चमार - तर्कशील भारत

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Monday, April 3, 2017

चमार



सात साल हो गए 
हमारे प्यार के 
चलो अब अपने इस प्यार को अंजाम तक पहुंचाते है 
शादी के पवित्र बंधन में 
दोनों बंध जाते है 
लड़के ने 
अपनी प्रेयसी की 
आँखों में आँखे डाल कहा

प्रेयसि ने 
कुछ सोच कर 
सन्डे को 
अपने पापा से मिलने 
घर आने को कहा

सन्डे को सुबह सुबह
प्रेमी अपनी प्रेमिका के 
दरवाजे पर खड़ा 
घंटी बजाई
होने वाले ससुर जी ने 
दरवाजा खोला

प्रेमी की उम्मीदें 
कुलांचे मारती हुई
ससुराल के 
सोफे पर बैठ गई

तभी होने वाले 
ससुर जी ने 
कड़कती आवाज में 
होने वाले दामाद से
उसकी जाती पूछ ली

इतना सुनते ही 
जैसे
प्रेमी की उम्मीदों में 
भरी हुई हवा निकल गई

वो सकपकाया 
जबां जैसे सिल गए थे
फिर भी 
प्यार की जिद ने 
होठों को जुदा किया 
आवाज निकली 
"चमार"

इस खामोश से लफ्ज में
इतना धमाका था
जैसे हजार डाइनामाइट 
एक साथ फट पड़े हों

होने वाला ससुर 
अब हिटलर था 
उसके सामने 
प्रेमी अब प्रेमी नहीं
पोलैंड था

निकल जा 
दुबारा 
इस गली में भी नजर आया
तो तेरी खैर नहीं 
साला चमार कहीं का 
सोफ़ा गन्दा कर दिया
अब इसे 
धोना सुखाना पड़ेगा 
या आग में जलाना पड़ेगा

अगले कुछ दिनों तक
मजनूँ को लैला 
याद नहीं आई
लेकिन लैला को
मजनूं की याद जरूर आई
लैला ने फोन किया
कहा 
तुम कितने नीच हो
तुमने मुझसे कभी 
क्यों नहीं बताया की
तुम इंसान नहीं
चमार हो

मजनूं की आँखे 
अब खुली थीं 
जो प्यार में 
पिछले सात सालों में
अंधी हो चुकी थी

फिर एक दिन मजनू 
सन्डे को लैला के
दरवाजे पर खड़ा था
लेकिन आज वह 
मजनूँ नहीं चमार नहीं
इंसान हो चूका था

दरवाजा उसी बूढे ने खोला
जो कभी होने वाला ससुर था

वो सीधे बिना पूछे 
सोफे पर जा बैठा
और बोला 
आपने इस सोफे को 
अभी तक जलाया नहीं 
चलो 
धोया सुखाया तो
जरूर होगा

लेकिन अपनी 
लड़की को 
धोया सुखाया जलाया 
क्यों नहीं 
जो मेरी गोद को 
सोफ़ा समझकर 
पिछले सात सालों तक 
बैठती रही

मेरे छूने से तुम्हारा सोफ़ा
ख़राब हो सकता है
लेकिन तुम्हारी
लड़की क्यों नहीं ?

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