धर्मग्रंथों को बारूद से उड़ा दो !! - तर्कशील भारत

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Saturday, November 4, 2017

धर्मग्रंथों को बारूद से उड़ा दो !!

ज्ञान की कोई सीमा नही जंगल में जानवरों की तरह रहने वाला मनुष्य प्रकृति की जटिलताओं को समझने की कोशिश में एक बौद्धिक सामाजिक प्राणी बन गया ! अपने सामान्य ज्ञान को निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी परिष्कृत करते हुए मनुष्य के सहज ज्ञान ने विज्ञान को जन्म दे दिया जिससे मानव की असीमित जिज्ञासाओं को जैसे पंख लग गए !

दो पैरों पर चलने वाला इंसान हवा में उड़ने लगा ग्रहों नक्षत्रों से डरने वाला मनुष्य उन तक पहुंचने लगा ! 

नदियों पहाड़ों से भय खाने वाला इंसान नदियों और पहाड़ों पर बड़े बड़े बांध बनाने लगा !

समुद्र की गहराइयों से लेकर अंतरिक्ष की ऊंचाइयों तक को मानव ने भेद दिया !

सहज ज्ञान की धारा से उत्पन्न विज्ञान ने दो पैरो पर चलने वाले एक प्राणी को प्रकृति को जीतने वाला मनुष्य बना दिया !

लेकिन ज्ञान की इस धारा के विपरीत सदियों से अज्ञानता की एक समानांतर धारा विधमान रही है जिसने ज्ञान के मार्ग को सदा से दूषित करने का प्रयास किया है !

इस दूषित संक्रमित और बीमार धारा का नाम है धर्म !

धर्म एक व्यापार है इसके जाल में फंसा आम आदमी कभी ये बात समझ ही नही पाता !

धर्म और विज्ञान में कोई तालमेल ही नही जहां  विज्ञान की धारा तर्क शोध और तथ्य पर आधारित है वहीं धर्म का बखेड़ा अंधविश्वास आस्था झूठ कुतर्क और हिंसा पर आधारित है ! फिर भी सभी धार्मिक गिरोह बड़ी बेशर्मी से दावा करते हैं कि उनका धर्म विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है !

धर्म मे कितना विज्ञान है आइये इस रहस्य पर से पर्दा उठाते हैं !

सृष्टि की उत्पत्ति के बारे में सभी धर्मों ने बिल्कुल अलग अलग झूठ बोला है इसीलिए आधुनिक विज्ञान की उत्पत्ति से पहले तक पूरी दुनिया कन्फ्यूज्ड रही !

कुरान में अल्लाह कहता है हमने सृष्टि को छह  दिनों में बनाया 32/4

विज्ञान के अनुसार पृथ्वी अपने अक्ष पर 24 घंटे में एक घूर्णन पूरा करती है जिसे एक दिन कहते हैं जब सृष्टि की रचना हुई ही नही थी तब अल्लाह ने कौन से गणित से छह दिन लगा दिए ?

देवी भागवत पुराण के पृष्ठ 127 पर सृष्टि रचना की जो झूठी कहानी बताई गई है वो गजब की है !

भगवती ने अपनी शक्ति से ब्रह्मा विष्णु और महेश बनाये उस समय सृष्टि में चारो ओर केवल जल ही जल था फिर भगवती ने पृथ्वी को बनाया और उसे शेषनाग के फन पर स्थापित कर दिया शेषनाग के फन पर धरती स्थिर बनी रहे इसके लिए धरती पर पहाड़ों को कील की तरह ठोक दिया !

पहाड़ों को धरती में कील की तरह ठोक देने की यही गलतफहमी कुरान के अल्लाह को भी है कुरान के सूरह 31 आयत नम्बर 10 में अल्लाह अपने नबी को भूविज्ञान समझाते हुए कहता है "अल्लाह ने आकाशों को बिना सहारे के पैदा किया और धरती में अटल पहाड़ ठोक दिए ताकि वो तुम्हे लेकर एक ऒर लुढ़क न जाये"

यही भूविज्ञान वो कुरान के सूरह 21 आयत नम्बर 30 और 32 में भी समझता है " तुमने देखा नही पहले धरती और आकाश दोनो मिले हुए थे फिर अल्लाह ने पानी से हर जानदार चीज बनाई और धरती पर अटल पहाड़ ठोक दिए ताकि वो तुम्हे लेकर एक ओर लुढ़क न जाये"

वाह रे लाल बुझक्कडों तुम्हारा ज्ञान भी तुम्हारी तरह कचरा ही है क्योंकि आज छठि का बच्चा भी जानता है कि पहाड़ करोड़ों वर्षो के दौरान महाद्वीपों के टकराव से बनते हैं न कि उन्हें ऊपर से ठोका गया है !

