मनोकामना का मनोविज्ञान - तर्कशील भारत

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Tuesday, October 24, 2017

मनोकामना का मनोविज्ञान

मनोकामना का मनोविज्ञान


दुनिया भर के लगभग सभी धर्मस्थलों के बारे में एक बात जरुर प्रचलित होती है की वहां जाने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाएँगी !
क्या सच में इन धर्मस्थलों में कोई शक्ति होती है जो इन्सान की सभी मनोकामनाओं को पूरा कर दे ?

मनोकामनाए होती क्या हैं ?

इन प्रश्नों को समझने से पहले हमें उन कारणों को समझना होगा जिनकी वजह से लोग इन धर्मस्थलों की ओर जाने को मजबूर होते हैं । यहाँ एक बात गौर करने वाली है की मनोकामना का यह प्रपंच केवल उन्ही मुल्कों में काम करता है जहाँ अशिक्षा गरीबी कुपोषण बेरोजगारी सामाजिक असमानता और भयंकर भ्रष्टाचार का माहौल होता है मनोकामना का ये गणित संपन्न और अपने नागरिकों के भविष्य को सुरक्षित रखने की गारंटी देने वाले मुल्कों में काम नहीं करता । भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे गरीब और पिछड़े हुए मुल्कों में राजनैतिक और सामाजिक भ्रष्टाचार के कारण एक बहुत बड़ी आबादी सामान्य नागरिक अधिकारों से भी वंचित है । भारत की बात करें तो यहां भी सामाजिक अवहेलना और राजनैतिक अवसरवाद के कारण समाज में भारी असमानता मौजूद है जिसके कारण कुछ मुठ्ठी भर लोग संसाधनों के शिखर पर कब्जा जमाए बैठे है बाकी आबादी भी संसाधनों को लूटने की होड़ में शामिल हो चुकी है । संसाधनों को ज्यादा से ज्यादा हड़प लेने की इसी प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था से पैदा होता है कामना और मनोकामनाओं का व्यापार । हमारी सरकारें लोगों को रोटी कपड़ा मकान शिक्षा रोजगार और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं देने में भी नाकाम रही है शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी चीजों को भी अमीरी और गरीबी के हिसाब से बांट दिया गया है । महंगे स्कूल और महंगे अस्पतालों की सुविधाएं एक बड़ी आबादी की पहुंच से दूर हैं । 
सरकारी अस्पतालों में धक्के खाने वाले आदमी के पास इतना पैसा नही की वो महंगा इलाज करवा सके और सरकारी अस्पतालों की स्थिति ऐसी बना दी गई है कि ऑक्सीजन की कमी से सैंकड़ो बच्चे दम तोड़ देते है इन अस्पतालों में कोई जाना नही चाहता फिर भी मजबूर आदमी की यही कामना होती है कि उसका मरीज किसी भी तरह ठीक हो जाये !
यही हाल सरकारी स्कूलों का भी है लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाकर कामना करते हैं कि उनका बच्चा डोक्टर इन्जिनेअर और आईएस बन जाये । इसी तरह बढ़ती बेरोजगारी के आलम में रोजगार की तलाश में धक्के खाते नौजवान की कामना होती है कि उसे एक बेहतर नौकरी मिल जाये । ऐसी ही कोई न कोई कामना लिए हर आदमी जिये जा रहा है किसान को अच्छी फसल की कामना व्यापारी को अच्छे मुनाफे की कामना नेता को जीतने की कामना अभिनेता को शोहरत की कामना निसंतान को संतान की कामना ।

पूंजीवाद के इस युग मे मुनाफाखोर ऐसे अवसर ढूंढते हैं जहां से वे मुनाफा बटोर सकें । 
मनोकामनाओं का गणित यही से शुरू होता है इसलिए अज्ञानता और अराजकता भरे इस माहौल में कामनाओं का व्यापार कभी मन्दा नही पड़ता । मनोकामनाओं के इस बजार में भीड़ जरूरी है इसके लिए काम आता है प्रचार तंत्र । इस काम के लिए अखबार TV सत्संग और मौखिक प्रचार साधनों का बखूबी इस्तेमाल किया जाता है । एक बार भीड़ शुरू तो उसका सिलसिला कभी खत्म होने वाला नही । भीड़ को देख कर भीड़ और बढ़ती है । 
कामनाओं के इस व्यापार में मुनाफा ही मुनाफा है । 
अब सवाल उठता है कि अपनी कामनाओं के लिए देश के अलग अलग हिस्सों में झट से मनोकामना पूरी कर देने वाले इन धर्मस्थलों पर लोग इतनी बड़ी तादात में क्यों पहुंचते हैं ?
असल में ये सभी धर्मस्थल पूंजीवादी लूट के हिस्सेदार हैं । जिन्हें लोग समझ ही नहीं पाते । इसका कारण है समाज मे व्याप्त अज्ञानता और धार्मिक गिरोहों का मजबूत प्रचारतंत्र । 

