलत थे बाकी के सभी मुगल बादशाहों ने भारत की तहजीब और यहां के अक़ीदों को कायम रखा !

एक मुस्लिम बादशाह के डर से भागे हुमायूँ को एक राजपूत राजा ने पनाह दी और इसी राजपूत राजा के घर मे अकबर का जन्म हुआ !

अकबर के दरबार मे तानसेन जैसे संगीतज्ञ थे तो टोडरमल जैसे राजनीतिज्ञ भी थे मानसिंह जैसे सेनापति थे तो बीरबल जैसे विद्वान भी थे !

ऐसे ही विविधता भरा था जहांगीर का दरबार और जहांगीर के बाद शाहजहाँ के काल मे भी मुग़ल दरबार ऐसे ही सभी संस्कृतियों का संगम लिए हुए था !

अंग्रेजों के विरुद्ध बहादुर शाह का साथ देने वालों में अधिकतर राजपूत राजा ही थे !

कुछ कठमुल्लों और जाहिल नेताओं ने देश की रंगीन फिजाओं में सांप्रदायिकता का जहर घोलना शुरू कर दिया है और लोकतंत्र के चारों स्तम्भ मौन खड़े हैं यह देश की एकता अखंडता और समरसता के लिए एक खतरनाक स्थिति है !

कुछ मुट्ठीभर राजनेता साधु और मुल्ला हर चीज को अपनी जहालत भारी मानसिकता में फिट करना चाहते हैं इन लोगो को देश के भविष्य की कोई चिंता नही घोर गरीबी और अशिक्षा के दलदल में फंसी देश की 85 प्रतिशत आबादी लोकतंत्र से अपने उद्दार की उम्मीदें लगाये बैठी है लेकिन हमारे कर्णधार हमारे राजनेता और धर्मगुरु हमें धर्म की चाशनी में लपेट कर खा जाना चाहते हैं !

अगर इतिहास के घावों को कुरेदने से हमारा वर्तमान और भविष्य बदल सकता है तो उस इतिहास को भी कुरेदना होगा जो और भी वीभत्स है ईसा और मुहम्मद से पहले जब पूरी दुनिया मे कोई मुसलमान और ईसाई नही था तब वे कौन लोग थे जिन्होंने भारत से बौद्ध मठों बौद्ध विहारों को नेस्तनाबूद किया वो कौन सा शासक था जिसने घोषणा की थी कि जो एक बौद्ध भिक्षु का सर काट कर लाएगा उसे सौ सोने के सिक्के दिए जाएंगे वे कौन लोग थे जिन्होंने भारत से बौद्धों का सफाया किया ?

इतिहास में ऐसा बहुत कुछ है जो अच्छा नही है लेकिन हम उस कुरूप और रक्तरंजित इतिहास को बदल नही सकते भारत के इतिहास में तैमूर लंग चंगेज खान जयचंद बाबर औरंगजेब और बख्तियार खिलजी जैसे खलनायक हुए हैं तो सम्राट अशोक कनिष्क हर्षवर्धन राणा प्रताप और अकबर जैसे महानायक भी हुए है जिन्होंने भारत ही नही पूरे विश्व के इतिहास को प्रभावित किया है !

एस. प्रेम


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