कुरान के सूरह 79 के आयत नम्बर 28-30 में अल्लाह एक गजब की फिलॉसफी देता है !

आकाश को ऊंचा उठाया उसे ठीक ठाक किया उसके बाद धरती को बिछाया"

अल्लाह को साइंस की बिल्कुल समझ नही 
वर्ना वो ये डिंग मारने से पहले सौ बार सोचता क्योंकि आकाश कोई छप्पर नही जिसे आपने ऊपर उठाया और उसे ठीक ठाक किया और धरती कोई चादर नही जिसे आपने बिछा दिया !

भागवत पुराण में पृथ्वी के बारे में तथाकथित ईश्वर की समझ कितनी हास्यास्पद है इस श्लोक से पता चल जाएगा सात समुद्र खारे इखरस मदिरा घी दूध मट्ठे और मीठे जल से भरे हुए हैं 5/1/31

ऐसा कोई समुद्र इस धरती पर तो नही है हाँ दूसरे किसी ग्रह पर जरूर हो सकता है जहां ईख पैदा होते हों जहां घी और मट्ठा देने वाली गाय मौजूद हो लेकिन अफसोस कि ऐसा कोई ग्रह अभी तक नही मिला !

मानव शरीर कोशिकाओं का बना है पल प्रतिपल अरबों कोशिकाएं पैदा होती हैं और मरती हैं जैसे जैसे उम्र बढ़ती है नई कोशिकाओं बनना धीमा हो जाता है और कोशिकाओं के नष्ट होने की प्रक्रिया बढ़ जाती है इस तरह आदमी धीरे धीरे बूढा होने लगते है और एक दिन उसका अंत हो जाता है !

कही कोई आत्मा नाम की चीज नही होती मोमबत्ती तब तक जलती है जब तक उसे ऊर्जा मिलती है ऊर्जा का क्रम टूटते ही लौ बुझ जाती है वो निकल कर कही और नही जाती !

लेकिन सभी धर्मो का पूरा बखेड़ा आत्मा और परमात्मा के नाम पर ही खड़ा किया गया है !

आत्मा के विषय मे गीता कहती है "जैसे एक ही सूर्य पूरी पृथ्वी को प्रकाशित करता है वैसे ही एक ही आत्मा सारे शरीरों में निवास करती है 18/13

गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 20 वे श्लोक में लिखा है आत्मा न जन्म लेती है न मरती है यह नित्य और सनातन है"

अगर आत्मा न मरती है न जन्म लेती है तब 1931 में दुनिया की आबादी लगभग 300 करोड़ थी जो आज 700 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है ये 400 करोड़ नई आत्माएं कहाँ से आ गई ? 

शरीर के कौन से भाग में आत्मा निवास करती है ? एक सांप को यदि दो भागों में काट दिया जाए तो उसके दोनों कटे हुए हिस्से कुछ देर तक अलग अलग तड़पते हैं ? सांप में आत्मा थी तो उसके किस हिस्से में थी ?

नबी साहब ने फरमाया कयामत के दिन सबको कब्रो से बाहर निकाला जाएगा और मैदानों में इकट्ठा किया जाएगा गुनाहगारों को उनके चेहरे के बल चलाया जाएगा इस बात पर उनसे किसी मेरे ही जैसे नास्तिक ने पूछा मुंह के बल कोई कैसे चलेगा ?

इस सवाल पर हजरत साहब ने फरमाया  अल्लाह की मर्जी से जैसे अल्लाह ने उन्हें पैरो के बल चलाया वैसे ही वो उन्हें मुंह के बल भी चला देगा ! "मरने के बाद क्या होता है"प. 132

अल्लाह ने आसमान को धरती पर गिरने से रोक रखा है" 22/65

ब्रह्मांड में खरबों आकाशगंगाओं में से एक मिल्की वे के एक छोटे से हिस्से में स्थित एक सौरमंडल में सूर्य का चक्कर लगाने वाली एक मामूली सी पृथ्वी अनंत ब्रह्मांड की विशालता में जिसकी कोई औकात नही उस पृथ्वी पर आकाश गिर जाए ये कितनी हास्यास्पद बात है !