असलम नामके एक आदमी का एक्सीडेंट हो गया और वह कोमा में चला गया असलम के ठीक होने की कामना लिए उसके मा बाप पहुंच गए ख्वाजा साहब की दरगाह में , वहां तीन दिनों तक रोते रहे हजारों रुपये चढ़ावे में दे दिए साथ ही मन्नत भी मांग ली कि अगर मेरा बेटा ठीक हो गया तो दो लाख का चंदा करूँगा लेकिन अफसोस लड़का बच नही पाया । असलम की इस काल्पनिक कहानी में असलम के जीने और मरने दोनों में ख्वाजा जी का फायदा हुआ अब ख्वाजा साहब को मरे तो हजारों साल बीत चुके हैं तो फायदा किसका हुआ ? असल मे इन जगहों पर इंसान उन्ही उम्मीदों के लिए पहुंचता है जिनके पूरा होने की संभावना पहले से होती है, जैसे असलम वाले केस में जब तक उसके ठीक होने की थोड़ी भी उम्मीद बाकी थी तब तक मनौती भखौती का खूब जोर चला असलम के मरते ही कामनाओं का पुलिंदा खत्म हो गया । 
सोचने वाली बात तो यह है कि ख्वाजा जी को असलम के जिंदा होने की रिश्वत दी गई लेकिन वह मर गया । ऐसे में कोई भी उस ख्वाजा के दर पे लुटाया पैसा वापस मांगने नही गया । 

सोचिये अगर असलम डॉक्टरों की कृपा से बच गया होता तो उसका श्रेय किसे दिया जाता ?
मनोकामना का गणित यही तो है आपकी मनोकामना पूरी हो या आपका सत्यानाश हो दोनों ही सूरतों में फायदा किसी और का ॥


रोहित का नौकरी के लिए इंटरव्यू होने वाला था ये इंटरव्यूह उसकी जिंदगी बदलने वाला था इसलिए वो पहुंच गया एक मनोकामना पूरी करने वाली चौखट पर उसने मनौती मांगी की अगर उसका इंटरव्यू क्लियर हो जाता है तब वह यहां अपनी एक साल की सैलरी अर्पित करेगा। इस मनोकामना के लिए वह घर से एक हजार किलोमीटर दूर के एक मंदिर तक जा पहुंचा था आने जाने का खर्च दस हजार और उस स्थान पर दस हजार लुटाये वो जोड़कर टोटल बीस हजार रुपये खर्च कर दिए फिर भी  इंटरव्यू में फेल हो गया ।
सोचिये अगर पास हो जाता तो फायदा किसका था ?


अब बात रुखसाना की कर लेते हैं लड़के की चाहत में लगातार छह लडकिया हो गई एक बार फिर से प्रेग्नेंट थी लड़के की ख्वाहिश में मनौती के लिए पांच अलग अलग दरगाहों पर जा चुकी थी हर बार मनोकामना के इन अड्डों पर पति की मेहनत की कमाई खूब लुटा चुकी थी।  लेकिन पांचो बार लड़की हो गई अबकी बार फिर से एक नए अड्डे पर पहुंच गई और लड़के के लिए हर बार की तरह इस बार भी मनौती मांग ली कि अगर बेटा हुआ तो 51 हजार भेंट चढ़ाऊंगी और इस बार संयोग से बेटा हो गया । पांच बार बेटी हो गई तो भी पीर बाबा के दलालों का फायदा और एक बार बेटा हो गया तो भी धर्म के दलालों का फायदा यानि चित भी इनकी पट भी इनका और खड़ा सिक्का भी इनके बाप का ।
वाह रे धर्म के धंधे बाजों गजब का बिजनेस इजाद किया है तुमने ।
मनोकामना को पूरा करने वाली चौखट पर पहुंचने वाली भीड़ असलम रोहित और रुखसाना जैसे लोगों की ही होती है जिन्हें अपनी ख्वाहिशों को शॉर्टकट तरीके से पूरा करना होता है । उनकी इसी मानसिकता का फायदा शातिर लोग उठाते हैं । मनोकामना के अड्डो पर लोग उन्ही ख्वाहिशों के पूरा होने की मनोकामना करते हैं जिनके पूरा होने की उम्मीद पहले से होती है।
जैसे -- असलम, रोहित और रुखसाना के मामले में हमने देखा ।

