काश कोई धर्म न होता काश कोई मजहब न होता - तर्कशील भारत

Header Ads Widget

Friday, April 7, 2017

काश कोई धर्म न होता काश कोई मजहब न होता

काश  कोई धर्म न होता 
.......काश कोई मजहब न होता

ना गुजरात कभी सिसकता 
ना कंधमाल होता 
ना गोधरा, गोहाना 
ना मिर्च पुर बिलखता 

ना तेरा दर्द होता, ना मेरा घाव होता 
तुझसे मुझे मुहब्बत, मुझे तुझसे लगाव होता 
ना बम धमाके होते, ना गोलियां बरसती 
ना असीमानंद होता, ना कसाब होता 

.......काश कोई धर्म न होता 
.......काश कोई मजहब न होता 

ना मस्जिद आजान देती, ना मंदिर के घंटे बजते
ना अल्ला का शोर होता, ना राम नाम भजते
ना हराम होती, रातों की नींद अपनी 
मुर्गा हमें जगाता, सुबह के पांच बजते 

ना दीवाली होती, और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते 

.......काश कोई धर्म ना होता 
.......काश कोई मजहब ना होता


ना अर्ध देते , ना स्नान होता 
ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता 
जब भी प्यास लगती , नदिओं का पानी पीते
पेड़ों की छाव होती , नदिओं का गर्जन होता 

ना भगवानों की लीला होती, ना अवतारों का नाटक होता 
ना देशों की सीमा होती , ना दिलों का फाटक होता 

.......काश कोई धर्म ना होता 
.......काश कोई मजहब ना होता 

कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता
कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना होता 
कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता 
किसी के दर्द से कोई, बेखबर ना होता 

ना ही गीता होती , और ना कुरान होता
ना ही अल्ला होता, ना भगवान होता
तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता 
ना मैं हिन्दू होता, ना तू मुसलमान होता 

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता 
फिर ना बंगलादेश बंटता, ना पकिस्तान होता 

.......काश कोई धर्म ना होता 
.......काश कोई मजहब ना होता 

ना आतंक वाद होता, ना अत्याचार होता
ना अन्याय होता, ना भ्रष्टाचार होता
ना आबरू सिसकती, ना बलात्कार होता
ना किसी को जख्म मिलता, ना व्यभिचार होता

ना जातियां ही होती , ना बंटाधार होता
जुल्मो-सितम किसी पे, ना बार-बार होता
ना नफरतें ही होती, ना सरहदें ही होती 
ना फसाद होते, बस प्यार-प्यार होता 

.......काश कोई धर्म ना होता 
.......काश कोई मजहब ना होता 

ना परमाणुओं का खतरा, ना ऐटम-बम होते 
ना मिसाइलों की दहशत, ना ड्रोन-बम होते 
ना पासपोर्ट लगता, ना किसी पे शक होता 
पृथ्वी की हर जमीन पे, सभी का हक़ होता 

ना बेबसी ही होती, ना कोई गरीब होता
दुखों से दूर मानव, सुख के करीब होता 
ना रोटी की जंग होती, ना झोपड़ का दर्द होता 
संसाधनों का अवसर, सबको नसीब होता 

ना तीर्थ कोई , ना हज्ज फर्ज होता 
कोई ख़ुदकुशी न करता, ना किसी पे कर्ज होता 

.......काश कोई धर्म ना होता 
.......काश कोई मजहब ना होता

No comments:

Post a Comment

Pages