पृथ्वी गाय पर टिकी है !

एक हदीस के अनुसार पृथ्वी एक गाय पर टिकी है जिसके चार हजार सिंग हैं और वह गाय एक मछली की पीठ पर टिकी है और वह मछली पानी पर टिकी है और वह पानी हवा में लटका है वह हवा एक पत्थर पर टिकी है और वह पत्थर अल्लाह के एक फरिश्ते के सिर पर रखा हुआ है ! कसिसुल अम्बिया पृष्ठ 15-18 संस्करण 2008 फरीद बुक प्राइवेट लिमिटेड

"कमठ शेष सम धर वसुधा के"
तुलसीदास जी की रामायण रामचरित मानस के बालकांड 20/7 के अनुसार पृथ्वी कछुए की पीठ और शेषनाग के फन पर धरी हुई है !

धरग्रंथों की ऐसी बेहूदगी से भरी अवैज्ञानिक बातों के रहते कोई भी समाज कभी तरक्की नही कर सकता इसी लिए dr अम्बेडकर कहते है "यदि तुम समाज को बदलना चाहते हो तो सबसे पहले धर्मग्रंथों को बारूद से उड़ा दो" R&S 1-74/75

ये तो कुछ उदाहरण मात्र हैं धर्मग्रंथों में ऐसी जाहिलाना बातों के सिवा कुछ नही धार्मिक पुस्तकों की इन्हीं जहालत भरी अवैज्ञानिक बातों के कारण ही विज्ञान के क्षेत्र में धार्मिक लोगों का योगदान जीरो है यही वजह है कि भारत और पाकिस्तान जैसे देश प्रगति की दौड़ में बहुत पीछे छूट गए !

यह भी एक सच्चाई है कि जब पूरी दुनिया अज्ञानता के अंधकार काल मे निर्मम प्रथाओं के सहारे कुरीतियों पर आधारित संस्कृतियों को गढ़ने में लगी उस समय भारत मे वैज्ञानिक चिंतन की उज्ज्वल धारा बह रही थी चार्वाक दर्शन के नाम से प्रसिद्ध उस दार्शनिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए तथागत बुद्ध ने भी मानवता पर आधारित एक तार्किक चिंतन को लोगों के जीवन का हिस्सा बना दिया लेकिन धर्म जिन लोगों के लिए धंधा था उन लोगों ने भारत से उस अनमोल चिंतन को पूरी तरह बर्बाद करते हुए उसके स्थान पर शोषण और पाखंडों पर आधारित एक ऐसी व्यवस्था थोप दी जिसकी वजह से ये मुल्क 2000 वर्षो तक गुलाम रहा !

आज भी तर्क और ज्ञान का गला घोंटा जा रहा है जिससे समाज मे अज्ञानता बनी रहे !

ज्ञान की धारा निरंतर बहती रहनी चाहिए इसी में सम्पूर्ण मानवता का कल्याण है लेकिन ज्ञान के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध धर्म और धार्मिक मान्यताएं ही है जिन्हें ध्वस्त किये बिना विश्व कल्याण की बात करना व्यर्थ है !

धर्म एक व्यापार है इसके जाल में फंसा आम आदमी कभी ये बात समझ ही नही पाता क्योंकि धार्मिक गिरोहों का प्रचार तंत्र बहुत मजबूत है !

किसी भी मजहब की बुनियाद झूठ शोषण और पाखंडों पर ही खड़ी हैं जिसे कायम रखने के लिए समय समय पर सभी धर्म हिंसा का सहारा लेते हैं !

विज्ञान की रोशनी से धार्मिक जहालत के अंधकार को भगाया जा सकता है लेकिन शासक और शोषक जमात ऐसा कभी होने नही देगी !

महापंडित राहुल संस्कृतियान के शब्दों में कहे तो "मनुष्य जाती के

शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उस से उत्पन्न मिथ्या

विश्वाशों का समूह ही धर्म है , यदि उस में और भी कुछ है

तो वह है पुरोहितों, सत्ता-धारियों और शोषक वर्गों के




धोखेफरेब, जिस से वह अपनी भेड़ों को अपने गल्ले से

बाहर नहीं जाने देना चाहते"

एस.प्रेम

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