उल्लुओं का जश्न और चमगादड़ों की मस्ती - तर्कशील भारत

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Wednesday, November 29, 2017

उल्लुओं का जश्न और चमगादड़ों की मस्ती

तेज लहरों में डूबती 
सौहार्द की कश्ती 
अपनों में लुटती 
प्यार की बस्ती 

अमनपसंदों की 
नहीं कोई हस्ती 
हर तरफ है
उल्लुओं का जश्न
और 
चमगादड़ों की मस्ती 

बन कर मसीहा
कुछ फ़रिश्ते 
जमीं पर कब आएंगे 
ख़त्म होगा 
किस्साएआदम 
जमीं पर
तब आएंगे 

ये आग लगाई है
इंसानों ने 
इंसानों के रहनुमाओं ने 
आकाओं ने 
हमदर्दों ने 
कुछ औरत और
कुछ मर्दों ने 
बेगैरत और बेदर्दों ने 
नेताओं ने
अभिनेताओं ने
गुरुओं ने
चेलों ने 
मुल्लों ने
कठमुल्लों ने 

आग लगी है
दिलों में , दिमागों में
फूलों में , बागों में 
नदियों में पहाड़ों में 
घरों में बाजारों में 

आग लगी है 
सोच में सपनों में
उम्मीदों में उड़ानों में 
जंगल में बियाबानों में
शब्दों में जबानों में 

बुझाएगा कौन 
इन धधकते हुए 
अंगारों को 

समझायेगा कौन
इन बहकते हुए 
सियारों को 

रोकेगा कौन 
इन बुझती हुई 
उम्मीदों को 

थामेगा कौन
इन गिरते हुए
उसूलों को 

अब तो हर शाम
सूरज नहीं डूबता
डूबती हैं बुझी हुई आँखे

हर सुबह 
सूरज नहीं निकलता
निकलती है चीखें

रात को चाँद नहीं 
तलवारे निकलती हैं

दोपहर की गर्मी में
फ़िज़ा नहीं
माहौल गर्म होता है

बरसात भी
अब पानी की जगह
खून बरसाने लगी है
नाली में 
गंदे पानी की जगह 
साफ़ खून बहने लगा है 

पतझड़ में 
अब पत्तों की जगह 
नफरतें झड़ने लगी हैं 

सर्दियों की 
सर्द हवा 
अब खुश्क हो चली है 

ओस की बुँदे 
अब घास को 
गीला नहीं करती 
अब तो घास से 
लहू की बू आने लगी है 

नदियों में मछलियाँ नहीं 
अब लाशें तैरने लगी हैं 
क्योंकि झरनों की जगह
अब आदमी गिरने लगा है 

एस॰ प्रेम

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