मान लीजिये मनोकामना के किसी अड्डे पर 100 लोग अपनी मन्नतें मांगते हैं और रुखसाना की तरह उनमें से 50 लोगों की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं और 50 लोगों की मनोकामनाएं टॉय टॉय फिस्स हो जाती हैं तो भी फायदा किसका होगा ?
जिन लोगो की मनोकामनाएं पूरी हुईं वे लोग 500 लोगों को उस अड्डे के चमत्कार के बारे में बताएंगे और जिन लोगों की मनोकामनाएं उस अड्डे से पूरी नही होती वे लोग उस अड्डे के प्रति अपनी श्रद्धा बरकरार रखते हुए दूसरे किसी अड्डे की तलाश करते हैं। दोनों ही सूरतों में फायदा मनोकामना के इन अड्डों के दलालों का होता है। यही है मनोकामना का पूरा मनोविज्ञान । हर दिन करोड़ो लोग मनोकामनाओ के इस भ्रमजाल में फंस कर धार्मिक गिरोहों के बनाये अड्डों पर उनके पाखंडो का शिकार होते हैं । 

ज़रा सोचिए...

रोजाना कितने ही लोग इन जगहों पर अपने अपने मन की कामनाएं लेकर पहुंचते हैं और हजारों वर्षों से ये सिलसिला युही चलाया जा रहा है फिर भी देश के हर कोने में गरीबी भुखमरी अन्याय अत्याचार शोषण कुपोषण और भ्रष्टाचार का साम्राज्य कायम है । देश का हर मेहनतकश आदमी परेशान बेबस और लाचार है गरीब आदमी अपनी गरीबी से जूझ रहा है तो मध्यम वर्ग के आदमी के पास भी हजारों समस्याएं हैं ये सभी समस्याएं शाशन की गलत नीतियों पर काम करने वाले भ्रष्ट और संवेदनहीन प्रशाशन के कारण पैदा हुई हैं साथ ही असमानता पर आधारित हमारी सामाजिक व्यवस्था इन सबके लिए सबसे बड़ी वजह है।  मानवता के साथ होने वाले इस सबसे बड़े खिलवाड़ में सरकारें उन धार्मिक गिरोहों का साथ देती हैं क्योंकि भारत की 130 करोड़ की आबादी में 70 प्रतिशत लोग बुनियादी सुविधाओ से भी वंचित हैं ऐसे में जनता को लूटने वाली सरकारों के लिए लूट और झूठ के ये अड्डे ज्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं ।

ज़रा सोचिए... ।

इंसानों की मनोकामनाएं पूरी करने वाले ये अड्डे इतने ही चमत्कारिक होते की सबकी मनोकामनाएं पूरी कर दें तो इस देश में इतनी गरीबी नहीं होती दुनिया के पच्चीस सबसे गरीब देशों में जितनी गरीबी है उतनी गरीबी तो हमारे देश के केवल आठ राज्यों में है !

ज़रा सोचिए... ।

किसी की नौकरी और किसी के पेट में पल रहे बच्चे की जानकारी रखने वाले इन अड्डो पर बड़े बड़े हादसे हो जाते हैं और मनोकामना के ये अड्डे उसे नही रोक पाते। अगर मनोकामना के इस मनोविज्ञान को समझ गए तो जीवन मे कभी किसी अड्डे की जरूरत नही पड़ेगी
ख्वाहिशे, उम्मीदे और कामनाओ के बिना इंसान की जिंदगी बदरंग होती है ये चीजें इंसान को आशावादी बनाये रखते हैं । लेकिन हमारी कामनाओ को हम ही पूरा कर सकते हैं इसके लिए हमे किसी के द्वार खटखटाने की जरूरत नही किसी मरे हुए की मजार पर जाने की भी जरूरत नही । 

आपकी कामनाये इच्छाएं और ख्वाहिशे आप को ही पूरी करनी हैंइसके लिए जरूरी है आपकी हिम्मत लगन और वैज्ञानिकसोच के साथ  खुद पर भरोसा !!

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