भगवान ब्रहमा और पैगंबर इब्राहीम में इतनी समानताएँ क्यूँ ? - तर्कशील भारत

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Wednesday, October 25, 2017

भगवान ब्रहमा और पैगंबर इब्राहीम में इतनी समानताएँ क्यूँ ?


 भगवान ब्रह्मा और पैगम्बर इब्राहीम में इतनी समानता क्यों ?

हिंदुत्व इस्लाम यहूदियत और ईसाइयत

आज के समय मे पूरी दुनिया के 70 प्रतिशत लोग इन चार विचारधाराओं के अनुयाई हैं और ऊपरी तौर पर इन चारों में हमे कोई तालमेल दिखाई नही देता बल्कि चारों की परंपराएं मान्यताये और तौर तरीके एक दूसरे से बिल्कुल जुदा दिखाई देती है लेकिन मैं कहूँ की इन चारो विचारधाराओं की उत्पत्ति का उदगम एक ही है तो शायद आप यकीन नही कर पाएंगे। 
चलिए इस विषय पर एक तार्किक विश्लेषण करते हैं। बात शुरू करते हैं इसाई और यहूदियों के अब्राहम से जिन्हें मुसलमान इब्राहिम कहते हैं। ईसा से करीब दो हजार वर्ष पूर्व मेसोपोटामिया के हाराम नामक स्थान में जन्मे अब्राहिम अपनी जवानी में हाराम शहर से पलायन को मजबूर हुए और वहां से कानान चले गए उन्होंने स्वात की रहने वाली सारा से विवाह किया हाजरा उनकी दूसरी पत्नी थी इन दोनों से उन्हें कई संताने हुई इसहाक इस्माइल जिमरान जिकशान मिदान और सुआह।  इब्राहिम के पोते याकूब थे जिनका दूसरा नाम इजराइल था इन्ही का एक पुत्र जिसका नाम था यजुदा इसी यजूदा की संतानों को आगे भी कई निर्वासनों का सामना करना पड़ा और आगे चलकर यजूदा की संताने ही यहूदी कहलाने लगीं।

500 वर्षों के कई निर्वासनों के बाद आखिरकार इजराइल की ये संताने यहूदि के रूप में येरूसलम के आसपास बसने में कामयाब हुईं और इस स्थान को उन्होंने इजराइल का नाम दिया लेकिन जल्द ही उनका यह पवित्र स्थान फराओ बादशाह रामासिस द्विदिय ने कब्जा लिया और यहूदी फराओ के गुलाम हो गए फिर करीब 1500 ईसापूर्व में इन्हीं की जाती से मोजेज का जन्म हुआ जिन्होंने फराओ के कब्जे से इजराइल को मुक्त कराया और यहूदियों के पैगम्बर के रूप में स्थापित हुए यहां तक कि कहानी यहूदी धर्म के साथ साथ ईसाइयत और इस्लाम मे भी एक समान है । अब सवाल यह उठता है कि यहूदी ईसाई और मुसलमानों के यह पैगम्बर अब्राहम या इब्राहिम ही परमपिता ब्रह्मा कैसे हो सकते है भला ..!!  ब्रह्मा को चारों वेदों का रचियता कहा जाता है और वेदों की ऋचाएं बताती हैं कि "आर्य बाहर से आयेजवाहर लाल नेहरू ने अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भी यह साबित किया है कि आर्य बाहर से आये। महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने अपनी किताब वोल्गा टू गंगा में मानव के आदिकाल से आर्यों तक के उद्गम की बात लिखी है । बालगंगाधर तिलक से लेकर डॉ अम्बेडकर तक सभी विद्वानों ने आर्यों के बाहर से आने के इतिहास को स्वीकृति दी है । 

इतिहास के अनुसार आर्य ईरान से भारत मे करीब 1800 ईसा पूर्व में आये उस समय भारत मे सिंधु घाटी संभ्यता का काल था, अब सवाल यह है कि आर्यों का यहूदियों से क्या संबंध ? असल मे अब्राहम के दौर से ही उनकी संतानों को निर्वासन और पलायन के लंबे दौर से गुजरना पड़ा यहूदियों की उत्पत्ति के उथल पुथल भरे इसी शुरुआती दौर में अब्राहम की संतानों के कई छोटे बड़े दल इधर से उधर अनेकों स्थानों पर जा बसे इन्ही में से एक दल थोड़े समय के लिए ईरान जा बसा ।
ईरान का प्राचीन नाम आर्यन ही है । सवाल अब भी वही है कि ब्रह्मा ही अब्राहम है इसका प्रमाण क्या है । असल मे जिन्हें ईसाई यहूदी और मुसलमान अब्राहम या इब्राहिम कहते है उनका नाम अब्राहम नही बल्कि ब्राहम था ।



अरब और इजराइली संस्कृतियों में मामूली भासाई अंतर के कारण ब्राहम अब्राहम हो गए क्योंकि अरबी संस्कृति में  किसी व्यक्तिविशेष को सम्मान देने के लिए उसके नाम के आगे अलिफ का अ जोड़ दिया जाता था इसलिए ब्राहम के नाम के साथ अ जोड़ देने से वे ब्राहम से अब्राहम हो गए ।,
एक उदाहरण से समझिये ---- "महान दार्शनिक सुकरात के शिष्य और अरस्तु के गुरु प्लूटो को अरबी संस्कृति में अफलातून कहते हैं", अब ये कैसे हो गया ? प्लेटो और अफलातून दोनो नामों में तो कोई समानता नही दिखाई देती । असल मे प्लेटो को अरबी में बोलेंगे तो होगा फ्लेतून क्योंकि अरबी भाषा मे प और ट जैसे शब्दों का अस्तित्व ही नही है अरबी में प को फ़ और ट को त बोला जाता है इसीलिए प्लेटो वहां की भासा में फ्लेतून हो गए और नाम के आगे सम्मानपूर्वक अलिफ का अ भी जोड़ देने से अफलातून हो गये, इसी तरह आर्यों के ब्राहम ही आगे चलकर अरब यूरोपियन संस्कृति में अब्राहम और इब्राहिम कहलाये और यही ब्राहम ब्रहम ब्रहमा ब्रह्मा हो गये। 


कुछ और सबूत देखिये ----- लोगो के नाम के साथ उनके स्थान का नाम भी जोड़ने परंपरा कई संस्कृतों में रही है और आज भी है । यहूदी ईसाई और मुसलमानों की मान्यताओं के अनुसार अब्राहम की पत्नी का नाम सारा था और वह स्वात घाटी की रहने वाली थी ! अगर दोनों को जोड़ दिया जाए तो होता है सारा -स्वाति अर्थात 'सरस्वती' और ब्रह्मा की पत्नी का नाम भी सरस्वती है अर्थात सारा -स्वाति । 




अब्राहम को मानने वाले यहूदी ईसाई और मुसलमानों की मान्यता के अनुसार वे तीनों ही बुतपरस्ती अर्थात वर्शीपिंग ऑफ थिंग्स को गलत मानते है और इसे अब्राहम को मिले ईश्वर के आदेश से जोड़ते हैं  इधर ब्रह्मा की पूजा भी अवैध है पुष्कर में एकमात्र ब्रह्मा मंदिर में भी ब्रह्मा की पूजा नही होती इसके पीछे कहानी जो भी गढ़ी गई हो लेकिन सच्चाई यही है कि अब्राहम या इब्राहिम की तरह ब्रह्मा की भी परस्ती नही होती अर्थात पूजा नही होती ।


सफेद दाढ़ी में दर्शाये गए ब्रह्मा कमल के फूल पर विराजमान हैं अब्राहम और इब्राहिम को भी कमल पसंद है इसी वजह से यहूदियों के सभी गिरजाघरों कमल की आकृति देखने को मिलती है ईसाइयों के चर्च में दर्शाये गए स्वर्ग की पेंटिंग्स में भी कमल की आकृति उकेरी जाती है और मुस्लिम शाशकों द्वारा निर्मित भव्य इमारतों में भी कमल की आकृति देखने को मिलती है । भारतीय संदर्भ में ब्रह्मा जी का चित्रण सफेद दाढ़ी के साथ दिखाई देता है जो ईसाई और यहूदियों की संस्कृतियों के अब्राहम के चित्रण से बिल्कुल मेल खाता है । यह सभी बातें मिलकर यह दर्शाती हैं कि आज परस्पर और एक दूसरे के विरुद्ध दिखाई देने वाली सभी संस्कृतियों का मूल एक ही है  जिन्होंने समय के अंतराल में विभिन्न धर्मों का रूप धारण किया और वर्तमान में ये सभी धर्म पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा बन कर आम जनता का शोषण कर रहे हैं । 


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